
Financial Rules Changed List 2025: नियम-कानून अक्सर जटिल और उबाऊ लगते हैं, लेकिन वर्ष 2025 में कुछ ऐसे बदलाव हुए हैं जो सीधे तौर पर हर भारतीय की बचत, रिटायरमेंट और परिवार की वित्तीय सुरक्षा को प्रभावित करते हैं। ये बदलाव इतने अप्रत्याशक्षित और शक्तिशाली हैं कि इन्हें नजरअंदाज करना एक बड़ी भूल हो सकती है। यह लेख 2025 के सबसे आश्चर्यजनक और प्रभावशाली वित्तीय सुधारों को सरल भाषा में समझाएगा ताकि आप इनका पूरा फायदा उठा सकें।
इस वर्ष राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) पूरी तरह बदल गया है। अब यह सिर्फ एक पेंशन स्कीम नहीं, बल्कि एक पैसे-कौड़े से संबंधित कई उद्देश्यों को पूरा करने का जरिया बन गया है।
| संचित पेंशन धन (APW) | एकमुश्त निकासी सीमा | एन्युइटी/सिस्टमैटिक विकल्प |
|---|---|---|
| ₹12 लाख से अधिक | 80% तक | न्यूनतम 20% एन्युइटी अनिवार्य |
| ₹8 लाख से ₹12 लाख | ₹6 लाख तक तुरंत | शेष राशि सिस्टमैटिक यूनिट रिडेम्पशन (SUR) के माध्यम से |
| ₹8 लाख या उससे कम | 100% पूर्ण निकासी | कोई अनिवार्य एन्युइटी नहीं |
अब आप अपनी NPS जमा राशि के 25% हिस्से को गिरवी रखकर लोन ले सकते हैं। यह सुविधा आपको मेडिकल इमरजेंसी या घर खरीदने जैसी जरूरतों के लिए पैसे का इंतजाम करने की आजादी देती है।
एनपीएस इन्वेस्टमेंट में बने रहने की अधिकतम आयु सीमा 75 वर्ष से बढ़ाकर 85 वर्ष कर दी गई है, जिससे आपको इक्विटी में रहकर अपने पैसे को और ज्यादा समय तक बढ़ाने का मौका मिलेगा।
भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने स्वास्थ्य बीमा खरीदने की अधिकतम आयु सीमा को पूरी तरह से हटा दिया है। पहले यह 65 वर्ष निर्धारित थी। अब कोई भी बीमा कंपनी किसी भी उम्र के व्यक्ति को केवल उनकी उम्र के आधार पर पॉलिसी देने से इनकार नहीं कर सकती है।
इस मुख्य बदलाव के साथ कुछ और सहायक सुधार भी किए गए हैं...
पहले से मौजूद बीमारियों (PED) के लिए प्रतीक्षा अवधि 48 महीने से घटाकर 36 महीने कर दी गई है।
क्लेम पर रोक की अवधि (Moratorium Period) 8 साल से घटाकर 5 साल कर दी गई है। इसका मतलब है कि 5 साल तक लगातार पॉलिसी चलाने के बाद बीमा कंपनी धोखाधड़ी के मामलों को छोड़कर किसी भी दावे को अस्वीकार नहीं कर सकती।
वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष पॉलिसी: अब हर बीमा कंपनी को वरिष्ठ नागरिकों के लिए कम से कम एक विशेष स्वास्थ्य बीमा उत्पाद पेश करना अनिवार्य है।
आयुष उपचार पर पूरी कवरेज: अब आयुर्वेद, होम्योपैथी जैसे आयुष उपचारों पर बिना किसी उप-सीमा (sub-limit) के पूरी बीमा राशि तक कवरेज देना अनिवार्य है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक बेहद शक्तिशाली नियम लागू किया है। इसके तहत, बैंकों को लोन का पूरा भुगतान होने के सात कामकाजी दिनों के भीतर गिरवी रखी गई संपत्ति के मूल कागजात ग्राहक को वापस करने होंगे।
इस नियम का सबसे प्रभावशाली हिस्सा इसका जुर्माना है। अगर बैंक सात दिनों के भीतर कागजात वापस करने में देरी करता है, तो उसे ग्राहक को देरी के हर दिन के लिए 5,000 रुपये का जुर्माना देना होगा।
यह नियम सिर्फ कागज वापस पाने के बारे में नहीं है; यह जवाबदेही में एक बुनियादी बदलाव है। पहली बार, संस्थागत देरी की वित्तीय लागत सीधे बैंकों पर डाली गई है, ग्राहक पर नहीं। यह उस आम समस्या का अंत करता है जहां लोन बंद होने के बाद भी बैंक हफ्तों या महीनों तक संपत्ति के कागजात अपने पास रखते थे।
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) ने '25% मिनिमम बैलेंस' का नया नियम लागू किया है। इसके तहत, नौकरी छूटने के एक महीने बाद कोई भी सदस्य अपने पीएफ बैलेंस का 75% तक निकाल सकता है, लेकिन बाकी का 25% कम से कम एक साल तक खाते में रखना अनिवार्य होगा। लेकिन घबराएं नहीं, 100% निकासी अभी भी संभव है यह नियम हर स्थिति में लागू नहीं होता। निम्नलिखित मामलों में आप अपना पूरा 100% पीएफ बैलेंस निकाल सकते हैं...
• 55 वर्ष की आयु के बाद रिटायरमेंट पर।
• स्थायी विकलांगता की स्थिति में।
• स्थायी रूप से विदेश में बसने पर।
यह एक प्रतिबंध नहीं, बल्कि EPFO का एक रणनीतिक कदम है। इसका उद्देश्य उस संस्कृति को समाप्त करना है जहां युवा नौकरी बदलने पर अपने रिटायरमेंट फंड को पूरी तरह खत्म कर देते थे। यह 25% का एक सुरक्षा दीवार सुनिश्चित करती है कि हर कर्मचारी के पास बुढ़ापे के लिए एक न्यूनतम राशि हमेशा बची रहे।
रोकी गई 25% राशि पर 8.25% की आकर्षक दर से ब्याज मिलता रहेगा, जो आपके बुढ़ापे के लिए एक सुरक्षा कवच को और मज़बूत करता है।
वर्ष 2025 में पूंजी बाजार और खुदरा बैंकिंग में पूरी पारदर्शिता की ओर एक रणनीतिक बदलाव देखा गया है। SEBI और RBI ने ऐसे सुधार पेश किए हैं जिनका उद्देश्य लागतों को स्पष्ट करना, संस्थागत हितों को उपभोक्ताओं के अनुकूल और डिजिटल लोन एवं संपत्ति उत्तराधिकार के लिए प्रक्रियाओं को सरल बनाना है।
पारंपरिक कुल व्यय अनुपात (TER) को आधार व्यय अनुपात (BER) से बदल दिया गया है। यह मुख्य प्रबंधन शुल्क को ब्रोकरेज और जीएसटी, एसटीटी जैसे वैधानिक शुल्कों से अलग करता है, जिन्हें अब वास्तविक आधार पर लिया जाएगा।
| फंड श्रेणी | पिछली TER सीमा | नई BER सीमा | |
|---|---|---|---|
| इंडेक्स फंड और ईटीएफ | 1.00% | 0.90% | |
| इक्विटी-उन्मुख ओपन-एंडेड ( ₹500 करोड़ तक) | 2.25% | 2.10% | |
| इक्विटी-उन्मुख ओपन-एंडेड ( ₹50,000 करोड़ से अधिक) | 1.05% | 0.95% | |
| गैर-इक्विटी ओपन-एंडेड ( ₹500 करोड़ तक) | 2.00% | 1.85% | |
| क्लोज-एंडेड इक्विटी | 1.25% | 1.00% |
ब्रोकरेज के लिए नई, निचली सीमाएं स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई हैं- नकद बाजार के लिए 6 आधार अंक और डेरिवेटिव के लिए 2 आधार अंक। यह कदम निवेशकों के लिए फायदेमंद है क्योंकि यह बहुत ज्यादा मार्जिन पैडिंग को रोकता है और घटी हुई ब्रोकरेज सीमाएं दीर्घकालिक संपत्ति लाभ में योगदान देंगी।
इसे ऐसे समझिए कि पहले आपके निवेश पर लगने वाला 'खर्च' (TER) एक 'ब्लैक बॉक्स' की तरह था, जिसमें मैनेजमेंट फीस और ब्रोकरेज सब एक साथ मिला होता था। अब इसे पूरी तरह पारदर्शी बना दिया गया है।
मान लीजिए आपने एक Equity Mutual Fund में 1,00,000 रुपये निवेश किए हैं। पुराने नियम के तहत फंड हाउस आपसे कुल 2% यानी 2,000 रुपये TER वसूलता था। इस 2,000 रुपये में फंड मैनेजर की फीस, मार्केटिंग और वह 'ब्रोकरेज' भी शामिल थी जो फंड हाउस शेयरों को खरीदने-बेचने के लिए देता था।
निवेशक को यह नहीं पता चलता था कि फंड हाउस अंदरूनी तौर पर कितनी ब्रोकरेज दे रहा है। कई बार फंड हाउस ज्यादा ब्रोकरेज (मार्जिन पैडिंग) दिखाकर निवेशक का मुनाफा कम कर देते थे। अब SEBI ने कहा है कि फंड हाउस केवल बेस एक्सपेंस रेशियो (BER) लेगा, जो कि केवल मैनेजमेंट और ऑपरेशनल खर्च होगा। ब्रोकरेज और टैक्स (GST, STT) अब 'वास्तविक' आधार पर अलग से दिखाए जाएंगे।
मार्जिन पैडिंग' पर लगाम: पहले फंड हाउस अक्सर ऊंची ब्रोकरेज दरों पर सौदे करते थे क्योंकि वह पैसा निवेशक की जेब से (TER के अंदर) जा रहा था। अब ब्रोकरेज की सीमा तय कर दी गई है:
कैश मार्केट: अधिकतम 0.06% (6 bps)
डेरिवेटिव: अधिकतम 0.02% (2 bps) इससे फंड मैनेजर अब फिजूल में या महंगे रेट पर शेयर नहीं खरीद पाएंगे, जिससे आपका पैसा बचेगा।
लंबी अवधि में बड़ा कॉर्पस: म्यूचुअल फंड में 0.10% या 0.20% की बचत भी मामूली लग सकती है, लेकिन 20 साल के निवेश में यह लाखों रुपये का अंतर पैदा करती है।
उदाहरण: अगर नए नियम से सालाना सिर्फ 0.15% की भी बचत होती है, तो 10,000 रुपये की मंथली SIP पर 12% रिटर्न मानें तो 20 साल बाद आपके पास पुराने नियम के मुकाबले लगभग 1.5 लाख रुपये से 2 लाख रुपये ज्यादा होंगे।
आप समझ पाएंगे पैसे का हिसाब: अब आपको अपने 'अकाउंट स्टेटमेंट' में साफ दिखेगा कि फंड चलाने की फीस (BER) कितनी है, सरकारी टैक्स (GST/STT) कितना गया और शेयर खरीदने की दलाली (Brokerage) कितनी लगी। जब खर्चों का एक-एक पैसा साफ दिखेगा, तो फंड हाउस अपनी परफॉर्मेंस सुधारने पर ज्यादा ध्यान देंगे न कि खर्च बढ़ाने पर।
SEBI ने अनिवार्य कर दिया है कि म्यूचुअल फंड हाउस (AMC) के सीनियर अधिकारियों और फंड मैनेजर्स को उनकी सैलरी का 10% से 20% तक हिस्सा उन्हीं स्कीम्स में निवेश करना होगा जिन्हें वे मैनेज कर रहे हैं। कोई एक 'स्मॉल कैप फंड' के मैनेजर हैं। पहले वे आपके पैसे को रिस्की शेयरों में डाल सकते थे, क्योंकि नुकसान होने पर उनका व्यक्तिगत पैसा नहीं लगा था।
लेकिन अब, अगर वे आपके पैसे से जोखिम भरा दांव खेलते हैं और फंड डूबता है, तो उनकी अपनी सैलरी का हिस्सा भी डूब जाएगा। इससे 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' खत्म होता है। अब फंड मैनेजर वही निर्णय लेगा जो फंड के लिए सही हो, क्योंकि अब उसका अपना पैसा भी तीन साल के लिए लॉक-इन है।
अब तक हेज फंड जैसी जटिल और एडवांस इन्वेस्टमेंट टेक्नीक केवल उन अमीरों के लिए थीं जो 1 करोड़ रुपये (AIFs) या 50 लाख रुपये (PMS) निवेश कर सकते थे। सेबी ने अब 10 लाख रुपये के न्यूनतम निवेश के साथ स्पेशल इन्वेस्टमेंट फंड्स (SIFs) की शुरुआत कर इस अंतर को पाट दिया है।
कल्पना कीजिए किसी के पास 15 लाख रुपये की बचत है। वह चाहता है कि उसका पैसा सिर्फ शेयर बढ़ने पर ही न कमाए, बल्कि जब बाजार गिरे, तब भी 'शॉर्ट सेलिंग' के जरिए उसे फायदा मिले। पहले उसके लिए यह मुमकिन नहीं था। लेकिन अब वह एसआईएफ के जरिए ऐसी लॉन्ग-शॉर्ट स्ट्रैटिजी में निवेश कर सकता है जो बाजार के उतार-चढ़ाव का फायदा उठाती है।
बेहतर तकनीक: अब आप डेरिवेटिव्स और अनहेजेड पोजिशन जैसी एडवांस स्ट्रैटिजी का हिस्सा बन सकते हैं।
मजबूत रेगुलेशन: ये फंड म्यूचुअल फंड के कड़े नियमों के तहत काम करते हैं, इसलिए यहां पारदर्शिता ज्यादा होती है।
मिडिल क्लास HNIs के लिए मौका: यह डॉक्टर, इंजीनियर या छोटे बिजनेस ओनर जैसे पेशेवर लोगों के लिए बेहतरीन है जो म्यूचुअल फंड से एक कदम आगे बढ़ना चाहते हैं।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने नॉमिनेशन के नियमों में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। अब निवेशक अपने बैंक खातों के लिए चार नॉमिनी और म्यूचुअल फंड/डीमैट खातों के लिए 10 नॉमिनी तक नियुक्त कर सकते हैं।
1. एक साथ नॉमिनेशन: आप तय कर सकते हैं कि आपके बाद सभी नॉमिनी को संपत्ति का कितना-कितना प्रतिशत हिस्सा एक साथ मिलेगा।
2. क्रमिक नॉमिनेशन: आप नॉमिनी का क्रम तय कर सकते हैं, जहां पहले नॉमिनी की मृत्यु के बाद ही दूसरे नॉमिनी का अधिकार लागू होगा।
यह सुधार शोक संतप्त परिवारों के लिए संपत्ति हस्तांतरण की प्रक्रिया को बेहद सरल बनाता है। अब संपत्ति का दावा करने के लिए हलफनामे (affidavits) और क्षतिपूर्ति बांड्स (indemnity bonds) जैसे जटिल कानूनी दस्तावेजों की जरूरत खत्म हो गई है।
अब प्रॉपर्टी ट्रांसफर के लिए केवल मृत्यु प्रमाण पत्र और नॉमिनी का केवाईसी ही काफी है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि नॉमिनी कानूनी उत्तराधिकारियों के लिए एक ट्रस्टी के रूप में कार्य करता है, लेकिन संपत्ति का दावा करने के लिए वह वित्तीय संस्थान के लिए एकमात्र संपर्क बिंदु होता है, जिससे प्रक्रिया तेज और सरल हो जाती है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में आयकर छूट की सीमा 7 लाख रुपये से बढ़ाकर 12 लाख रुपये करने का ऐलान किया था। न्यू टैक्स रिजीम चुनने वाले करदाताओं को धारा 87A के तहत मिलने वाली बढ़ाकर 60,000 रुपये कर दी गई है। इस कारण 12 लाख रुपये तक की आय पर टैक्स देनदारी शून्य हो जाती है।
| वार्षिक कर योग्य आय ( ₹) | लागू कर दर (नई व्यवस्था) |
|---|---|
| 0 से 4,00,000 | शून्य |
| 4,00,001 से 8,00,000 | 5% |
| 8,00,001 से 12,00,000 | 10% |
| 12,00,001 से 16,00,000 | 15% |
| 16,00,001 से 20,00,000 | 20% |
| 20,00,001 से 24,00,000 | 25% |
| 24,00,000 से ऊपर | 30% |
अब नई टैक्स व्यवस्था में भी वेतनभोगी कर्मचारियों को 50,000 रुपये की जगह 75,000 रुपये के स्टैंडर्ड डिडक्शन का लाभ मिलता है। इस तरह, 12 लाख 75 हजार रुपये की सालाना आमदनी पर कोई टैक्स नहीं लगता है।
सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक यह है कि 30% की उच्चतम कर दर अब 15 लाख रुपये के बजाय 24 लाख रुपये से ऊपर की आय पर लागू होती है। जिनकी आय 15 लाख रुपये है, वे अब 30% स्लैब के बजाय 15% स्लैब में आ गए हैं।
| नियम की श्रेणी | पिछला नियम | नया 2025 नियम | कौन प्रभावित होगा? |
|---|---|---|---|
| आयकर (Standard Deduction) | ₹50,000 की मानक कटौती। | ₹75,000 की मानक कटौती (1 अप्रैल, 2025 से प्रभावी)। | नई कर व्यवस्था (NTR) चुनने वाले वेतनभोगी और पेंशनभोगी। |
| आयकर (Tax Slabs & Rebate) | ₹3 लाख तक कर मुक्त; ₹15 लाख के ऊपर 30% कर; ₹7 लाख तक ₹25,000 की छूट (Section 87A)। | ₹4 लाख तक कर मुक्त; 30% कर अब ₹24 लाख के ऊपर; ₹12 लाख तक की आय पर ₹60,000 की छूट के कारण शून्य कर। | नई कर व्यवस्था (NTR) अपनाने वाले सभी व्यक्तिगत करदाता। |
| आयकर (Surcharge) | उच्चतम अधिभार (Surcharge) दर 37%। | उच्चतम अधिभार को घटाकर 25% पर सीमित कर दिया गया है। | ₹5 करोड़ से अधिक वार्षिक आय वाले उच्च-संपत्ति व्यक्ति (HNIs)। |
| NPS (निकासी नियम) | अधिकतम 60% एकमुश्त निकासी, 40% की एन्युइटी (Annuity) अनिवार्य थी। | अब 80% तक एकमुश्त निकासी की अनुमति; अनिवार्य एन्युइटी घटकर 20% रह गई है। | गैर-सरकारी (All Citizen & Corporate) NPS सब्सक्राइबर। |
| NPS (अन्य सुविधाएँ) | निकासी की आयु सीमा 70/75 वर्ष; 5 साल का लॉक-इन। | निकासी आयु सीमा बढ़कर 85 वर्ष हुई; समय से पहले निकास (Premature Exit) पर 5 साल का लॉक-इन समाप्त। | सभी NPS खाताधारक जो लंबी अवधि तक निवेशित रहना चाहते हैं। |
| EPF (आंशिक निकासी) | 13 जटिल श्रेणियाँ; आंशिक निकासी के लिए 5-7 साल की सेवा अनिवार्य थी। | 3 सरल श्रेणियाँ (आवश्यक ज़रूरतें, आवास, विशेष परिस्थितियाँ); सेवा अवधि घटकर केवल 12 महीने। | ईपीएफओ (EPFO) के सभी सदस्य। |
| EPF (सुरक्षा गार्डरेल) | बेरोजगारी के दौरान पूरा फंड निकाला जा सकता था (2 महीने बाद)। | 25% बैलेंस नियम: बेरोजगारी के 1 महीने बाद 75% निकासी, शेष 25% को कम से कम 1 वर्ष तक खाते में रखना अनिवार्य। | वे कर्मचारी जो नौकरी बदलते हैं या बेरोजगारी का सामना करते हैं। |
| म्युचुअल फंड (लागत संरचना) | TER (Total Expense Ratio) में सभी खर्च और कर शामिल थे। | BER (Base Expense Ratio): मूल प्रबंधन शुल्क को वैधानिक लेवी (Statutory Levies) और ब्रोकरेज से अलग किया गया। | म्युचुअल फंड के सभी खुदरा और संस्थागत निवेशक। |
| नामांकन (Nomination) | नामांकित व्यक्तियों की संख्या सीमित थी। | म्युचुअल फंड में 10 और बैंक खातों में 4 नामांकित व्यक्ति तक संभव (1 मार्च, 2025 से MF के लिए)। | सभी डीमैट, म्युचुअल फंड और बैंक खाताधारक। |
केंद्र सरकार ने अक्तूबर महीने में 'आपकी पूंजी, आपका अधिकार' अभियान शुरू किया। पूरे देश में चलाए जा रहे इस अभियान का मुख्य उद्देश्य उन करोड़ों रुपये को उनके असली मालिकों या उनके वारिसों तक पहुंचाना है, जो सालों से बैंकों, बीमा कंपनियों और शेयर बाजार में लावारिस (Unclaimed) पड़े हैं।
इस योजना के तहत आप घर बैठे यह पता लगा सकते हैं कि क्या आपके या आपके परिवार का कोई 'खोया हुआ पैसा' सिस्टम में जमा है। इसे चेक करने के लिए सरकार ने अलग-अलग संपत्तियों के लिए डिजिटल पोर्टल बनाए हैं।
ढूंढना हुआ आसान: अकेले UDGAM पोर्टल पर देश के 30 से ज्यादा मुख्य बैंक जुड़े हैं, जो कुल लावारिस जमा का लगभग 90% हिस्सा कवर करते हैं। आपको बस अपना नाम और मोबाइल नंबर डालकर सर्च करना होता है।
सरकार की सक्रियता: इस अभियान के तहत जिला स्तर पर विशेष कैंप लगाए जा रहे हैं ताकि ग्रामीण इलाकों के लोगों को भी उनके पुराने खातों की जानकारी मिल सके।
कोई समय सीमा नहीं: अगर आपका पैसा 10 साल से ज्यादा समय से बैंक में पड़ा है, तो वह 'DEAF' (Depositor Education and Awareness Fund) में चला जाता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि आप इसे कभी भी क्लेम कर सकते हैं, इसकी कोई एक्सपायरी डेट नहीं है।
ब्याज के साथ वापसी: बैंक न केवल आपका मूल पैसा लौटाएगा, बल्कि उस पर लागू होने वाला ब्याज भी आपको दिया जाएगा।
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