
सोने-चांदी पर आयात शुल्क छह से 15 प्रतिशत करने के सिर्फ तीन दिन बाद सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है। शनिवार, 16 मई को विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने अधिसूचना जारी कर चांदी के आयात को 'फ्री' कैटिगरी से हटाकर 'प्रतिबंधित' श्रेणी में डाल दिया, और यह तुरंत प्रभाव से लागू है।
सीधे शब्दों में कहें तो अब तक जो चांदी कारोबारी आसानी से मंगा सकते थे, उसके लिए सरकारी लाइसेंस या मंजूरी लेनी होगी। यह बदलाव कोई अकेला फैसला नहीं, बल्कि कीमती धातुओं के आयात पर कसते जा रहे सरकारी शिकंजे की एक कड़ी है। सवाल यह है कि इसका असर कारोबार, निर्यातक और आम खरीदार पर कैसे पड़ेगा।
डीजीएफटी की अधिसूचना के मुताबिक चांदी की आयात नीति 'मुक्त' से 'प्रतिबंधित' कर दी गई है। इसमें सोने और प्लैटिनम के साथ मिलाई गई चांदी भी शामिल है। यह बदलाव ITC (HS) 2022 की आयात नीति अनुसूची के अध्याय 71 की दो प्रमुख टैरिफ श्रेणियों पर लागू होता है। इनमें 99.9% या उससे अधिक शुद्धता वाली चांदी की सिल्लियां और चांदी की अन्य सिल्लियां आती हैं।
इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, कच्ची चांदी और पाउडर समेत अर्ध-निर्मित रूप भी इसमें शामिल हैं। 'प्रतिबंधित' श्रेणी का मतलब है कि अब आयात से पहले लाइसेंस या सरकारी मंजूरी, और अध्याय 71 की नीति शर्त संख्या 7 के तहत अतिरिक्त अनुपालन जरूरी होगा।
यह फैसला अचानक नहीं आया। तेल की ऊंची कीमतों के चलते देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ा है। सरकार कीमती धातुओं का आयात घटाकर इस दबाव को हल्का करना चाहती है। 13 मई को सोने-चांदी पर आयात शुल्क 6% से 15% किया गया था। इसमें 10% बेसिक कस्टम ड्यूटी और 5% कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर (AIDC) शामिल है।
इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील भी की थी। आंकड़ा भी इसकी पुष्टि करता है। कम मात्रा के बावजूद 2025-26 में सोने का आयात 24% से अधिक बढ़कर रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर रहा, जिसमें सबसे बड़ा स्रोत स्विट्जरलैंड था।
अब तक चांदी आयात मुख्यतः सिर्फ रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के दायरे में था और कारोबारी इसे आसानी से मंगा सकते थे। नई व्यवस्था में हर खेप के लिए सरकारी मंजूरी का चरण जुड़ जाएगा। इससे प्रक्रिया लंबी होगी, अनुपालन का बोझ बढ़ेगा और आपूर्ति में देरी संभव है। शुल्क में भारी बढ़ोतरी पहले ही लागत बढ़ा चुकी है। अब लाइसेंस की अनिवार्यता इसे और कसेगी। इसका सीधा असर आभूषण कारोबारियों और छोटे जौहरियों पर पड़ेगा, और बढ़ी लागत अंततः खुदरा खरीदार तक पहुंच सकती है।
रत्न-आभूषण निर्यातकों के लिए सरकार ने एडवांस ऑथराइजेशन (AA) स्कीम के नियम भी कसे हैं। इसके तहत निर्यात के लिए शुल्क-मुक्त सोना मिलता है। अब प्रति लाइसेंस सोना आयात की सीमा 100 किलो होगी, पहली बार आवेदन करने वालों के कारखानों का अनिवार्य भौतिक निरीक्षण होगा, और दोबारा लाइसेंस तभी मिलेगा जब पिछले लाइसेंस के कम-से-कम 50% निर्यात दायित्व पूरे हों।
साथ ही, चार्टर्ड अकाउंटेंट से प्रमाणित पाक्षिक रिपोर्ट और क्षेत्रीय कार्यालयों से मासिक समेकित रिपोर्ट डीजीएफटी मुख्यालय को देनी होगी। यह सख्ती निर्यातकों की कार्यशील पूंजी और लचीलेपन दोनों को सीमित करेगी।
हर सख्ती का एक उल्टा पहलू भी होता है। ऑल इंडिया जेम्स एंड ज्वेलरी काउंसिल जैसे उद्योग संगठनों ने आगाह किया है कि ऊंचे शुल्क और कड़े प्रतिबंध ग्रे मार्केट और तस्करी को बढ़ावा दे सकते हैं। यानी सरकार जिस आयात को औपचारिक चैनल से रोकना चाहती है, वह अनौपचारिक रास्तों से लौट सकता है जिससे राजस्व और निगरानी दोनों कमजोर हो सकते हैं। यही इस नीति का असली संतुलन-बिंदु है। विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा बनाम अनौपचारिक बाजार के पनपने का खतरा।
कुल मिलाकर सरकार का संदेश साफ है कि कीमती धातुओं का आयात घटाकर विदेशी मुद्रा भंडार को सहेजना बड़ी प्राथमिकता है। पर असली परीक्षा अनुपालन में होगी। क्या लाइसेंस व्यवस्था सुचारू रहती है या ग्रे मार्केट को रास्ता मिलेगा? आने वाले हफ्तों में चांदी की घरेलू कीमत, बुलियन बिजनेस की प्रतिक्रिया और निर्यातकों के दबाव पर नजर रखना जरूरी होगा।
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