
Health Insurance Porting: कई लोग हेल्थ इंश्योरेंस तो ले लेते हैं, लेकिन कुछ सालों बाद लगता है कि प्रीमियम ज्यादा है, सर्विस ढीली है या कवरेज कम है। ऐसे में पोर्टिंग यानी बीमा कंपनी बदलना एक अच्छा ऑप्शन लगता है। लेकिन सिर्फ कंपनी बदलने से काम नहीं चलता, क्लेम पास होगा या नहीं, ये कई बातों पर निर्भर करता है।
हर हेल्थ पॉलिसी में कुछ बीमारियों पर वेटिंग पीरियड होता है, मतलब उस बीमारी पर कुछ साल तक क्लेम नहीं मिलेगा। अगर आपने दो साल पुरानी पॉलिसी को पोर्ट किया और उस बीमारी पर तीन साल का वेटिंग पीरियड था, तो नई कंपनी बाकी एक साल फिर से जोड़ सकती है। इसलिए पहले ही पूछ लें कि कौन-कौन से वेटिंग पीरियड ट्रांसफर हो रहे हैं।
पोर्टिंग के वक्त पूरी और सही जानकारी दें
पुरानी पॉलिसी और मेडिकल रिकॉर्ड संभालकर रखें
नई कंपनी से पूछें कि कौन-कौन से वेटिंग पीरियड ट्रांसफर हुए हैं
अगर कोई इलाज चल रहा है या सर्जरी प्लान है, तो पहले कवर कन्फर्म करें
अच्छी डॉक्युमेंटेशन और क्लियर कम्युनिकेशन से बाद की परेशानी से बचा जा सकता है।
अगर आप बेहतर कवरेज, कम प्रीमियम या अच्छी सर्विस चाहते हैं, तो पोर्टिंग एक स्मार्ट मूव हो सकता है। बस शर्त ये है कि आप नियमों को समझकर और सही जानकारी के साथ कदम उठाएं। हेल्थ इंश्योरेंस पोर्ट करना आज के समय में एक जरूरी सुविधा है, लेकिन इसका सही फायदा तभी मिलेगा जब आप हर पहलू को समझकर आगे बढ़ें।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। ऊपर दिए गए विचार और सिफारिशें व्यक्तिगत विश्लेषकों या ब्रोकिंग कंपनियों के हैं, न कि मिंट के। हम निवेशकों को सलाह देते हैं कि वे कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले प्रमाणित विशेषज्ञों से जांच करें।
Oops! Looks like you have exceeded the limit to bookmark the image. Remove some to bookmark this image.