
Best health insurance review tips: आजकल के दौर में हेल्थ इंश्योरेंस होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसका पर्याप्त होना भी जरूरी है। अस्पताल के खर्च और मेडिकल महंगाई जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, उसमें पुरानी पॉलिसी छोटी पड़ सकती है। हर साल अपनी पॉलिसी की समीक्षा करना आपकी वित्तीय सेहत के लिए एक स्मार्ट कदम है। यह न केवल आपको अस्पताल के भारी बिलों से बचाएगा, बल्कि जरूरत के समय मानसिक शांति भी देगा। आइए जानते हैं कि आपको अपनी पॉलिसी में किन बदलावों और बारीकियों पर नजर रखनी चाहिए।
देश में मेडिकल महंगाई हर साल लगभग 13-14 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। बजाज जनरल इंश्योरेंस के अमरनाथ सक्सेना का कहना है कि पॉलिसीधारकों को हर दो साल में अपनी हेल्थ इंश्योरेंस की रकम दोबारा चेक करनी चाहिए। इसमें परिवार का बढ़ता आकार और बदलती स्वास्थ्य जरूरतों का ध्यान रखना जरूरी है। इसके अलावा, शहर का भी बड़ा असर पड़ता है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में इलाज का खर्च छोटे शहरों के मुकाबले 30 से 50 प्रतिशत तक ज्यादा होता है।
सिर्फ बड़ा कवर देखकर खुश न हों, बल्कि पॉलिसी की शर्तों को भी ध्यान से पढ़ें। बजाजकैपिटल इंश्योरेंस के सीईओ वेंकटेश नायडू बताते हैं कि कमरे के किराए की सीमा वास्तविक कवरेज को कम कर सकती है। अस्पताल के कई अन्य खर्च कमरे की श्रेणी से जुड़े होते हैं, इसलिए आनुपातिक कटौती से बचने के लिए पॉलिसी को अच्छे से चेक करें। साथ ही, खास बीमारियों पर लगी सब-लिमिट्स पर भी गौर करें।
शादी होना या बच्चे का जन्म जैसे बड़े बदलावों पर कवरेज बढ़ाना जरूरी है। वेंकटेश नायडू के अनुसार, अगर आप नौकरी बदल रहे हैं और कंपनी के इंश्योरेंस से बाहर हो रहे हैं, तो तुरंत अपनी पर्सनल पॉलिसी को रीव्यू करें। प्रीमियम बचाने के चक्कर में कवरेज कम करना भारी पड़ सकता है। उम्र बढ़ने के साथ नया कवर मिलना मुश्किल हो जाता है और आज की छोटी बचत भविष्य में आपकी जेब पर भारी पड़ सकती है।
आज के समय में बेसिक प्लान के बजाय आधुनिक फीचर्स वाली पॉलिसी चुननी चाहिए। पॉलिसीबाजार के सिद्धार्थ सिंघल के मुताबिक, आपकी पॉलिसी में नो-क्लेम बोनस प्रोटेक्शन और बीमा राशि की असीमित बहाली होनी चाहिए। इसके अलावा, OPD खर्च, मानसिक स्वास्थ्य और डे-केयर प्रक्रियाओं का कवर भी अब जरूरी हो गया है। पहले से मौजूद बीमारियों के लिए कम वेटिंग पीरियड वाली पॉलिसी ज्यादा लचीलापन देती है।
पॉलिसी कितनी कारगर है, यह उसके क्लेम सेटलमेंट रिकॉर्ड से पता चलता है। अमरनाथ सक्सेना सलाह देते हैं कि इंश्योरेंस कंपनी का रिकॉर्ड और उनके हॉस्पिटल नेटवर्क की जांच जरूर करें। प्रतिष्ठित अस्पतालों में कैशलेस इलाज की सुविधा होना बहुत महत्वपूर्ण है। वहीं, इंश्योरेंस समाधान की शिल्पा अरोड़ा कहती हैं कि कम प्रीमियम के लालच में न आएं, क्योंकि अक्सर इनमें छिपी हुई शर्तें और पुरानी बीमारियों के लिए लंबा वेटिंग पीरियड होता है।
वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य जोखिम अधिक होते हैं। सिद्धार्थ सिंघल का सुझाव है कि बुजुर्गों को ऐसी योजनाएं लेनी चाहिए जिनमें को-पेमेंट 10 प्रतिशत से ज्यादा न हो। पॉलिसी में सर्जरी पर कोई सब-लिमिट नहीं होनी चाहिए और आजीवन रिन्यूअल की सुविधा मिलनी चाहिए। बुजुर्गों के लिए पहले से मौजूद बीमारियों का वेटिंग पीरियड भी कम से कम होना बेहतर है। यह पहले दिन से या ज्यादा से ज्यादा एक साल होना चाहिए।
Disclaimer: यह लेख केवल जानकारी के लिए है। निवेश करने से पहले किसी प्रमाणित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। मिंट हिंदी आपके किसी भी निर्णय और उसके परिणाम के लिए तनिक भी उत्तरदायी नहीं है।
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