हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी पोर्ट करवाते वक्त ये बातें ध्यान रखें बुजुर्ग, वरना होगा नुकसान

Policy Portability Irdai Regulations: एक स्टडी से पता चला है कि बुजुर्ग लोग पहले से ज्यादा हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी को पोर्ट करवाने लगे हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि पॉलिसी पोर्ट करवाने से पहले किन-किन बातों पर विचार किया जाना चाहिए। 

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड12 Sep 2025, 04:14 PM IST
हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी पोर्ट करवा रहे हैं बुजुर्ग (सांकेतिक तस्वीर)
हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी पोर्ट करवा रहे हैं बुजुर्ग (सांकेतिक तस्वीर) (Pixabay)

Health Insurance for Senior Citizens: एक दशक पहले बुजुर्गों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस ले पाना भी मुश्किल था। लेकिन आज के दौर में बुजुर्ग न केवल आसानी से हेल्थ इंश्योरेंस खरीद रहे हैं बल्कि थोड़ी सी भी असुविधा होने पर फटाफट दूसरी कंपनी में पोर्ट भी करवा रहे हैं। पॉलिसीबाजार.कॉम का आंकड़ा बताता है कि बीते दो वर्षों में बुजुर्गों में पॉलिसी पोर्ट करने की दर 11% बढ़ गई है। पॉलिसीबाजार.कॉम ने बताया है कि 2022-23 में 18% बुजुर्गों ने अपनी पॉलिसी पोर्ट करवाई थी। 2024-25 में यह आंकड़ा बढ़कर 29% हो गया।

इसलिए फटाफट इंश्योरेंस पॉलिसी पोर्ट करवाने लगे हैं बुजुर्ग

दरअसल, बुजुर्गों में हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी पोर्ट करवाने का चलन इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि बीमा नियामक संस्था IRDAI ने नई और पोर्ट की गई पॉलिसीज के लिए उम्र सीमा की शर्त हटा रही है और वेटिंग पीरियड्स जैसे फायदों को जारी रखने की अनुमति दे रही है। बुजुर्गों के लिए विशेष प्लांस, वेटिंग पीरियड्स को कम करने वाले राइडर्स, आम बीमारियों से ग्रस्त बुजुर्गों को भी बिना वेटिंग पीरियड के इंश्योरेंस प्लान जैसी सुविधाओं ने भी पॉलिसी पोर्टिंग का रास्ता आसान बना दिया है।

ऐसा हो तो पॉलिसी पोर्ट करवाना लाजिमी

हालांकि, यह भी सच है कि वरिष्ठ नागरिकों को स्वास्थ्य बीमा लेने में कठिन शर्तों का सामना करना पड़ता है। बीमा कंपनियां उन्हें स्वास्थ्य जांच, स्वास्थ्य की स्थिति के प्रमाण और इंश्योरेंस प्रीमियम, हर मोर्चे पर ज्यादा कठोर कसौटियों पर कसती हैं। इस कारण बुजुर्गों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस लेना आज भी दुरूह है। इतनी कठिन शर्तों से गुजारकर इंश्योरेंस देने के बाद भी कंपनियां अगर सर्विस में कोताही बरते तो बुजुर्गों को अपनी पॉलिसी पोर्ट करवाने में हिचकना नहीं चाहिए।

अगर इंश्योरेंस कंपनियां अपने बुजुर्ग ग्राहकों को नए फीचर्स का लाभ नहीं दें तो भी बुजुर्ग पॉलिसी पोर्टिंग की सोच सकते हैं। अगर मौजूदा इंश्योरेंस कंपनी जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां को इंश्योरेंस कवर में शामिल नहीं कर रही है या ओपीडी में इलाज की सुविधा नहीं दे रही है तो बुजुर्ग ग्राहक ऐसी सुविधाएं देने वाली कंपनी का रुख जरूर करेंगे।

पॉलिसी पोर्ट करवाने में कुछ दिक्कतें भी

हालांकि, हर बजुर्ग के लिए हेल्थ इंश्योरेंस प्लान को पोर्ट करना फायदेमंद नहीं होता है। इनमें वैसे लोग शामिल हैं जिन्होंने मौजूदा इंश्योरेंस प्लान में कई बार क्लेम ले चुके हैं। साथ ही, अगर बुजुर्ग को बीमारियों ने घेर रखा है तो भी उन्हें पॉलिसी पोर्ट करवाने में दिक्कत होगी क्योंकि दूसरी कोई कंपनी ऐसे लोगों को इंश्योरेंस कवर देने में दिलचस्पी शायद ही लेगी।

बुजुर्गों को अपनी पॉलिसी पोर्ट करवाते वक्त वेटिंग पीरियड्स, मोराटोरियम बेनिफिट्स और नो-क्लेम बोनस ट्रांसफर का ध्यान रखना चाहिए। आइए इन तीनों फायदों को ठीक से समझते हैं।

  1. वेटिंग पीरियड (Waiting Period)

वेटिंग पीरियड वह समय होता है जिसके दौरान नई पॉलिसी खरीदने पर कुछ खास बीमारियों या स्थितियों के लिए क्लेम नहीं किया जा सकता है। यह समय पॉलिसी शुरू होने की तारीख से गिना जाता है। पोर्टिंग के दौरान आपके पिछले इंश्योरर के साथ बिताया गया समय आपके नए इंश्योरर के वेटिंग पीरियड में जोड़ा जाता है।

उदाहरण: आपने 3 साल से एक ही हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ली हुई है। आपकी पुरानी पॉलिसी में प्री-एग्जिस्टिंग बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड 4 साल का था। आपने अपनी पॉलिसी को एक नई कंपनी में पोर्ट करवाया। नई कंपनी की पॉलिसी में भी प्री-एग्जिस्टिंग बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड 4 साल का है।

पोर्टिंग के कारण, आपको अब पूरे 4 साल का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। आपके पिछले 3 साल को इसमें गिना जाएगा और आपको केवल 1 साल का और इंतजार करना होगा। यह सुविधा आपको यह सुनिश्चित करने में मदद करती है कि पॉलिसी पोर्ट करने के बाद भी आप अपनी पिछली पॉलिसी के लाभों को नहीं खोते हैं।

2. मोराटोरियम बेनिफिट (Moratorium Benefit)

मोराटोरियम पीरियड 5 साल का एक समय होता है, जिसके बाद बीमा कंपनी किसी भी दावे को आपकी पुरानी बीमारी या जानकारी छिपाने के आधार पर खारिज नहीं कर सकती, जब तक कि यह धोखाधड़ी साबित न हो। पोर्टिंग के दौरान, आपने अपनी पिछली कंपनी के साथ जितना मोराटोरियम पीरियड पूरा कर लिया है, वह आपके नए इंश्योरर के साथ भी जारी रहता है।

उदाहरण: आपने 4 साल से अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ली हुई है और इस दौरान कोई भी जानकारी नहीं छिपाई है। आप अपनी पॉलिसी को पोर्ट कर रहे हैं। आपके नए इंश्योरर के साथ भी मोराटोरियम पीरियड लागू होगा। पोर्टिंग के कारण आपके पिछले 4 साल को इसमें गिना जाएगा और आपको केवल 1 साल का और इंतजार करना होगा ताकि आपका मोराटोरियम पीरियड पूरा हो जाए। इसके बाद बीमा कंपनी आपके दावे को जानकारी छिपाने के आधार पर खारिज नहीं कर सकती। यह पॉलिसीधारक को सुरक्षा देता है और उसे बेवजह क्लेम खारिज होने के डर से बचाता है।

3. नो-क्लेम बोनस ट्रांसफर (No-Claim Bonus Transfer)

नो-क्लेम बोनस (NCB) वह इनाम होता है जो बीमा कंपनियां पॉलिसीधारक को तब देती हैं जब वह पॉलिसी वर्ष के दौरान कोई क्लेम नहीं करता। यह आमतौर पर बीमा राशि में वृद्धि के रूप में होता है। पोर्टिंग के दौरान, यह नो-क्लेम बोनस भी नई पॉलिसी में ट्रांसफर हो जाता है।

उदाहरण: आपके पास एक पॉलिसी है जिसकी बीमा राशि 5 लाख है। आपने पिछले 2 साल में कोई क्लेम नहीं किया है। आपकी पुरानी कंपनी ने आपको हर साल 10% का NCB दिया, जिससे आपकी बीमा राशि 6 लाख हो गई है। आप इस पॉलिसी को नई कंपनी में पोर्ट करना चाहते हैं। पोर्टिंग के कारण, आपकी नई पॉलिसी की शुरुआती बीमा राशि 6 लाख होगी, न कि 5 लाख। आपका पुराना NCB नए बीमाकर्ता के साथ भी जारी रहेगा।

पोर्टिंग के वक्त इन बातों का रखें ध्यान

पोर्टिंग के वक्त नई कंपनी से ऊपर की सभी शर्तें लिखित में लें। साथ ही यह भी देखें कि जिस कंपनी में आप अपनी पॉलिसी पोर्ट करवा रहे हैं, उसका क्लेम सेटलमेंट रेशियो क्या है और उसके नेटवर्क में कितने और कैसे-कैसे हॉस्पिटल हैं।

अगर किसी खास बीमारी, विशेष इलाज या हॉस्पिटल के रूम रेंट आदि पर को लिमिट लागू हो तो ऐसी कंपनी में पॉलिसी पोर्ट करवाने से बचें। साथ ही यह भी ध्यान रहे कि इलाज के वक्त पूरा पैसा इंश्योरेंस कंपनी दे ना कि कुछ हिस्सा आपको भी देना पड़े। अगर देना भी पड़े तो वह हिस्सा छोटा या नाम मात्र का हो ताकि इलाज के वक्त आपको यह रकम भारी न पड़े। यह गांठ बांध लीजिए कि कम प्रीमियम के प्लांस में इलाज के वक्त आपको भी मोटी रकम भरनी पड़ती है और कई तरह की सीमाएं भी होती हैं।

कुल मिलाकर, इंश्योरेंस पॉलिसी पोर्ट करने से पहले नफा-नुकसान पर आकलन करें। रीन्यूअल से 45 से 60 दिन पहले पोर्टिंग प्रॉसेस शुरू कर दें। इंश्योरेंस क्लेम के वक्त विवाद नहीं हो, इसके लिए पहले से मौजूद बीमारियों (PEDs) को छिपाएं नहीं बल्कि कंपनी को साफ-साफ बताएं। ध्यान रखें कि पोर्ट करवाने पर नई कंपनी भी उतना ही कवर देगी जितनी आपकी पिछली कंपनी से मिली थी। अगर आप नए कवरेज या फीचर्स चाहते हैं तो आपको नया वेटिंग पीरियड मिल सकता है।

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी के मकसद से लिखा गया है। इंश्योरेंस संबंधी आपके किसी भी फैसले के लिए मिंट हिंदी जिम्मेदार नहीं है।

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