दिल्ली में संपत्ति विवाद का अजीबोगरीब मामला सामने आया। माता-पिता का इकलौता संतान मुंह देखते रह गया और उनके पिता की संपत्ति बिना उनकी जानकारी की दो बार बिक गई। जब उन्हें पता चला तो उन्होंने कानून का दरवाजा खटखटाया, लेकिन किसी ने एक न सुनी। आखिरकार दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे और वहां मामले पर गौर किया गया।
किराएदार ने बेच दिया मकान
इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, एक व्यक्ति ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि उनके पिता के नाम पर राजौरी गार्डन में 161.55 गज का एक मकान है। 14 जुलाई, 1981 को पिता की मृत्यु हो गई। फिर विधवा की अपनी बहू के साथ झगड़ा होने लगा और झगड़ा इतना बढ़ा कि जनवरी 1986 में पति-पत्नी को घर छोड़ना पड़ा। राजौरी गार्डन के इस घर में विधवा मां रह रही थी और एक परिवार किराए पर रह रहा था। मार्च 1987 में विधवा और फिर नवंबर 1987 में किराएदार का निधन हो गया।
मकान मालिक के इकलौते बेटे के उड़ गए होश
कोविड महामारी के वक्त उस व्यक्ति ने अपना मकान बेचने की योजना बनाई। फिर उसे जो जानकारी मिली, उससे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। पता चला कि उसकी विधवा मां ने एक विल बनाकर वह मकान किराएदार के नाम कर दिया था।
फिर मकान का एक हिस्सा किसी अन्य महिला को बेच दिया गया। उस व्यक्ति ने दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) से लेकर पुलिस-प्रशासन तक, सबसे गुहार लगाई लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। बाद में उसने तीस हजारी कोर्ट में आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाया। वहां भी लेटलतीफी होती देख वह दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गए।
आखिरकार दिल्ली हाई कोर्ट ने दी अंतरिम राहत
दिल्ली हाई कोर्ट ने 21 जनवरी को अपने अंतरिम आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता की मां का विल भरोसेमंद नहीं है क्योंकि उस पेपर पर एक ही गवाह का दस्तखत है जबकि कानून के अनुसार कम से कम दो गवाह के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं। दूसरी तरफ वह विल भी रजिस्टर्ड नहीं है। हाई कोर्ट ने कहा कि अंतिम आदेश तक उस मकान की यथास्थिति बनी रहेगी और कोई उसमें कुछ भी नहीं करेगा।