गुरुजी ने बैंक में जमा किए ₹1.33 करोड़, नहीं भरा ITR, फिर भी जीत गए केस, जानिए कैसे हुआ कमाल

Income Tax Notice: कर्नाटक के मैसूर के एक रिटायर्ड स्कूल टीचर ने असेसमेंट ईयर 2015-16 में बैंक खातों में कुल ₹1.33 करोड़ से ज्यादा कैश जमा किया था और उस साल ITR भी दाखिल नहीं किया था। इसके बाद इनकम टैक्स विभाग ने उनके खिलाफ री-असेसमेंट की कार्रवाई शुरू की। हालांकि बाद में उन्हें बड़ी राहत मिली।

Jitendra Singh( विद इनपुट्स फ्रॉम लाइवमिंट.कॉम)
अपडेटेड9 Aug 2026, 04:41 PM IST
Income Tax Notice: 26 दिन बाद पूरा केस ही पलट गया।
Income Tax Notice: 26 दिन बाद पूरा केस ही पलट गया।

Income Tax Notice: बैंक खाते में बड़ी रकम कैश जमा हो और ITR दाखिल भी न किया गया हो, तो इनकम टैक्स विभाग की नजर पड़ना स्वाभाविक है। कर्नाटक के मैसूर के एक रिटायर्ड स्कूल टीचर के साथ भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने असेसमेंट ईयर 2015-16 में अपने बैंक खातों में कुल ₹1,33,12,701 की रकम से जुड़े लेनदेन किए थे। इस साल उन्होंने ITR दाखिल नहीं किया था।

CBDT के रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम में ये लेनदेन सामने आने के बाद इनकम टैक्स विभाग ने मामले की जांच शुरू की। विभाग को जानकारी थी कि टैक्सपेयर की आमदनी के स्रोत खेती और सेविंग बैंक खातों पर मिलने वाला ब्याज था, लेकिन उस साल की वास्तविक आय का ITR में खुलासा नहीं किया गया था।

कैश जमा का पूरा मामला क्या था?

CBDT के रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम में सामने आए रिकॉर्ड के अनुसार बैंक खातों में कई बड़े कैश डिपॉजिट हुए थे। इनमें बैंक ऑफ बड़ौदा के सेविंग अकाउंट में ₹13 लाख, केनरा बैंक में ₹60 लाख और ₹50,000 या उससे अधिक की दो अन्य कैश जमा के जरिए ₹60 लाख शामिल थे। इसके अलावा बैंक ऑफ बड़ौदा से ₹12,701 का ब्याज भी रिकॉर्ड में था। इन सभी रकम को जोड़ने पर कुल राशि ₹1,33,12,701 बैठती थी।

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ITR नहीं भरा तो विभाग ने भेजा नोटिस

ITR दाखिल नहीं किए जाने और बैंक खातों में इतनी बड़ी रकम के लेनदेन सामने आने के बाद इनकम टैक्स विभाग ने कार्रवाई शुरू की। सबसे पहले 26 मार्च 2022 को आयकर अधिनियम की धारा 148A(b) के तहत नोटिस जारी किया गया। इस नोटिस के जरिए टैक्सपेयर से पूछा गया कि उनके मामले में री-असेसमेंट की कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की जानी चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक टैक्सपेयर ने इस नोटिस का जवाब नहीं दिया और न ही जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय मांगा। इसके बाद 26 अप्रैल 2022 को असेसिंग ऑफिसर ने धारा 148A(d) के तहत आदेश पारित किया और उसी दिन धारा 148 के तहत नोटिस जारी कर दिया।

बाद में ITR भरा, लेकिन वह भी हो गया अमान्य

धारा 148 के नोटिस के बाद रिटायर्ड टीचर ने ITR दाखिल किया, लेकिन उसे ई-वेरिफाई नहीं किया गया। इसके कारण वह ITR अमान्य माना गया। इसके बाद असेसिंग ऑफिसर ने धारा 142(1) के तहत नोटिस और अलग-अलग तारीखों पर शो-कॉज नोटिस जारी किए। टैक्सपेयर ने इनका कुछ हद तक पालन किया। आखिरकार 29 फरवरी 2024 को धारा 147 के साथ धारा 144 के तहत री-असेसमेंट ऑर्डर पारित किया गया। इसमें उनकी कुल असेस्ड इनकम करीब ₹48.85 लाख तय की गई और करीब ₹48.73 लाख की राशि को धारा 69A के तहत अनएक्सप्लेंड मनी के रूप में जोड़ा गया।

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CIT(A) से नहीं मिली राहत, फिर ITAT पहुंचे

री-असेसमेंट ऑर्डर के खिलाफ रिटायर्ड टीचर ने कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स (अपील) यानी CIT(A) के सामने अपील की, लेकिन वहां से उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने ITAT बेंगलुरु का रुख किया। ITAT की एसएमसी बेंच ने 15 अप्रैल 2026 को मामले की सुनवाई की और 10 जुलाई 2026 को उनके पक्ष में आदेश पारित किया। इस मामले में चार्टर्ड अकाउंटेंट अथुल सी.जे. और चार्टर्ड अकाउंटेंट सिद्धेश एन. गड्डी ने उनका प्रतिनिधित्व किया।

26 दिन की देरी ने बदल दिया पूरा मामला

इस केस में सबसे महत्वपूर्ण बात कैश जमा करने की रकम नहीं, बल्कि इनकम टैक्स नोटिस जारी करने की समयसीमा थी। ITAT के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या विभाग को असेसमेंट ईयर 2015-16 को दोबारा खोलने का कानूनी अधिकार था। पुराने री-असेसमेंट नियमों के तहत इस मामले में नोटिस जारी करने की निर्धारित समयसीमा 31 मार्च 2022 को खत्म हो चुकी थी। लेकिन धारा 148 का नोटिस 26 अप्रैल 2022 को जारी किया गया। यानी निर्धारित तारीख के 26 दिन बाद। ITAT ने यह भी माना कि धारा 148A की प्रक्रिया शुरू कर देने से ऐसी समयसीमा को पार करने के बाद जारी किए गए धारा 148 के नोटिस को वैध नहीं बनाया जा सकता।

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ITAT ने क्यों रद्द कर दिया टैक्स विभाग का केस?

रिटायर्ड टीचर के पक्ष में फैसला मुख्य रूप से जुरिस्डिक्शन और लिमिटेशन के आधार पर आया। जब धारा 148 का नोटिस ही कानूनी समयसीमा के बाहर जारी हुआ और उसे अमान्य माना गया, तो उसके आधार पर शुरू की गई पूरी री-असेसमेंट कार्रवाई भी टिक नहीं सकती थी। ITAT ने सुप्रीम कोर्ट के राजीव बंसल मामले और कर्नाटक हाईकोर्ट के मोहम्मद यासीन मामले में दिए गए सिद्धांतों को भी ध्यान में रखा। ट्रिब्यूनल ने माना कि असेसमेंट ईयर 2015-16 के लिए पुराने कानून के तहत छह साल की लिमिटेशन अवधि 31 मार्च 2022 को समाप्त हो गई थी।

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