
Tax Rule on Stocks: शेयर बाजार में निवेशक दो मुख्य तरीकों से कमाई करते हैं, पहला- लाभांश (Dividend) से और दूसरा- शेयरों को बेचकर होने वाले पूंजीगत लाभ (Capital Gain) से। इन दोनों तरह की इनकम पर इनकम टैक्स के अलग-अलग नियम लागू होते हैं। डिविडेंड पर जहां आपके इनकम स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है, वहीं कैपिटल गेन को अल्पकालिक (Short Term) या दीर्घकालिक (Long Term) होल्डिंग के आधार पर अलग तरह से टैक्स किया जाता है। टैक्स देनदारी को ठीक से समझने और उसे मैनेज करने के लिए FIFO नियम और डीमैट खातों की सही संरचना महत्वपूर्ण है।
टैक्स का तरीका: भारत के निवासी शेयरधारकों के लिए, कंपनी से मिलने वाले डिविडेंड को उनकी कुल आय में जोड़ा जाता है। इस इनकम पर उनके लिए लागू इनकम टैक्स स्लैब दरों के अनुसार टैक्स लगता है। इसे 'अन्य स्रोतों से आय' (Income from Other Sources) के तहत टैक्सेबल किया जाता है। इसका सीधा मतलब है कि कम आय वाले व्यक्ति कम टैक्स देंगे, जबकि ज्यादा आय वालों को ज्यादा टैक्स देना होगा।
इंटरेस्ट पर कटौती (डिडक्शन): शेयर खरीदने के लिए अगर आपने लोन लिया है, तो उस लोन पर दिए गए ब्याज खर्च पर कटौती का दावा किया जा सकता है। हालांकि, यह कटौती कुल डिविडेंड इनकम के 20% तक ही सीमित है। ब्रोकरेज, कमीशन या सर्विस चार्ज जैसे अन्य खर्चों पर कोई कटौती नहीं मिलती है।
उदाहरण से समझें: अगर किसी व्यक्ति को डिविडेंड के रूप में 1 लाख रुपये मिलते हैं और उसने शेयर खरीदने के लिए लिए गए लोन पर 35,000 रुपये का ब्याज चुकाया है, तो वह अधिकतम 20,000 रुपये (1 लाख रुपये का 20%) की कटौती का दावा कर सकता है। ऐसे में, उसकी टैक्सेबल डिविडेंड इनकम 1,00,000 रुपये - 20,000 रुपये = 80,000 रुपये मानी जाएगी।
लिस्टेड शेयरों को बेचने से होने वाले मुनाफे पर 'पूंजीगत लाभ' (Capital Gains) के तहत टैक्स लगता है। होल्डिंग की अवधि के आधार पर पूंजीगत लाभ को दो श्रेणियों में बांटा जाता है:
वर्गीकरण: यदि लिस्टेड शेयरों को 12 महीने से ज्यादा समय तक रखा जाता है, तो उन्हें दीर्घकालिक पूंजीगत परिसंपत्तियां (LTCA) माना जाता है।
टैक्स दर: 12 महीने से ज्यादा रखने के बाद बेचने पर 1.25 लाख रुपये से अधिक का LTCG टैक्सेबल होता है। इस पर 12.5% की दर से टैक्स लगता है। यह दर तभी लागू होती है जब शेयर के अधिग्रहण और बिक्री दोनों के समय प्रतिभूति लेनदेन टैक्स (STT) का भुगतान किया गया हो।
उदाहरण: मान लीजिए, एक निवेशक कुल 15 लाख रुपये के निवेश से 1,500 प्रति रुपये शेयर की दर पर 1,000 शेयर खरीदता है और 12 महीने से ज्यादा समय बाद उन्हें 2,000 रुपये प्रति शेयर की दर से बेचता है। इससे उसे 20 लाख रुपये मिलेंगे। उसे 5 लाख रुपये का LTCG हुआ। इसमें से 1.25 लाख रुपये की छूट मिलती है, और बाकी 3.75 लाख रुपये पर 12.5% की दर से टैक्स लगेगा, जो 46,875 रुपये होगा।
वर्गीकरण: यदि शेयरों को 12 महीने से कम समय तक रखा जाता है, तो उन्हें अल्पकालिक पूंजीगत परिसंपत्तियां (STCA) माना जाता है।
टैक्स दर: 12 महीने से कम समय तक रखे गए शेयरों पर हुए लाभ (STCG) पर 20% की रियायती दर से टैक्स लगाया जाता है। यह दर भी तब लागू होती है जब लेनदेन (अधिग्रहण और बिक्री) पर STT का भुगतान किया गया हो।
उदाहरण: ऊपर दिए गए उदाहरण में, अगर उन्हीं 1,000 शेयरों को 12 महीने से कम समय में 1,700 रुपये प्रति शेयर पर बेच दिया जाता, तो (17 लाख रुपये - 15 लाख रुपये = 2 लाख रुपये का लाभ STCG होता। इस पर 20% की दर से टैक्स लगता, यानी 40,000 रुपये।
क्या है FIFO: जब एक निवेशक अलग-अलग समय पर एक ही कंपनी के शेयर खरीदता है, तो पूंजीगत लाभ की गणना के लिए FIFO (फर्स्ट-इन, फर्स्ट-आउट) विधि लागू होती है। इस नियम के तहत, यह माना जाता है कि डीमैट खाते में सबसे पहले जमा की गई प्रतिभूतियों को ही पहले बेचा गया है।
महत्व: भारतीय टैक्स नियमों के अनुसार, डीमैटीरियलाइज्ड शेयरों और म्यूचुअल फंड इकाइयों के लिए अधिग्रहण की लागत और होल्डिंग अवधि की गणना FIFO आधार पर की जाती है। यह सुनिश्चित करता है कि निवेशक एक ही खाते के भीतर सबसे फायदेमंद लॉट को चुनकर न बेच सके, जिससे टैक्स कैलकुलेशन में एकरूपता बनी रहे।
टैक्स अनुकूलन: एक दीर्घकालिक निवेश के लिए और दूसरा ट्रेडिंग के लिए दो अलग-अलग डीमैट खाते रखना टैक्स देनदारियों को ऑप्टिमाइज करने में मदद करता है।
FIFO का प्रभाव: यदि सभी लेनदेन एक ही खाते से किए जाते हैं, तो FIFO नियम अनजाने में आपकी कम लागत वाली, दीर्घकालिक होल्डिंग्स को पहले बिका हुआ मान सकता है, जिससे ज्यादा एसटीसीजी टैक्स लग सकता है।
संरचनात्मक स्पष्टता: कई खातों का उपयोग करने से टैक्स प्रबंधन ज्यादा कुशल हो जाता है, क्योंकि FIFO सिद्धांत को खाता-दर-खाता आधार पर लागू किया जाता है। इससे दीर्घकालिक निवेश और अल्पकालिक/सट्टा ट्रेडिंग के बीच स्पष्ट अंतर बना रहता है।
वैधता: कई डीमैट खाते बनाए रखना पूरी तरह से वैध है, जिसे नियामकों और टैक्स प्रशासन द्वारा मान्यता प्राप्त है। अंतिम टैक्स देनदारी PAN स्तर पर निर्धारित होती है, और निवेशक को सभी खातों के ट्रेडों को अपने रिटर्न में घोषित करना होता है।
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