
Rupee Record Low: भारतीय रुपये पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव ने भारतीय मुद्रा को कमजोर कर दिया है। रुपया शुक्रवार को 64 पैसे की बड़ी गिरावट के साथ अब तक के सबसे निचले स्तर 93.53 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या रुपया 100 के पार जा सकता है?
रुपये में आ रही गिरावट को लेकर कई एक्सपर्ट ने अलग-अलग कयास लगाए हैं। मुद्रा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी स्थिति बनी रहती है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, रुपये पर दबाव बना रहेगा। अगर ये युद्ध से बनता दबाव कम नहीं होता है, तो रुपया 95 के स्तर को जल्दी ही छू लेगा। इतना ही नहीं युद्ध के साथ बन रहा दवाब अगर बेकाबू हो गया , तो आने वाले वक्त में रुपया 100 का आंकड़ा भी पार कर सकता है।
| कारण | विवरण | असर |
|---|---|---|
| विदेशी निवेशकों की निकासी (FII/FPI Outflows) | मार्च में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने $8.5 बिलियन ( ₹80,000 करोड़+) की बिकवाली की | डॉलर की मांग बढ़ी, रुपये पर दबाव |
| कच्चे तेल की ऊxची कीमतें | मध्य पूर्व संघर्ष से भारतीय क्रूड बास्केट $156 प्रति बैरल पार | आयात बिल बढ़ा, चालू खाता घाटा गहरा |
| भू-राजनीतिक तनाव | ईरान-इजरायल-अमेरिका विवाद से निवेशक सुरक्षित संपत्तियों (USD) की ओर भागे | रुपये की स्थिरता कमजोर |
| बढ़ता व्यापार घाटा | ऊर्जा लागत और कमजोर व्यापारिक आंकड़ों से चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका | रुपये की मजबूती को झटका |
| RBI का सीमित हस्तक्षेप | रिज़र्व बैंक ने आक्रामक बचाव के बजाय सीमित कदम उठाए | विदेशी मुद्रा भंडार बचाने की रणनीति, पर रुपये पर दबाव |
बता दें कि शुक्रवार को अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया, डॉलर के मुकाबले 92.92 पर खुला था, लेकिन कारोबार के दौरान जल्द ही रुपया लुढ़कता हुआ 93 के स्तर से नीचे चला गया। अंत में ये 93.53 प्रति डॉलर पर पहुंच गई, जो अब तक का सबसे बड़ी गिरावट है।
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के वरिष्ठ शोध विश्लेषक, दिलीप परमार ने कहा कि बृहस्पतिवार की छुट्टी के बाद, भारतीय रुपया फिर से नीचे की ओर लुढ़कते हुए अबतक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। इसे लगातार विदेशी संस्थागत निवेशकों की पूंजी निकासी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के 'दोहरे झटके' का सामना करना पड़ा। उन्होंने आगे कहा कि हालांकि भू-राजनीतिक अस्थिरता अभी भी अल्पावधिक बाजार धारणा का मुख्य कारण बनी हुई है, लेकिन डॉलर-रुपया का तकनीकी ढांचा अभी भी तेजी वाला बना हुआ है। इस बीच, छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की मजबूती को मापने वाला, डॉलर सूचकांक 0.37 प्रतिशत की बढ़त के साथ 99.60 पर रहा।
| साल | 1 डॉलर = रुपये |
|---|---|
| 1947 | ₹3.30 |
| 1966 | ₹7.50 |
| 1991 | ₹26.00 |
| 2008 | ₹51.00 |
| 2013 | ₹68.80 |
| 2024 | ₹84.00 |
| 2025 | ₹90.21 |
| 2026 | ₹93.08 |
वहीं शुक्रवार को घरेलू शेयर बाजार में कुल 2,458 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 1,804 शेयरों में गिरावट रही। इस पूरे सप्ताह बीएसई का प्रमुख सूचकांक 30.96 अंक यानी 0.04 प्रतिशत गिरा, जबकि निफ्टी 36.6 अंक यानी 0.15 प्रतिशत फिसला। एशिया के अन्य बाजारों में, दक्षिण कोरिया का कॉस्पी, चीन का शंघाई एसएसई कम्पोजिट और हांगकांग का हैंग सेंग नुकसान में रहे।
यूरोप के बाजारों में दोपहर कारोबार में तेजी का रुख था। जबकि अमेरिकी बाजार बृहस्पतिवार को गिरावट के साथ बंद हुए थे। शेयर बाजार के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने बृहस्पतिवार को 7,558.19 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। इसके विपरीत, घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 3,863.96 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। बता दें कि सेंसेक्स बृहस्पतिवार को 2,496.89 अंक टूटकर 74,207.24 अंक पर बंद हुआ था। ये जून 2024 के बाद इसकी एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट थी।
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