
PMS taxation and ticket size rules: अगर आप स्टॉक और बॉन्ड में निवेश के लिए पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विस यानी PMS का विकल्प चुन रहे हैं, तो इसके काम करने का तरीका जानना बहुत जरूरी है। यह म्यूचुअल फंड और अन्य निवेश फंड्स से काफी अलग होता है। एक जागरूक निवेशक के तौर पर आपको इसके टैक्स नियमों, फीस स्ट्रक्चर और लचीलेपन की पूरी जानकारी होनी चाहिए। आइए जानते हैं PMS से जुड़ी वो खास बातें जो आपके निवेश के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं।
पीएमएस में म्यूचुअल फंड की तरह सबका पैसा एक साथ मिलाकर निवेश नहीं किया जाता। तकनीकी रूप से हर क्लाइंट का पोर्टफोलियो अलग और खास होना चाहिए। हालांकि, हकीकत में हर निवेशक के लिए बिल्कुल अलग पोर्टफोलियो बनाना और उसे ट्रैक करना काफी मुश्किल काम है।
इसलिए पीएमएस प्रोवाइडर्स एक 'मॉडल पोर्टफोलियो' तैयार करते हैं और सभी क्लाइंट्स के लिए उसी को दोहराते हैं। आपके पोर्टफोलियो में मामूली बदलाव हो सकते हैं, लेकिन मोटे तौर पर यह सभी निवेशकों के लिए एक जैसा ही रहता है।
टैक्स के मामले में PMS को 'पास थ्रू' माना जाता है। इसका मतलब है कि आप सीधे उन स्टॉक या बॉन्ड के मालिक होते हैं और उन पर टैक्स के सामान्य नियम लागू होते हैं।
इक्विटी: एक साल से कम समय के लिए 20% टैक्स (प्लस सरचार्ज और सेस) और एक साल से ज्यादा के लिए 12.5% टैक्स लगता है।
बॉन्ड: शॉर्ट टर्म में आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से और लॉन्ग टर्म (एक साल से अधिक) में 12.5% टैक्स लगता है। म्यूचुअल फंड में जब तक आप यूनिट्स नहीं बेचते तब तक फंड के अंदर शेयर बेचने पर टैक्स नहीं लगता, लेकिन PMS में हर ट्रांजैक्शन पर टैक्स की देनदारी बनती है।
PMS में अगर आपको पैसों की जरूरत है, तो आपके पोर्टफोलियो के शेयरों को मार्केट में बेचना पड़ता है। इस पर टैक्स आपकी होल्डिंग की अवधि के आधार पर तय होगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर आपके एग्रीमेंट में एक साल का 'लॉक-इन' पीरियड है, तो आप उस दौरान पैसा नहीं निकाल पाएंगे। इसके अलावा, समय से पहले बाहर निकलने पर 'एग्जिट लोड' के रूप में जुर्माना भी देना पड़ सकता है।
PMS में कदम रखने के लिए आपके पास कम से कम 50 लाख रुपये होने चाहिए। यह निवेश कैश, शेयर या दोनों के रूप में हो सकता है। खास बात यह है कि म्यूचुअल फंड की तरह इसमें किसी एक शेयर में निवेश की 10% वाली पाबंदी नहीं होती। फंड मैनेजर के पास ज्यादा छूट होती है और वह कुछ चुनिंदा शेयरों पर बड़ा दांव लगा सकता है। आप अपनी पसंद के हिसाब से इक्विटी और बॉन्ड में पैसा बंटवा भी सकते हैं।
यहाँ मैनेजमेंट फीस के साथ-साथ 'प्रॉफिट शेयरिंग' का भी प्रावधान होता है। इसे एक 'हर्डल रेट' (जैसे 12%) के जरिए तय किया जाता है। अगर आपका मुनाफा इस तय सीमा से ज्यादा होता है, तो ऊपर के मुनाफे को निवेशक और प्रोवाइडर के बीच (जैसे 80:20 के अनुपात में) बांटा जाता है। इसके अलावा, शेयर खरीदने-बेचने पर लगने वाला ब्रोकरेज चार्ज अलग से देना होता है।
(यह लेख फाइनैंशियल मार्केट एक्सपर्ट और कॉर्पोरेट ट्रेनर जॉयदीप सेन द्वारा साझा की गई जानकारी पर आधारित है।)
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