ITR Filing 2025: फ्रीलांसर और सैलरीड के लिए टैक्स नियम हैं अलग, जानिए क्यों

ITR Filing 2025: आज बहुत से लोग फ्रीलांस काम कर रहे हैं। वीडियो एडिटर से लेकर लेखक तक सभी फ्रीलांस वर्क को प्राथमिकता दे रहे हैं। फ्रीलांसर और सैलरीड के लिए टैक्स नियम अलग-अलग हैं। आइये जानते हैं इसमें क्या अंतर है।

Jitendra Singh( विद इनपुट्स फ्रॉम लाइवमिंट.कॉम)
पब्लिश्ड11 Aug 2025, 02:16 PM IST
ITR Filing 2025: Form 16 और Form 16A इनकम टैक्स रिटर्न फाइलिंग के जरूरी डॉक्यूमेंट्स हैं।
ITR Filing 2025: Form 16 और Form 16A इनकम टैक्स रिटर्न फाइलिंग के जरूरी डॉक्यूमेंट्स हैं।

ITR Filing 2025: फ्रीलांसिंग की दुनिया आज तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ टैक्स, TDS और GST जैसे नियमों की समझ होना भी उतना ही जरूरी है। भारत में फ्रीलांसर्स को खुद अपना टैक्स भरना होता है जबकि नौकरीपेशा लोगों का टैक्स उनकी कंपनी सैलरी में से काट कर भरती है। देश के हर पात्र नागरिकों को इनकम टैक्स देना जरूरी होता है। दरअसल, इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने का समय जैसे - जैसे नजदीक आता है, कई फ्रीलांसर और कंसल्टेंट इस उलझन में रहते हैं कि उनके टैक्स का कैलकुलेशन सैलरीड लोगों से किस तरह से अलग रहता है।

मुख्य अंतर सिर्फ आईटीआर फार्म के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें टैक्स का कैलकुलेशन, डिडेक्शन और दाखिल करने की अंतिम समय सीमा भी अलग-अलग होती है। ITR दाखिल करते समय सैलरी पाने वाले लोगों की इनकम पर 'सैलरी' टैक्स लगाया जाता हैय़ वहीं फ्रीलांसर या कंसल्टेंसी कार्य से होने वाली इनकम “व्यवसाय अथवा पेशे से लाभ” कैटेगरी के अंतर्गत आती है। यह वर्गीकरण ही तय करता है कि कौन-सी कटौतियाँ उपलब्ध होंगी और कैसे आप रिकॉर्ड बनाते हैं।

टैक्स काटने के नियम

सैलरी क्लास के लोगों को कंपनी की ओ से फॉर्म 16 दिया जाता है। वहीं फीलांसर्स को ज्यादा कठोर नियमों का पालन करना पड़ता है। सैलरी क्लास के लोगों वेतन देने से पहले ही कंपनिायं स्रोत पर टैक्स काट लेती हैं। वहीं फ्रीलांसरों को अपने टैक्स को मैनेज और पेमेंट खुद ही करना होता है। फ्रीलांसर टैक्सपेयर्स आईटीआर फाइल के लिए ITR 3 या ITR 4 का चयन कर सकते हैं।

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TDS कटौती

TDS का मतलब होता है- सोर्स पर टैक्स कटौती। यह एक तरीका है जिससे सरकार आपकी इनकम पर टैक्स पहले ही काट लेती है, ताकि बाद में टैक्स चोरी न हो। आमतौर पर क्लाइंट आपकी पेमेंट से पहले ही 10% TDS काट लेता है और वह सरकार को आपके PAN नंबर (Permanent Account Number) के तहत जमा कर देता है। आपको अपने क्लाइंट्स से Form 16A लेना चाहिए और उसे Form 26AS से मैच करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कटे हुए टैक्स की जानकारी सही है। इससे आप इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते समय काटे गए टैक्स को क्लेम कर सकते हैं और दोबारा टैक्स देने से बच सकते हैं।

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क्या सभी फ्रीलांसर्स को GST के तहत रजिस्ट्रेशन कराना होता है?

अगर आपकी सालाना इनकम 20 लाख रुपये (या कुछ राज्यों में 10 लाख रुपये) से ज्यादा है, तो आपको GST के तहत रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी है। रजिस्ट्रेशन के बाद, आपको भारत में अपने कस्टमर्स के इनवॉइस पर 18% GST देना होगा। GST रजिस्ट्रेशन और समय-समय पर रिटर्न फाइल करना जरूरी हो सकता है। नियमों का पालन करने से जहां जुर्मानों से बचा जा सकता है वहीं आपका काम भी बिना रुकावट के चलता रहता है।

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टैक्स फाइलिंग कैसे करें?

फ्रीलांसर्स को आमतौर पर ITR-3 या ITR-4 फॉर्म से टैक्स फाइल करना होता है। अगर आप सेक्शन 44ADA के तहत प्रेसम्प्टिव टैक्सेशन (Presumptive taxation) अपनाते हैं, तो अपनी कुल आमदनी के 50 फीसदी पर टैक्स का पेमेंट कर सकते हैं। यह तरीका आसान है और इसमें ज्यादा हिसाब भी नहीं लगाना पड़ता है। आपको अपने ऑफिस रेंट, इंटरनेट बिल, सॉफ्टवेयर सब्सक्रिप्शन जैसे प्रोफेशनल खर्चों की रसीदें भी संभाल कर रखनी चाहिए। इससे आपको टैक्सेबल इनकम को कम करने में मदद मिल सकती है।

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