क्या होते हैं लाइफ साइकिल फंड्स? ये क्यों हैं खास, जानिए रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए कैसे काम आ सकता है यह फंड

लाइफ साइकिल फंड्स म्यूचुअल फंड की नई कैटेगरी हैं, जिन्हें तय वित्तीय लक्ष्य और मैच्योरिटी तारीख के हिसाब से डिजाइन किया गया है। इनमें ग्लाइड पाथ के जरिए समय के साथ इक्विटी और डेट में निवेश का अनुपात बदला जाता है।

Manali Rastogi
अपडेटेड4 Sep 2026, 09:37 AM IST
बिना खुद इक्विटी बेचने की टेंशन, कैसे निवेश को सुरक्षित बनाते हैं लाइफ साइकिल फंड्स?
बिना खुद इक्विटी बेचने की टेंशन, कैसे निवेश को सुरक्षित बनाते हैं लाइफ साइकिल फंड्स?(AI-Generated Image)

भारत में घरेलू बचत का पैसा अब तेजी से म्यूचुअल फंड्स की ओर जा रहा है। एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (Amfi) की जुलाई 2026 की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, घरेलू म्यूचुअल फंड्स का कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर रिकॉर्ड 85.76 लाख करोड़ रुपये हो गया।

आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय अब अपने जीवन के अलग-अलग लक्ष्यों को पूरा करने के लिए म्यूचुअल फंड्स का इस्तेमाल तेजी से कर रहे हैं। लाइफ साइकिल फंड्स भी निवेश का ऐसा ही एक तरीका है, जिसके जरिए लोग अपने भविष्य के वित्तीय लक्ष्यों की योजना बना सकते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए निवेश कर सकते हैं।

क्या होते हैं लाइफ साइकिल फंड्स?

लाइफ साइकिल फंड्स एक तरह की म्यूचुअल फंड स्कीम हैं। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी ने 26 फरवरी 2026 को इस नई कैटेगरी को पेश किया था। सेबी के मुताबिक, लाइफ साइकिल फंड्स ओपन-एंडेड म्यूचुअल फंड स्कीम हैं, जिन्हें एक तय टारगेट मैच्योरिटी डेट को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है।

लाइफ साइकिल फंड्स को टारगेट डेट फंड्स भी कहा जाता है। इन स्कीम्स को निवेशक के भविष्य के वित्तीय लक्ष्यों के हिसाब से डिजाइन किया जाता है। इसलिए फंड के नाम में उसका टारगेट ईयर देना जरूरी है, जैसे "लाइफ साइकिल फंड 2050"।

इन फंड्स में अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश किया जाता है और समय के साथ इनके पोर्टफोलियो में बदलाव होता रहता है। यानी निवेश की अवधि और लक्ष्य की तारीख नजदीक आने के साथ फंड का एसेट एलोकेशन भी बदलता जाता है।

सॉल्यूशन-ओरिएंटेड स्कीम्स को क्यों किया गया रीक्लासिफाई?

लाइफ साइकिल फंड्स शुरू होने से पहले इसी तरह की कुछ म्यूचुअल फंड स्कीम्स को "सॉल्यूशन-ओरिएंटेड स्कीम्स" के रूप में वर्गीकृत किया जाता था। इनमें आमतौर पर बच्चों के भविष्य के लिए बनाई गई चिल्ड्रन्स फंड्स और रिटायरमेंट फंड्स शामिल थे।

सेबी ने इन सॉल्यूशन-ओरिएंटेड स्कीम्स को रीक्लासिफाई करने का फैसला इसलिए किया क्योंकि इनमें अनिवार्य "ग्लाइड पाथ" नहीं था और निवेश का एसेट एलोकेशन काफी हद तक स्थिर रहता था। इस वजह से इन स्कीम्स के पोर्टफोलियो कई बार सामान्य इक्विटी या हाइब्रिड फंड्स जैसे ही दिखाई देते थे।

सेबी ने अपनी कंसल्टेशन पेपर में इस बदलाव की वजह बताते हुए कहा था कि इंडस्ट्री में अलग-अलग स्कीम्स के पोर्टफोलियो के बीच काफी समानता थी। इसलिए नियामक को लगा कि एक जैसी स्कीम्स के बढ़ते ओवरलैप को रोकने के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाने जरूरी हैं।

पुरानी स्कीम्स में नई सदस्यता को बंद करने और नई लाइफ साइकिल फंड्स के लिए एक तय समय आधारित फ्रेमवर्क लागू करने का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि निवेशकों को ऐसा प्रोडक्ट मिले जो वास्तव में अपने नाम के मुताबिक हो और लंबे समय में उनके वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करे।

कैसे काम करते हैं लाइफ साइकिल फंड्स?

एक सामान्य इक्विटी फंड या हाइब्रिड फंड में इक्विटी में निवेश का हिस्सा लंबे समय तक काफी ज्यादा रह सकता है। ऐसे में अगर कोई निवेशक रिटायरमेंट तक उसी फंड में निवेश बनाए रखता है और उस समय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ जाती है, तो उसकी जमा पूंजी का एक हिस्सा प्रभावित हो सकता है।

वहीं, इंडेक्स फंड्स में निवेश करने वाले व्यक्ति को अपने लक्ष्य की तारीख करीब आने पर खुद इक्विटी से पैसा निकालकर डेट जैसे कम जोखिम वाले विकल्पों में निवेश करना पड़ सकता है।

लाइफ साइकिल फंड्स में निवेशक को यह काम खुद करने की जरूरत नहीं होती। इन फंड्स में एक तय नियम के तहत एसेट एलोकेशन समय के साथ अपने आप बदलता रहता है। इसे "ग्लाइड पाथ" कहा जाता है। ग्लाइड पाथ एक पहले से तय व्यवस्था है, जिसके तहत मैच्योरिटी तक बचे वर्षों के आधार पर फंड अलग-अलग एसेट क्लास में अपना निवेश बदलता है।

आमतौर पर लाइफ साइकिल फंड्स को पांच साल के गुणकों में तय टारगेट अवधि के साथ लॉन्च किया जाता है। निवेश की शुरुआत में फंड मैनेजर पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा इक्विटी में रख सकता है, ताकि लंबे समय में ज्यादा ग्रोथ हासिल करने की कोशिश की जा सके। इस चरण में निवेशक के पास बाजार के उतार-चढ़ाव को सहने के लिए ज्यादा समय होता है।

जैसे-जैसे फंड की मैच्योरिटी की तारीख करीब आती है, इक्विटी में निवेश का हिस्सा धीरे-धीरे कम किया जाता है और पोर्टफोलियो को ज्यादा सुरक्षित और कंजर्वेटिव बनाया जाता है। इस तरह लाइफ साइकिल फंड्स का मकसद शुरुआती वर्षों में ग्रोथ का मौका देना और लक्ष्य की तारीख करीब आने पर निवेश की गई रकम को सुरक्षित रखने पर ज्यादा ध्यान देना है।

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