Low EMI Benefits: कम ईएमआई का लालच पड़ सकता है भारी, लंबी अवधि के लोन में देना होगा दोगुना ब्याज

Low Cost EMI Calculation : स्मार्टफोन या घर के लिए कम EMI चुनना जेब पर भारी पड़ सकता है। जानिए कैसे लंबी अवधि के लोन में आप मूल रकम से कहीं ज्यादा ब्याज चुकाते हैं।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड20 Apr 2026, 12:15 PM IST
कम ईएमआई देता है ज्यादा दर्द (सांकेतिक तस्वीर)
कम ईएमआई देता है ज्यादा दर्द (सांकेतिक तस्वीर)(shutterstocck)

Low Cost EMI Impact : स्मार्टफोन, लैपटॉप या होम फर्नीचर खरीदने के लिए आजकल 'लो-कॉस्ट ईएमआई' एक बहुत आसान विकल्प लगता है। लोग सोचते हैं कि लंबे समय तक छोटी किस्तें चुकाने से उन पर बोझ कम पड़ेगा। लेकिन क्या आपने कभी इसका गणित लगाकर देखा है? कम ईएमआई का मतलब है कि आप तुरंत तो कम पैसे दे रहे हैं, लेकिन लंबे समय में आप एक बड़ी रकम गवां रहे हैं। आइए जानते हैं कि ईएमआई चुनते समय केवल मासिक खर्च देखने के बजाय लोन की कुल लागत पर ध्यान देना क्यों जरूरी है

लंबी अवधि और ब्याज का गणित

छोटी ईएमआई और लंबे समय तक लोन चुकाने का मतलब है ज्यादा ब्याज देना। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपने 10 लाख रुपये का लोन 10% सालाना ब्याज पर लिया है। अगर आप इसे 5 साल के लिए लेते हैं, तो आपकी ईएमआई लगभग 21,247 रुपये होगी और कुल ब्याज 2.75 लाख रुपये बनेगा। वहीं, अगर आप इसे 10 साल के लिए लेते हैं, तो ईएमआई घटकर 13,215 रुपये हो जाएगी, लेकिन आपको कुल 5.86 लाख रुपये सिर्फ ब्याज के रूप में देने होंगे। यानी ईएमआई 8,000 रुपये ही कम हुई लेकिन ब्याज दोगुने से भी ज्यादा बढ़ गया।

क्यों बढ़ जाता है ब्याज का बोझ?

लोन पर ब्याज हमेशा बकाया मूलधन पर लगता है। जब आप लोन की अवधि बढ़ाते हैं, तो मूलधन बहुत धीरे-धीरे कम होता है। इसकी वजह से बैंक लंबे समय तक ब्याज वसूलता रहता है। आसान शब्दों में कहें तो कम ईएमआई से महीने का बोझ तो कम होता है, लेकिन लोन की कुल कीमत काफी बढ़ जाती है।

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होम लोन पर ईएमआई का बड़ा असर

खासकर होम लोन के मामले में, जो आमतौर पर 15 से 25 साल के लिए होते हैं, यह अंतर बहुत ज्यादा होता है। इसमें उधार लेने वाला बैंक को मूल रकम से कहीं ज्यादा पैसा चुका देता है।

उदाहरण के तौर पर, 50 लाख रुपये का होम लोन 8.5% ब्याज पर लिया जाए तो नीचे के दो विकल्पों के अलग-अलग गणित देखते हैं।

विकल्प 1 (15 साल): ईएमआई लगभग 49,000 रुपये होगी। इसमें आप कुल 88 लाख रुपये चुकाएंगे, जिसमें ब्याज 38 लाख रुपये होगा।

विकल्प 2 (25 साल): ईएमआई घटकर 40,000 रुपये हो जाएगी। लेकिन यहां आप कुल 1.20 करोड़ रुपये चुकाएंगे, जिसमें ब्याज ही 70 लाख रुपये हो जाएगा।

क्या लंबी अवधि के लोन कभी फायदेमंद होते हैं?

लंबी अवधि के लोन हमेशा बुरे नहीं होते। यह उन लोगों के लिए अच्छे हैं जिन्हें नकद पैसें (कैश फ्लो) की दिक्कत है। यह विकल्प तब सबसे अच्छा काम करता है जब आप ईएमआई से बचाए हुए पैसों को कहीं अच्छी जगह जैसे प्रॉपर्टी या शेयर मार्केट में निवेश करें।

क्या है सही फैसला?

सबसे अच्छा विकल्प वह नहीं है जिसमें ईएमआई कम हो, बल्कि वह है जिसमें आप जरूरत से ज्यादा समय तक कर्ज में न रहें। फैसला लेने से पहले कुल ब्याज की गणना जरूर करें।

चक्रवृद्धि ब्याज का चमत्कार समझिए

चक्रवृद्धि ब्याज (Compound Interest) को अक्सर दुनिया का 'आठवां अजूबा' कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो यह सिर्फ आपके मूलधन पर मिलने वाला ब्याज नहीं है, बल्कि 'ब्याज पर मिलने वाला ब्याज' है।

1. यह कैसे काम करता है?

साधारण ब्याज में आपको हर साल सिर्फ उसी रकम पर ब्याज मिलता है जो आपने जमा की थी। लेकिन चक्रवृद्धि में पहले साल आपको मूलधन पर ब्याज मिलता है। दूसरे साल, आपको मूलधन और पिछले साल के ब्याज, दोनों को मिलाकर बनी नई रकम पर ब्याज मिलता है। यह सिलसिला चलता रहता है, जिससे आपकी संपत्ति समय के साथ तेजी से बढ़ती है।

2. कंपाउंडिंग का गणित

इसे समझने के लिए एक मानक फॉर्मूला इस्तेमाल किया जाता है:

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चक्रवृद्धि ब्याज दर निकालने का सूत्र

A: मूलधन और ब्याज की जुटी हुई कुल राशि

P: मूलधन

r: वार्षिक ब्याज दर

n: एक साल में कितनी बार ब्याज जोड़ा जाता है

t: समय/वर्ष

3. कंपाउंडिंग के 'सुपरपावर' रूल्स

चक्रवृद्धि ब्याज में समय सबसे बड़ा फैक्टर है। आप जितना जल्दी निवेश शुरू करेंगे, कंपाउंडिंग को जादू दिखाने के लिए उतना ज्यादा समय मिलेगा। 20 की उम्र में शुरू किया गया छोटा निवेश, 30 की उम्र में शुरू किए गए बड़े निवेश को पछाड़ सकता है। इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं। पहली, ब्याज दर। ब्याज दर में 1-2% का मामूली अंतर भी 20-25 सालों में लाखों रुपये का फर्क पैदा कर देता है। और दूसरी, बारंबारता। मासिक या तिमाही, ब्याज जितनी बार जोड़ा जाएगा, मुनाफा उतना ही ज्यादा होगा।

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4. कर्ज के मामले में यह खतरनाक है

कंपाउंडिंग सिर्फ कमाई में ही नहीं, कर्ज में भी काम करती है। अगर आप क्रेडिट कार्ड का बिल या लोन की ईएमआई (EMI) समय पर नहीं चुकाते, तो बकाया ब्याज पर भी ब्याज लगने लगता है। यही कारण है कि कर्ज का जाल बहुत जल्दी गहरा हो जाता है। यानी, निवेश के मामले में कंपाउंडिंग आपका सबसे अच्छा दोस्त है, और कर्ज के मामले में सबसे बड़ा दुश्मन।

Disclaimer: यह लेख केवल जानकारी के लिए है। कर्ज लेने या निवेश करने से पहले किसी प्रमाणित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। मिंट हिंदी आपके किसी भी निर्णय और उसके परिणाम के लिए तनिक भी उत्तरदायी नहीं है।

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