Mutual Fund Loss: म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय हर किसी को मुनाफे की उम्मीद होती है, लेकिन हकीकत यह है कि बाजार हमेशा एक जैसी चाल नहीं चलता। कभी तेजी, कभी गिरावट और इसी उतार-चढ़ाव में कई बार निवेशकों को नुकसान भी उठाना पड़ता है। नुकसान का मतलब यह नहीं कि सब खत्म हो गया। टैक्स के नजरिए से देखें तो यही नुकसान आगे चलकर आपकी टैक्स प्लानिंग में मददगार साबित हो सकता है।
म्यूचुअल फंड में नुकसान किसे कहते हैं
जब आप म्यूचुअल फंड की यूनिट्स उस कीमत पर बेचते हैं, जो आपने खरीदते समय चुकाई थी उससे कम होती है, तो इसे कैपिटल लॉस कहा जाता है। यह नुकसान दो बातों पर निर्भर करता है- आपने किस तरह के फंड में निवेश किया और कितने समय तक निवेश बनाए रखा।
इक्विटी और डेट फंड में नुकसान के नियम अलग
इक्विटी म्यूचुअल फंड और डेट म्यूचुअल फंड के टैक्स नियम एक जैसे नहीं होते। अगर इक्विटी फंड को एक साल के भीतर बेच दिया जाए और नुकसान हो, तो इसे शॉर्ट टर्म कैपिटल लॉस माना जाता है। वहीं, एक साल से ज्यादा रखने के बाद बेचने पर होने वाला नुकसान लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस कहलाता है।
डेट फंड के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होता है, हालांकि यहां होल्डिंग पीरियड की सीमा अलग होती है। इसलिए टैक्स की गणना करते समय फंड की कैटेगरी को समझना बेहद जरूरी है।
नुकसान को कैसे किया जा सकता है एडजस्ट
असल फायदा तब समझ में आता है, जब आप जानते हैं कि इस नुकसान को टैक्स में कैसे इस्तेमाल किया जाए। शॉर्ट टर्म कैपिटल लॉस को आप शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म, दोनों तरह के कैपिटल गेन के खिलाफ सेट ऑफ कर सकते हैं।
वहीं, लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस सिर्फ लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन के खिलाफ ही एडजस्ट किया जा सकता है। यानी हर नुकसान हर मुनाफे से नहीं घटाया जा सकता, इसके अपने नियम हैं।
इस साल फायदा नहीं मिला, तो आगे काम आएगा
अगर किसी साल आपके पास एडजस्ट करने के लिए पर्याप्त कैपिटल गेन नहीं है, तब भी चिंता की जरूरत नहीं। मौजूदा टैक्स नियमों के तहत आप म्यूचुअल फंड से हुए नुकसान को अगले आठ साल तक कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं। इसका मतलब यह है कि आने वाले वर्षों में जब भी आपको मुनाफा होगा, आप पुराने नुकसान को घटाकर अपना टैक्स बोझ कम कर सकते हैं।
नुकसान को मौके में कैसे बदलें
म्यूचुअल फंड में नुकसान होना कोई असामान्य बात नहीं है। जरूरी यह है कि आप उसे कैसे संभालते हैं। सही जानकारी के साथ किया गया टैक्स प्लान न सिर्फ नुकसान का असर कम करता है, बल्कि भविष्य में बेहतर रिटर्न की राह भी आसान बनाता है।