
Rise of smart beta funds: म्यूचुअल फंड की दुनिया में इन दिनों क्वांट बेस्ड या फैक्टर फंड्स एक नए युद्धक्षेत्र के रूप में सामने आए हैं। एसेट मैनेजर्स अब बाजार में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए रूल्स बेस्ड स्ट्रैटिजी और डेटा का जमकर सहारा ले रहे हैं। यह फंड्स एक्टिव और पैसिव इन्वेस्टमेंट के बीच का एक ऐसा रास्ता है, जो निवेशकों को कम जोखिम में बेहतर रिटर्न देने की कोशिश करता है।
अभी बाजार में करीब 150 फैक्टर बेस्ड म्यूचुअल फंड स्कीमें उपलब्ध हैं। ये स्कीमें वैल्यू, मोमेंटम, क्वालिटी और लो वोलैटिलिटी जैसे खास पैमानों पर काम करती हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि कुल उपलब्ध स्कीमों में से लगभग 50 स्कीमें तो केवल एक साल में ही लॉन्च हुई हैं। रूल्स बेस्ड फ्रेमवर्क की वजह से फंड हाउस अब कई तरह के फैक्टर्स को मिलाकर नई और अनोखी रणनीतियां तैयार कर रहे हैं।
मार्केट में दो तरह के मुख्य प्रॉडक्ट्स मौजूद हैं। पहले वो जो सिर्फ एक खास फैक्टर जैसे मोमेंटम या वैल्यू, पर फोकस करते हैं। दूसरे मल्टी फैक्टर प्रॉडक्ट्स हैं, जो दो या ज्यादा फैक्टर्स को जोड़ते हैं। भारत में ज्यादातर क्वांट फंड्स मल्टी फैक्टर दृष्टिकोण ही अपना रहे हैं। फ्लेक्सीकैप फॉर्मेट आने के बाद फंड मैनेजर्स के पास अब और भी आजादी आ गई है, क्योंकि अब वे बिना किसी साइज की पाबंदी के फैक्टर नियमों को लागू कर सकते हैं।
फैक्टर निवेश में अभी सबसे ज्यादा हलचल पैसिव साइड पर दिख रही है। एनएसई (NSE) का स्ट्रैटेजी इंडेक्स सूट पिछले दो साल में 23 से बढ़कर 36 हो गया है। वहीं, एक्टिव फैक्टर फंड्स के मामले में 2023 में सैमको म्यूचुअल फंड का पहला एक्टिव मोमेंटम फंड लाना एक बड़ा टर्निंग पॉइंट था। इसके बाद कोटक, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल और निप्पॉन इंडिया जैसे बड़े खिलाड़ियों ने भी अपनी सक्रिय रणनीतियां पेश की हैं।
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला, फंड हाउसों पर कुछ नया और अलग पेश करने का दबाव है। दूसरा, पुराने और पारंपरिक फंड्स के लिए बाजार में अब अल्फा जेनरेट करना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में डेटा और तकनीक पर आधारित ये फंड्स एक नई उम्मीद बनकर उभरे हैं।
इतनी नई स्कीमों के बावजूद निवेशकों की भागीदारी अभी कम है। करीब 130 स्कीमों का कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) सिर्फ 67,000 करोड़ रुपये के आसपास ही है। इसकी बड़ी वजह इन फंड्स की जटिलता और इनके रिटर्न में आने वाला उतार-चढ़ाव है। साथ ही, इनके पास अभी लंबे समय का ट्रैक रिकॉर्ड भी नहीं है। एक्सिस म्यूचुअल फंड के फंड मैनेजर कार्तिक कुमार का कहना है कि भारत में यह कैटेगरी धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत करेगी क्योंकि बाजार अब ज्यादा कॉम्पिटिटिव हो गया है।
फंड हाउस अब फंड मैनेजमेंट में एआई की संभावनाएं तलाश रहे हैं। मीराए एसेट इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के मुख्य AI अधिकारी निशांत प्रधान के अनुसार, AI रिसर्च, रिस्क मैनेजमेंट और निवेशकों के व्यवहार को समझने में बड़ी मदद कर सकता है। इससे आने वाले समय में पोर्टफोलियो विश्लेषण और भी सटीक हो जाएगा।
Disclaimer: यह लेख केवल जानकारी के लिए है। निवेश करने से पहले किसी प्रमाणित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। मिंट हिंदी आपके किसी भी निर्णय और उसके परिणाम के लिए तनिक भी उत्तरदायी नहीं है।
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