Mutual Funds: डायरेक्ट और रेगुलर प्लान में क्या है अंतर? जानिए कहां निवेश करने पर फौरन बन जाएंगे अमीर

Direct vs Regular Mutual Fund: भारत में म्युचुअल फंड की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है, और इसका सीधा प्रमाण म्युचुअल फंड इंडस्ट्री का लगातार बढ़ता AUM है। ऐसे में अगर आप भी म्यूचुअल फंड्स के जरिए मोटी कमाई करना चाहते हैं तो डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के बारे में जानना बेहद जरूरी है।

Jitendra Singh
अपडेटेड20 Sep 2025, 10:05 AM IST
Direct vs Regular Mutual Fund: रेगुलर और डायरेक्ट दोनों में एक ही तरह की संपत्तियों में निवेश किया जाता है।
Direct vs Regular Mutual Fund: रेगुलर और डायरेक्ट दोनों में एक ही तरह की संपत्तियों में निवेश किया जाता है।

Direct vs Regular Mutual Fund: म्यूचुअल फंड में निवेश करने वालों की संख्या दिनों दिन तेजी से बढ़ रही है। लेकिन, बहुत से लोग अब भी रेगुलर और डायरेक्ट म्यूचुअल फंड के बीच अंतर को नहीं समझते हैं। दोनों ही रास्ते एक ही स्कीम तक पहुंचाते हैं, लेकिन इनके बीच कुछ ऐसे फर्क हैं जो आपके रिटर्न और निवेश से जुड़े तजुर्बे को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं। अगर आप निवेश में नए हैं तो शायद रेगुलर प्लान आपको आसान लगे, वहीं अनुभवी निवेशक डायरेक्ट प्लान से ज्यादा फायदा उठा सकते हैं।

रेगुलर और डायरेक्ट म्यूचुअल फंड के बीच मुख्य अंतर उनके खर्च और प्रबंधन में है। यह अंतर लंबी अवधि में निवेशकों को भारी लाभ दे सकता है। आइए समझते हैं कि डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड में क्या अंतर हैं और इनके फायदे-नुकसान क्या - क्या हैं?

रेगुलर प्लान

रेगुलर म्यूचुअल फंड योजनाओं में निवेशक आमतौर पर ब्रोकर, डिस्ट्रीब्यूटर या एजेंट्स के जरिए निवेश करते हैं। इन बिचौलियों के कमीशन का खर्च निवेशकों को उठाना पड़ता है। इस वजह से इनका एक्सपेंस रेशियो 1% से 2.5% तक जा सकता है। यह अंतर भले ही सुनने में छोटा लगे, लेकिन लंबे समय में कंपाउंडिंग की वजह से यह आपके रिटर्न को काफी कम कर देता है।

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डायरेक्ट प्लान

डायरेक्ट म्यूचुअल फंड योजनाओं में निवेशक सीधे एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) से फंड खरीदते हैं। इसमें कोई बिचौलिया शामिल नहीं होता, इसलिए लागत कम होती है। डायरेक्ट म्यूचुअल फंड सीधे एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) से खरीदे जाते हैं। यही वजह है कि डायरेक्ट प्लान का एक्सपेंस रेशियो कम रहता है। आम तौर पर यह 0.5% से 1% के बीच ही होता है। यही कारण है कि डायरेक्ट प्लान लंबे समय में ज्यादा रिटर्न देने की क्षमता रखते हैं, क्योंकि आपकी जेब से फीस और कमीशन पर कम पैसा कटता है।

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निवेश करने और उसे मैनेज करने का तरीका

डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड में निवेश करने और मैनेज करने के तरीके में काफी फर्क है। डायरेक्ट प्लान आपको AMC की वेबसाइट, मोबाइल ऐप या कुछ ऑथराइज्ड प्लेटफॉर्म पर ही मिलते हैं। यहां निवेशकों को निवेश से जुड़े सारे ट्रांजैक्शन खुद ही संभालने पड़ते हैं। वहीं रेगुलर प्लान में इन बातों की जिम्मेदारी काफी हद तक ब्रोकर या डिस्ट्रीब्यूटर संभालते हैं। इससे आपके निवेश की प्रक्रिया से जुड़े पेपरवर्क और प्रोसेस आसान हो जाता है। ऐसे में अगर आप म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में नए हैं तो आपके लिए रेगुलर प्लान बेहतर रहेगा। हालांकि इस सुविधा के बदले आपको ज्यादा फीस चुकानी पड़ती है।

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कौन सा प्लान आपके लिए रहेगा बेहतर

अगर आप निवेश की दुनिया में नए हैं और म्यूचुअल फंड चुनने में कंफ्यूज हो जाते हैं, तो रेगुलर प्लान आपके लिए बेहतर हो सकता है। यहां आपको ब्रोकर या फाइनेंशियल एडवाइजर की सलाह मिलती है, जो आपकी जरूरत और रिस्क प्रोफाइल के हिसाब से स्कीम चुनने में मदद कर सकते हैं। वहीं अगर आप मार्केट को अच्छी तरह समझते हैं, खुद रिसर्च कर सकते हैं और हर फैसला अपने हिसाब से लेना चाहते हैं, तो डायरेक्ट प्लान आपके लिए सही ऑप्शन है। इसमें आपको एक ही स्कीम में निवेश करने पर भी कम खर्च में ज्यादा रिटर्न मिलने की संभावना बनी रहती है।

(डिस्क्लेमर : इस आर्टिकल का मकसद सिर्फ जानकारी देना है, किसी स्कीम में निवेश की सलाह देना नहीं। निवेश का कोई भी फैसला किसी एक्सपर्ट से सलाह लेने के बाद ही करें।)

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