9 Years of Demonetisation: 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया था। उस वक्त इसका मकसद काले धन और भ्रष्टाचार पर रोक लगाना था। लेकिन इस फैसले ने देश की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा बदलाव ला दिया।
डिजिटल पेमेंट में उछाल
नोटबंदी से पहले डिजिटल पेमेंट सिर्फ शहरों और चुनिंदा लोगों तक सीमित था। लेकिन नकद की कमी ने लोगों को मजबूर किया कि वे ऑनलाइन लेनदेन अपनाएं। इसी वजह से डिजिटल पेमेंट तेजी से लोकप्रिय हुआ। रिसर्च फर्म पीडब्लूसी के आंकड़ों के अनुसार, नोटबंदी के एक साल के भीतर ही डिजिटल अर्थव्यवस्था में बड़ा उछाल देखा गया।
धीरे-धीरे फैलने लगा UPI का इस्तेमाल
दिसंबर 2016 में यूपीआई पर सिर्फ 21 बैंक थे। सितंबर 2017 तक यह बढ़कर 55 हो गए। इसी अवधि में, यूपीआई ट्रांजैक्शन की संख्या दिसंबर 2016 में 20 लाख से बढ़कर 3.08 करोड़ हो गई, जो 1,540 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। ट्रांजैक्शन अमाउंट भी 7 अरब रुपये से बढ़कर 52.9 अरब रुपये हो गया।
NEFT और RTGS
नोटबंदी के बाद NEFT और RTGS ट्रांजैक्शन में भी तेजी आई। एनईएफटी में 28% और 61% की बढ़ोतरी हुई, जबकि आरटीजीएस में 22% और 30% की।
दीर्घकालिक प्रभाव
वित्तीय सेवा विभाग के अनुसार, 2017-18 में डिजिटल पेमेंट की संख्या 2,071 करोड़ थी, जो 2023-24 में बढ़कर 18,737 करोड़ हो गई, जो 44 प्रतिशत की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) की वृद्धि को दर्शाता है। लेनदेन का मूल्य भी दोगुना से ज्यादा हो गया। इसी अवधि में, लेनदेन का मूल्य वित्त वर्ष 2017-18 में 1,962 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2023-24 में 3,659 लाख करोड़ रुपये हो गया है। 2025 के फेस्टिव सीजन में डिजिटल ट्रांजैक्शन ने नया रिकॉर्ड बनाया। यह साफ है कि डिजिटल पेमेंट अब भारतीय समाज का हिस्सा बन चुका है।
नोटबंदी का असर सिर्फ उस वक्त तक सीमित नहीं रहा। इसने भारत को डिजिटल इकोनॉमी की ओर धकेला और आज हर छोटे‑बड़े लेनदेन में डिजिटल पेमेंट आम हो चुका है।