Pension Starting Story: बुजुर्गों की मुस्कान में सबसे बड़ी वजह अगर कोई है, तो वो पेंशन है। इस एक शब्द में न जाने कितनी पीढ़ियों की राहत दी है। आज सरकारी हो या निजी कर्मचारी, रिटायरमेंट के बाद हर किसी का पेंशन ही सहारा होती है। लेकिन क्या कभी सोचा है कि अंग्रेजों के जमाने में भारतीयों को पेंशन में कितनी रकम मिलती थी? आइए जानते हैं।
पेंशन की व्यवस्था 2 हजार साल पुरानी है। 1770 के दशक में सबसे पहले यूरोपीय अधिकारियों को पेंशन देने की परंपरा शुरू हुई। कुछ ही सालों में भारतीय सिपाहियों और सिविल सर्वेंट्स को भी ये सुविधा मिलने लगी। इतिहासकार बताते हैं, सबसे पहले पेंशन ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को मिली थी, जिनमें लॉर्ड कॉर्नवालिस जैसे नाम शामिल हैं। हालांकि, पहले भारतीय पेंशनभोगी का नाम दर्ज नहीं, लेकिन मुमकिन है कि किसी सिपाही या हवलदार ने ब्रिटिश राज में पहली बार रिटायरमेंट के बाद पेंशन ली होगी।
कितनी मिलती थी पेंशन?
आंकड़ों की मानें तो एक आम सिपाही को 4-7 रुपये महीना और अंग्रेज अधिकारियों को 100-200 रुपये महीना पेंशन दी जाती थी। आज इन राशियों को सुनकर हंसी आ सकती है, लेकिन उन दिनों एक रुपये में पूरा घर महीना भर चल जाता था। उसके बाद 1889 में जर्मनी के चांसलर ओटो वॉन बिस्मार्क ने जब 70 साल से ऊपर के बुजुर्गों के लिए पहली बार सार्वजनकि पेंशन सिस्टम शुरू किया, तो पेंशन इनाम से अधिकार बन गई। यही मॉडल बाद में पूरी दुनिया में सामाजिक सुरक्षा की रीढ़ बना।
भारत में कब हुई पेंशन की शुरुआत?
भारत में पेंशन की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने 19वीं सदी में अपने अधिकारियों और सैनिकों के लिए रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सहारे की व्यवस्था की। माना जाता है कि 1881 में पहली बार सरकारी कर्मचारियों को औपचारिक रूप से पेंशन दी गई। उस समय ये एक सम्मानजनक राशि मानी जाती थी, जिससे रिटायर व्यक्ति अपनी जिंदगी की बुनियादी ज़रूरतें पूरी कर सके।