Property Dispute: क्या बुजुर्ग माता-पिता बच्चे को दिया गया घर वापस ले सकते हैं? जानें अपने कानूनी अधिकार

Property Dispute: क्या बच्चों को दी गई संपत्ति हमेशा के लिए उनके नाम हो जाती है? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले ने बुज़ुर्ग माता-पिता के अधिकारों को लेकर बड़ी स्पष्टता दी है। यह निर्णय उन परिवारों के लिए खास मायने रखता है जहां संपत्ति, भरोसा और रिश्तों के बीच विवाद खड़ा हो जाता है।

Priya Shandilya
पब्लिश्ड11 Mar 2026, 10:47 PM IST
क्या बुजुर्ग माता-पिता बच्चे को दिया गया घर वापस ले सकते हैं?
क्या बुजुर्ग माता-पिता बच्चे को दिया गया घर वापस ले सकते हैं?(istock)

Property Dispute: अक्सर माता-पिता अपने बच्चों पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं। अपनी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी और अपना घर, वे खुशी-खुशी बच्चों के नाम कर देते हैं। उन्हें लगता है कि बुढ़ापे में यही बच्चे उनका सहारा बनेंगे। लेकिन दुख की बात यह है कि कई बार घर हाथ में आते ही बच्चों के तेवर बदल जाते हैं। जो बच्चे पहले सेवा का दम भरते थे, वही बाद में मां-बाप को बोझ समझने लगते हैं या उन्हें घर से निकालने की कोशिश करते हैं।

क्या गिफ्ट में दिया घर वापस लिया जा सकता है?

अब सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले ने ऐसे माता-पिता को बड़ी राहत दी है। अदालत ने साफ कहा है कि अगर बच्चों को दी गई संपत्ति इस शर्त पर थी कि वे माता-पिता की देखभाल करेंगे और वे ऐसा नहीं करते, तो वह गिफ्ट डीड रद्द की जा सकती है और संपत्ति वापस मिल सकती है।

2 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उर्मिला दीक्षित बनाम सुनील शरण दीक्षित मामले में यह महत्वपूर्ण फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी वरिष्ठ नागरिक ने अपनी संपत्ति बच्चों को इस भरोसे पर दी कि वे उनकी देखभाल करेंगे, लेकिन बाद में बच्चे उस जिम्मेदारी से मुकर जाते हैं, तो ऐसी संपत्ति वापस ली जा सकती है।

जानिए उर्मिला दीक्षित केस का पूरा मामला

यह मामला मध्य प्रदेश के छतरपुर की रहने वाली बुज़ुर्ग महिला उर्मिला दीक्षित से जुड़ा है। उन्होंने जनवरी 1968 में एक संपत्ति खरीदी थी। सितंबर 2019 में उन्होंने यह संपत्ति अपने बेटे सुनील शरण दीक्षित को गिफ्ट डीड के जरिए ट्रांसफर कर दी। उस समय दस्तावेज में यह भी लिखा गया था कि बेटा अपनी मां की देखभाल करता है और उनकी जरूरतों का ध्यान रखता है। इसके अलावा उसी दिन एक अलग वचन पत्र (प्रॉमिसरी नोट) भी बनाया गया। इसमें साफ लिखा था कि बेटा अपने माता-पिता की जीवनभर सेवा करेगा और अगर ऐसा नहीं करता तो मां संपत्ति वापस ले सकती हैं।

लेकिन कुछ ही समय बाद हालात बदल गए। मां का आरोप था कि बेटे ने उनसे और उनके पति से मारपीट की और और संपत्ति ट्रांसफर करने का दबाव भी बनाया। अदालत ने यह भी कहा कि माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम, 2007 जैसे कानून को सख्ती से नहीं बल्कि उसके उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए समझा जाना चाहिए। इस कानून का मकसद बुज़ुर्गों को संरक्षण देना है, इसलिए इसे उनके हित में पढ़ा जाना चाहिए।

क्या था SDM का फैसला?

इन घटनाओं के बाद 24 दिसंबर 2020 को उर्मिला दीक्षित ने छतरपुर के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) के पास शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम, 2007 की धारा 22 और 23 के तहत यह मांग की कि गिफ्ट डीड को रद्द किया जाए और संपत्ति उन्हें वापस दी जाए। SDM ने उनकी शिकायत को सही मानते हुए गिफ्ट डीड को नल एंड वॉइड घोषित कर दिया।

SDM से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

यह मामला एक लंबी कानूनी यात्रा से गुजरा। सबसे पहले SDM ने मां के पक्ष में फैसला दिया और गिफ्ट डीड रद्द कर दी। इसके बाद बेटे ने कलेक्टर के पास अपील की, लेकिन वहां भी फैसला मां के पक्ष में ही रहा। फिर मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुंचा। पहले सिंगल जज बेंच ने भी SDM और कलेक्टर के फैसले को सही माना और कहा कि बेटे ने अपने माता-पिता की देखभाल नहीं की।

हालांकि बाद में हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने उल्टा फैसला देते हुए बेटे के पक्ष में निर्णय दे दिया। उनका कहना था कि अगर गिफ्ट डीड में सीधे तौर पर देखभाल की शर्त लिखी नहीं है, तो कानून की धारा 23 लागू नहीं होगी। इसके बाद उर्मिला दीक्षित ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम केस ने मां के हक में सुनाया फैसला

सुप्रीम कोर्ट की बेंच जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस संजय करोल ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया। अदालत ने कहा कि गिफ्ट डीड और वचन पत्र दोनों में यह साफ था कि बेटे को अपने माता-पिता की सेवा करनी थी। चूंकि यह शर्त पूरी नहीं हुई, इसलिए गिफ्ट डीड को रद्द करना सही था। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि संपत्ति का कब्जा 28 फरवरी 2025 तक मां को वापस सौंपा जाए।

अदालत ने रखा ये पक्ष

अदालत ने अपने फैसले में भारत में बुज़ुर्गों की स्थिति पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि संयुक्त परिवार व्यवस्था के कमजोर पड़ने से कई बुज़ुर्ग, खासकर विधवा महिलाएं भावनात्मक उपेक्षा और आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रही हैं। ऐसे में यह कानून उनके लिए सुरक्षा की एक अहम ढाल है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सीनियर सिटिजंस एक्ट के तहत बने ट्रिब्यूनल संपत्ति खाली कराने का आदेश भी दे सकते हैं।

संपत्ति देने से पहले यह सावधानी जरूरी

अगर आप अपनी प्रॉपर्टी बच्चों के नाम करने की सोच रहे हैं या कर चुके हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें:

  • शर्त जरूर लिखें: जब भी गिफ्ट डीड बनवाएं, उसमें साफ-साफ लिखवाएं कि "यह प्रॉपर्टी इस शर्त पर दी जा रही है कि बच्चे मेरी और मेरे जीवनसाथी की पूरी देखभाल करेंगे।"
  • कागजात संभाल कर रखें: अगर अलग से कोई वादा या 'वचन पत्र' लिखवाया है, तो उसकी कॉपी हमेशा अपने पास सुरक्षित रखें।
  • डरें नहीं, एक्शन लें: अगर बच्चे परेशान कर रहे हैं, तो सीधे अपने इलाके के SDM के पास शिकायत करें। आपको किसी महंगे वकील या लंबी सिविल कोर्ट की लड़ाई की जरूरत नहीं है, यह कानून खास आपके लिए बना है।
  • जुबानी वादों पर न जाएं: रिश्ता कितना भी करीबी क्यों न हो, प्रॉपर्टी जैसे मामलों में कागजी कार्रवाई और शर्तें बहुत जरूरी हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे बुज़ुर्गों के लिए उम्मीद की किरण है। यह साफ संदेश देता है कि अगर बच्चों ने माता-पिता की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा, तो कानून बुज़ुर्गों के साथ खड़ा होगा।

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