Property Gift Rules: क्या हिंदू और मुस्लिमों के लिए संपत्ति दान के नियम अलग हैं? जानें 'हिबा' और 'गिफ्ट डीड' का अंतर

Property Gift Rules: सोशल मीडिया पर प्रॉपर्टी गिफ्ट के नियमों को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है। लोगों का कहना है कि टैक्स के मामले में देश का कानून किसी खास समुदाय को छूट देकर दूसरों के साथ आर्थिक भेदभाव कर रहा है?

Shivam Shukla
अपडेटेड17 Mar 2026, 03:05 PM IST
Property Gift Rules: क्या हिंदू और मुस्लिमों के लिए संपत्ति दान के नियम अलग हैं?
Property Gift Rules: क्या हिंदू और मुस्लिमों के लिए संपत्ति दान के नियम अलग हैं?

Property Gift Rules: भारत में अपना घर खरीदना हर आम आदमी का सपना होता है। लेकिन जब इस प्रॉपर्टी को अपने प्रियजनों को गिफ्ट के रूप में देने की बात आती है, तो भारतीय कानून की एक गहरी विसंगति सामने खड़ी हो जाती है। सोशल मीडिया पर इसी को लेकर बहस छिड़ी हुई है। क्या प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन और टैक्स के मामले में देश का कानून किसी खास समुदाय को छूट देकर दूसरों के साथ आर्थिक भेदभाव कर रहा है?

दरअसल, हिंदू समुदाय और अन्य नागरिकों के बीच यह असंतोष बढ़ रहा है कि उन्हें अपनी ही प्रॉपर्टी गिफ्ट देने के लिए भारी-भरकम स्टांप ड्यूटी और लंबी रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, वहीं कुछ विशेष प्रावधानों के कारण अन्य समुदायों को इससे छूट मिल रही है। क्या यह व्यवस्था भारत के संविधान की तरफ से दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन है? क्या प्रॉपर्टी ट्रांसफर जैसे धर्मनिरपेक्ष काम में भी धार्मिक पहचान के आधार पर टैक्स का बोझ अलग-अलग होना चाहिए?

धारा 123 बनाम धारा 129

दरअसल, हिंदू, सिख, ईसाई और बौद्ध समुदायों के लिए प्रॉपर्टी गिफ्ट करने के नियम 'संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882' (Transfer of Property Act) की धारा 122 और 123 से शासित होते हैं। इसके तहत, नॉन-मूवेबल प्रॉपर्टी गिफ्ट करने के लिए एक गिफ्ट डीड बनवाना पड़ता है। इस पर भारी-भरकम स्टाम्प ड्यूटी वसूली जाती है और उसका सरकारी दफ्तर में रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है। बिना इसके, कानून की नजर में मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं होता है।

वहीं दूसरी ओर, इसी कानून की धारा 129 एक बड़ा अपवाद पैदा करती है। यह धारा स्पष्ट करती है कि गिफ्ट से जुड़े ये सख्त नियम मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) पर लागू नहीं होंगे। मुस्लिम समुदाय में इसे हिबा (Hiba) कहा जाता है।

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क्या हैं हिबा के नियम?

मुस्लिम पर्शनल लॉ में 'मौखिक हिबा' की व्यवस्था मान्य है, जिसमें तीन शर्तें पूरी होने पर गिफ्ट वैध माना जाता है।

1. गिफ्ट देने वाले की तरफ से दान की घोषणा करना।

2. गिफ्ट पाने वाले की तरफ से गिफ्ट मिलने की घोषणा करना।

3. संपत्ति के कब्जे का तुरंत हस्तांतरण।

इसका मतलब है कि एक मुस्लिम नागरिक को अपनी प्रॉपर्टी गिफ्ट करने के लिए न तो लिखित दस्तावेज की कानूनी जरूरत है और न ही रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता है। वहीं, एक आम हिंदू नागरिक को लाखों रुपये की स्टाम्प ड्यूटी और लंबी रजिस्ट्री प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जबकि 'मौखिक हिबा' के कारण दूसरे नागरिक को इस आर्थिक बोझ से छूट मिल जाती है।

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क्या यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है?

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ईश्वरेंद्र सिंह ने कहा, "भारत का संविधान हमें एक मूल वादा देता है, कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण। यही सिद्धांत अनुच्छेद 14 में निहित है और यही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा भी है। इसलिए जब कानून नागरिकों के बीच केवल धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यवहार करता दिखाई देता है, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या यह संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरता है। प्रॉपर्टी गिफ्ट के मामले में आज भी एक विचित्र स्थिति बनी हुई है। ज्यादातर नागरिकों को अपनी अचल संपत्ति गिफ्ट में देने के लिए विधिवत रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड बनवानी पड़ती है और उस पर पर्याप्त स्टाम्प ड्यूटी भी देनी होती है।"

उन्होंने आगे कहा, "वहीं मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में मौखिक हिबा की व्यवस्था मान्य है, जिसमें घोषणा, स्वीकृति और कब्जे के हस्तांतरण के साथ गिफ्ट वैध माना जाता है, भले ही वह लिखित या पंजीकृत न हो। व्यवहार में इसका अर्थ यह है कि संपत्ति के हस्तांतरण के लिए अलग-अलग धार्मिक समुदायों के नागरिकों को अलग प्रक्रियाओं और आर्थिक बोझ से गुजरना पड़ता है।"

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सुप्रीम कोर्ट में कई बार उठ चुका है मुद्दा

एक्सपर्ट ने आगे कहा, सुप्रीम कोर्ट ने भी समय समय पर यह कहा है कि मनमाना वर्गीकरण समानता के सिद्धांत के विपरीत है, जैसा कि State of West Bengal v. Anwar Ali Sarkar (1952) में स्पष्ट किया गया था। एक आधुनिक गणराज्य के रूप में हमें यह ईमानदारी से विचार करना होगा कि क्या ऐसे भेद अब भी उचित हैं। अंततः कानून का उद्देश्य नागरिकों को अलग-अलग खानों में बांटना नहीं, बल्कि सभी के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करना होना चाहिए। शायद समय आ गया है कि हम इस विषय पर गंभीर और संतुलित संवाद करें, ताकि संविधान की मूल भावना “समानता” वास्तव में हर नागरिक तक पहुँच सके।"

डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल जानकारी के लिए है। ऊपर दिए गए विचार और सिफारिशें, व्यक्तिगत विश्लेषकों हैं, न कि मिंट के।

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