डॉलर के मुकाबले 90 पर पहुंचा रुपया, किसको फायदा-किसे नुकसान?

रुपया 90 प्रति डॉलर के ऐतिहासिक स्तर से नीचे चला गया, जिससे ईंधन, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयातित उत्पाद महंगे होने की आशंका बढ़ गई है। इससे महंगाई और बाजारों में अस्थिरता आ सकती है, विदेश में पढ़ाई और विदेशी कर्ज महंगे होंगे। हालांकि वर्तमान में रिटेल महंगाई रिकॉर्ड निचले स्तर पर है।

Rishabh Shukla
अपडेटेड4 Dec 2025, 04:09 PM IST
एक डॉलर के मुकाबले 90 के पार पहुंचा रुपया
एक डॉलर के मुकाबले 90 के पार पहुंचा रुपया

बुधवार को भारतीय रुपया ऐतिहासिक स्तर पर फिसलकर 90 प्रति डॉलर के नीचे पहुंच गया। इस तेज गिरावट ने बाजारों में हलचल मचा दी और आयात महंगे होने की आशंका भी बढ़ गई। हालांकि, अर्थव्यवस्था के बुनियादी संकेतक मजबूत हैं। विकास दर छह तिमाहियों के उच्च स्तर पर और महंगाई ऐतिहासिक न्यूनतम पर है, जिससे सरकार और विशेषज्ञों को भरोसा है कि देश इस झटके को झेल सकता है। रुपए की कमजोरी का सबसे बड़ा असर ईंधन और उर्वरक आयात पर पड़ेगा। भारत अपनी 85% कच्चे तेल की जरूरत विदेशों से पूरी करता है। ऐसे में कमजोर रुपया पेट्रोलियम कंपनियों की लागत बढ़ाएगा और इनपुट महंगे होने से कई उद्योगों पर असर पड़ेगा। उर्वरकों के आयात महंगे होने से सरकार का सब्सिडी बोझ भी और बढ़ सकता है।

विदेश में पढ़ने वालों को लगा झटका

विदेश में पढ़ने वाले छात्रों को भी झटका लगेगा, क्योंकि डॉलर महंगा होने से फीस और रहने के खर्च में सीधी बढ़ोत्तरी होगी। इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्टफोन, AC, टीवी जैसे उत्पाद भी महंगे होने की संभावना है, क्योंकि इनमें आयातित पुर्जों का हिस्सा काफी बड़ा है। रुपए की गिरावट बाजारों में उतार-चढ़ाव ला सकती है। विदेशी निवेशक तब तक प्रतीक्षा कर सकते हैं जब तक मुद्रा स्थिर न हो जाए। इसी तरह, एयरलाइंस जो ईंधन और विमान लीजिंग के लिए डॉलर पर निर्भर हैं, के संचालन खर्च भी बढ़ेंगे। प्रीमियम कारें और EVs भी महंगी पड़ सकती हैं क्योंकि इनमें भी आयात का अनुपात ऊंचा है।

रुपए की गिरावट से आयात होगा महंगा

दूसरी ओर, रुपए की गिरावट निर्यातकों के लिए वरदान साबित हो सकती है। अमेरिकी टैरिफ के दबाव के बीच भारतीय एक्सपोर्ट अब ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। REER सूचकांक में भी सुधार दिख रहा है, जिससे संकेत मिलता है कि अब रुपया ओवरवैल्यूड से अंडरवैल्यूड दिशा में शिफ्ट हुआ है, जो निर्यात के लिए सकारात्मक है। आईटी और दवा उद्योग भी बड़ी कमाई कर सकते हैं, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा डॉलर में है। कमजोर रुपया सीधे तौर पर उनके राजस्व को बढ़ाएगा। इसी तरह, विदेशों में रह रहे भारतीयों से मिलने वाले रेमिटेंस में भी उछाल आ सकता है, क्योंकि डॉलर अब भारत में ज्यादा मूल्य देगा। वित्तीय वर्ष 25 में रिकॉर्ड 135.5 बिलियन डॉलर रेमिटेंस मिले थे, जो आगे और बढ़ सकता है। कुल मिलाकर, रुपए की गिरावट जहां आयात महंगे करेगी, वहीं निर्यात और रेमिटेंस जैसे क्षेत्रों को मजबूत बढ़त दे सकती है; यानी यह गिरावट नुकसान और अवसर… दोनों लेकर आई है।

रुपए की गिरती कहानी

भारतीय मुद्रा को गिरावट के लिहाज से पहला बड़ा झटका लगा साल 1966 में। इस दौरान एक डॉलर के मुकाबले रुपया 4.76 रुपए से गिरकर सीधा 7.50 रुपए पर पहुंच गया। चीन (1962) और पाकिस्तान (1965) की लड़ाइयों ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। इसके बाद रुपए में गिरावट के लिहाज से साल 1991 देश के लिए काफी अहम साबित हुआ। आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे देश ने आर्थिक उदारीकरण का रास्ता अपनाया। इस समय रुपया 21 से गिरकर 26 के करीब पहुंच गया। 1991 से 2008 के बीच रुपया कमजोर होकर 39 पर पहुंच गया। 2008 की मंदी के बाद रुपए में फिर एक बड़ी गिरावट आई और यह टूटकर एक डॉलर के मुकाबले 51 रुपए के पार पहुंच गया। हालांकि, यह गिरावट भारत की वजह से नहीं, बल्कि वैश्विक कारणों से थी। नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने से पहले रुपए में आखिरी बड़ी गिरावट साल 2013 में आई। इस दौरान रुपया एक डॉलर के मुकाबले 55 रुपए से फिसलकर 68.80 रुपए तक पहुंच गया। बीते दो-तीन वर्षों में रुपया डॉलर के मुकाबले 84-85 के स्तर पर कारोबार करता दिख रहा था। फिर 2025 में डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने शुरू हुआ जवाबी टैरिफ का खेला। अब रुपया एक डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 90 रुपए के पार चला गया।

Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.

बिजनेस न्यूज़मनीडॉलर के मुकाबले 90 पर पहुंचा रुपया, किसको फायदा-किसे नुकसान?
More
बिजनेस न्यूज़मनीडॉलर के मुकाबले 90 पर पहुंचा रुपया, किसको फायदा-किसे नुकसान?