Risk Management: जोखिम से डरते हैं 80% भारतीय, निवेश पर SEBI के सर्वे में निकली चौंकाने वाली बात

Sebi Survey on Indian Investors: सेबी के सर्वे में सामने आया है कि करीब 80% भारतीय परिवार जोखिम लेने से बचते हैं। इससे लंबी अवधि में दौलत बनाना मुश्किल हो जाता है। हमें पता होना चाहिए कि जोखिम और रिटर्न में संतुलन कैसे बनाया जाए और पोर्टफोलियो को प्रभावी ढंग से कैसे मैनेज किया जाए।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड13 Oct 2025, 10:37 AM IST
निवेश पर जोखिम लेने से बचते हैं ज्यादातर भारतीय (सांकेतिक तस्वीर)
निवेश पर जोखिम लेने से बचते हैं ज्यादातर भारतीय (सांकेतिक तस्वीर)

Investment Tips: भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने 2025 के लिए एक निवेश सर्वे किया है। इस सर्वे से एक बड़ी बात सामने आई है कि भारतीय परिवार निवेश के मामले में बहुत ज्यादा जोखिम लेने से बचते हैं। सर्वे के मुताबिक, लगभग 80 प्रतिशत परिवार अपने पैसे को सुरक्षित रखने को ज्यादा महत्व देते हैं, भले ही उन्हें इससे कम रिटर्न मिले। यह सर्वे 400 शहरों और 1,000 गांवों के 90,000 परिवारों के बीच किया गया। लेकिन क्या जोखिम से बचना हमेशा फायदेमंद होता है? आइए समझते हैं।

निवेशक जोखिम से क्यों बचते हैं?

भारतीय निवेशक पारंपरिक रूप से सतर्क रहे हैं। मनीएडस्कूल के संस्थापक अर्नव पंड्या कहते हैं, 'लोग वही करते हैं जो उन्होंने अपने माता-पिता को करते हुए देखा है।' जोखिम से बचने के पीछे इंसानी मनोविज्ञान भी काम करता है। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के संस्थापक और सीईओ विशाल धवन बताते हैं, 'जितना पैसा गंवाने पर दुख होता है, उतना ही पैसा कमाने पर होने वाली खुशी उससे तीन गुना कम होती है।' इसके अलावा, इनकम की अनिश्चितता और अनसिक्योर्ड लोन पर ईएमआई चुकाने का बोझ भी निवेशकों को ज्यादा सतर्क बना देता है। धवन यह भी जोड़ते हैं कि पिछले एक साल में इक्विटी मार्केट के फ्लैट प्रदर्शन ने भी इस व्यवहार को बढ़ावा दिया है।

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जोखिम न लेने से दौलत पर असर

पैसे को केवल सुरक्षित रखने पर ध्यान देने से लंबी अवधि में बड़ी दौलत बनाना मुश्किल हो जाता है। सेबी-रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार दीपेश राघव के अनुसार, 'जोखिम भरे एसेट्स से बचने पर लंबे समय में पोर्टफोलियो पर कम रिटर्न मिलता है।' युवा निवेशक इक्विटी से दूर रहकर कंपाउंडिंग के फायदे से चूक जाते हैं। रिटायरमेंट और बच्चों की शिक्षा जैसे लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए बनाए गए पोर्टफोलियो में इक्विटी की कमी से अच्छे नतीजे नहीं मिलते। बहुत ज्यादा सतर्क रहने से लोग अपनी नियमित आय पर अधिक निर्भर हो जाते हैं, जिससे उन्हें ज्यादा समय तक और ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। पंड्या कहते हैं, 'जब आपके पोर्टफोलियो का रिटर्न महंगाई को नहीं हरा पाता, तो जीवन स्तर में सुधार करना मुश्किल हो जाता है।'

बहुत ज्यादा जोखिम भी है खतरनाक

कुछ निवेशक इसके बिल्कुल विपरीत चलते हैं और बहुत ज्यादा जोखिम उठा लेते हैं। पंड्या का कहना है, 'जल्दी अमीर बनने की चाहत लोगों को फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) या क्रिप्टोकरेंसी जैसे साधनों की ओर खींचती है।' इस तरह के जोखिम भरे ट्रेड से होने वाला नुकसान आपके उन पैसों को भी खत्म कर सकता है जो आपने हेल्थ इमरजेंसी या नौकरी जाने जैसी स्थितियों के लिए बचाकर रखे हैं।

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हर एसेट क्लास में है अपना जोखिम

आमतौर पर कर्ज (Debt) को इक्विटी से सुरक्षित माना जाता है, लेकिन इसमें भी जोखिम होते हैं। 2020 के फ्रैंकलिन टेम्पलटन डेट फंड संकट के दौरान लिक्विडिटी का जोखिम देखा गया था। लंबी अवधि के बॉन्ड्स में ब्याज दर का जोखिम ज्यादा होता है। जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो उनकी कीमतें कम अवधि वाले बॉन्ड्स की तुलना में ज्यादा गिरती हैं। डेट में री-इन्वेस्टमेंट का जोखिम भी होता है, यानी जब आपकी मैच्योरिटी पूरी हो और ब्याज दरें कम हों, तो आपको कम रेट पर फिर से निवेश करना पड़ता है। इसी तरह, इक्विटी में अस्थिरता का जोखिम होता है, जबकि रियल एस्टेट में पूंजी का नुकसान और इलिक्विडिटी (बिकने में समय लगना) का खतरा रहता है।

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क्या है रिस्क मैनेजमेंट का गुर?

जोखिम को प्रभावी ढंग से मैनेज करना सबसे महत्वपूर्ण है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आप कितना जोखिम उठा सकते हैं। राघव के मुताबिक, 'बाजार के कुछ उतार-चढ़ाव का अनुभव करने के बाद ही किसी को अपनी असली जोखिम लेने की क्षमता का पता चलता है।' आपका निवेश क्षितिज यह तय करता है कि आपको कितना जोखिम लेना चाहिए। कम अवधि के लक्ष्यों के लिए कम जोखिम और लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए ज्यादा जोखिम लेना चाहिए। धवन के अनुसार, 'इक्विटी और रियल एस्टेट लंबी अवधि के लिए आदर्श हैं।' जोखिम को मैनेज करने के लिए डाइवर्सिफिकेशन और एसेट एलोकेशन सबसे कारगर तरीके हैं। निवेशकों को अपनी जोखिम क्षमता के हिसाब से 60:40 या 70:30 के अनुपात में इक्विटी और डेट में अपना पैसा बांटना चाहिए। साथ ही, समय-समय पर पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करना भी बहुत जरूरी है।

Disclaimer: यह रिपोर्ट पाठकों को केवल जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए है। मिंट हिंदी अपने पाठकों को निवेश पर कोई भी फैसला लेने से पहले एक्सपर्ट की सलाह लेने का हमेशा सुझाव देता है। आपके निवेश से जुड़े फैसले और परिणाम को लेकर मिंट हिंदी किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं है।

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