
ESOP buyback vs ipo liquidity: भारतीय स्टार्टअप ईकोसिस्टम के लिए साल 2025 एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ है। कभी बंद कमरों में कोडिंग और स्ट्रैटेजी बनाने वाले युवाओं के लिए 'स्टॉक ऑप्शंस' (ESOPs) महज कागज का एक टुकड़ा हुआ करते थे, लेकिन आज वे 'करोड़पति' बनाने वाली मशीन बन चुके हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस साल 16 बड़े स्टार्टअप्स के IPO ने कर्मचारियों की झोली में 1 अरब डॉलर (करीब 8,300 करोड़ रुपये) से ज्यादा की रकम डाली है। यह उछाल दिखाता है कि भारत में अब नौकरी का मतलब सिर्फ महीने की सैलरी नहीं, बल्कि कंपनी में हिस्सेदारी और उससे मिलने वाली बड़ी संपत्ति भी है।
अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें, तो 2025 की सफलता चौंकाने वाली है। जहां 2023 में कर्मचारियों को ESOPs के जरिए महज 3.9 करोड़ डॉलर मिले थे, वहीं 2024 में यह आंकड़ा 80.7 करोड़ डॉलर तक पहुंचा। लेकिन 2025 ने इन सबको पीछे छोड़ते हुए 1 अरब डॉलर का जादुई आंकड़ा पार कर लिया है।
मीशो, ग्रो, अर्बन कंपनी और फिजिक्स वाला जैसी कंपनियों ने न केवल बाजार से फंड जुटाया, बल्कि अपने वर्कफोर्स को भी आर्थिक रूप से आजाद कर दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि अब स्टार्टअप्स में 'इक्विटी' सैलरी पैकेज का सबसे आकर्षक हिस्सा बन चुकी है।
ईसॉप्स से कमाई करना जितना रोमांचक है, इसके टैक्स गणित को समझना उतना ही पेचीदा। टैक्स का पहला हमला तब होता है जब आप अपने 'वेस्टेड' विकल्पों को शेयरों में बदलते हैं। इस समय, शेयर की वर्तमान बाजार वैल्यू (FMV) और आपके खरीदने की कीमत के बीच के अंतर को आपकी 'सैलरी' (Perquisite) मान लिया जाता है।
उदाहरण के लिए, अगर आपको 20 रुपये में शेयर मिला और बाजार में उसकी कीमत 100 रुपये है, तो 80 रुपये पर आपकी इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगेगा। हालांकि, सरकार ने पात्र स्टार्टअप्स को इस टैक्स को पांच साल तक टालने की सुविधा भी दी है।
जब आप अपने इन शेयरों को आईपीओ या बायबैक में बेचते हैं, तब एंट्री होती है 'कैपिटल गेन्स टैक्स' की। यहां समय का बहुत महत्व है। अगर आपने लिस्टेड शेयरों को 12 महीने से ज्यादा अपने पास रखा है, तो इसे 'लॉन्ग टर्म' माना जाएगा और 1.25 लाख रुपये से ऊपर के मुनाफे पर 12.5% टैक्स लगेगा। वहीं, अगर आप जल्दबाजी में शेयर बेचते हैं, तो 'शॉर्ट टर्म' टैक्स की दर 20% तक जा सकती है। इसलिए, सही समय पर शेयर बेचना आपकी बचत के लिए निर्णायक होता है।
एक चतुर निवेशक वही है जो अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स में न गंवा दे। टैक्स एक्सपर्ट्स की सलाह है कि कर्मचारियों को अपने सारे शेयर एक साथ नहीं बेचने चाहिए। अगर आप किश्तों में शेयर बेचते हैं, तो आप हर साल मिलने वाली टैक्स छूट का अधिकतम लाभ उठा सकते हैं। इसके अलावा, SME IPO और मेन बोर्ड IPO के नियमों में भी अंतर होता है, जिसे समझना जरूरी है।
मुख्य बोर्ड (Main Board) और एसएमई (SME) बोर्ड के बीच नियमों का अंतर समझना बहुत जरूरी है। अक्सर निवेशक दोनों को एक जैसा समझ लेते हैं, लेकिन SME में रिस्क और नियमों की ढील काफी ज्यादा होती है। इन दोनों के बीच के प्रमुख अंतर इस प्रकार हैं...
मुख्य बोर्ड: इन कंपनियों के लिए नियम बहुत कड़े हैं। इन्हें हर तीन महीने (Quarterly) में अपनी कमाई और खर्चों का हिसाब (वित्तीय नतीजे) सार्वजनिक करना पड़ता है।
SME बोर्ड: यहां नियमों में थोड़ी राहत है। SME कंपनियों को साल में सिर्फ दो बार (Half-yearly) ही अपने वित्तीय नतीजे घोषित करने होते हैं। इससे निवेशकों को कंपनी की ताज़ा स्थिति का पता देर से चलता है।
मुख्य बोर्ड: यहां एक लॉट की कीमत आमतौर पर 14,000 रुपये से 15,000 रुपये के बीच होती है। इसे छोटे निवेशक आसानी से खरीद सकते हैं।
SME बोर्ड: यहां कम से कम 1,00,000 रुपये से 1,50,000 रुपये तक का निवेश करना अनिवार्य होता है। यह बड़ा अमाउंट इसलिए रखा गया है ताकि सिर्फ वही निवेशक आएं जो जोखिम समझ सकते हैं।
मुख्य बोर्ड: आप जब चाहें तब एक शेयर भी खरीद या बेच सकते हैं। इसमें खरीदारों की कमी नहीं होती।
SME बोर्ड: यहां आप एक-दो शेयर नहीं बेच सकते। आपको पूरा का पूरा 'लॉट' ही बेचना पड़ता है। कई बार खरीदार न मिलने पर आप अपने शेयर बेच नहीं पाते, जिसे 'लिक्विडिटी रिस्क' कहते हैं।
मुख्य बोर्ड: इनके आईपीओ के पेपर्स (DRHP) की सीधी जांच सेबी (SEBI) खुद करता है।
SME बोर्ड: इनके पेपर्स की जांच सेबी नहीं, बल्कि स्टॉक एक्सचेंज (NSE/BSE) करते हैं। सेबी केवल अपनी निगरानी रखता है, लेकिन सीधे तौर पर फाइलों को अप्रूव नहीं करता।
Disclaimer: यह लेख केवल जानकारी के लिए है। निवेश करने से पहले किसी प्रमाणित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। मिंट हिंदी आपके किसी भी निर्णय और उसके परिणाम के लिए तनिक भी उत्तरदायी नहीं है।
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