
Salary Calculator: सरकार के नए लेबर कानूनों की वजह से, अप्रैल 2026 से पूरे देश में ज़्यादातर भारतीय कर्मचारियों की सैलरी में बड़े बदलाव होंगे। सरकार के मुताबिक, इस बदलाव से कर्मचारियों की रिटायरमेंट सेविंग्स लंबे समय में बढ़ेंगी। हालांकि, कम समय के लिए ज्यादातर सैलरी पाने वाले कर्मचारियों की 'टेक-होम सैलरी' (हाथ में आने वाली सैलरी) कम हो जाएगी। इस कदम के ज़रिए, केंद्र सरकार का लक्ष्य वेतनभोगी व्यक्तियों की इतनी बचत करने में मदद करना है, जिससे वे अपनी सेवानिवृत्ति के बाद भी एक स्वस्थ जीवन जी सकें।
पहले कई कंपनियां बेसिक सैलरी कम रखती थीं और बाकी पैसा अलाउंस के रूप में देती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाएगा। इस बदलाव का असर यह होगा कि आपकी बेसिक सैलरी बढ़ेगी। जैसे ही बेसिक बढ़ेगी वैसे ही EPFO के EPF में आपका और कंपनी का योगदान भी बढ़ जाएगा। इससे आपकी रिटायरमेंट सेविंग मजबूत होगी।
नौकरी शुरू करते समय या ऑफर लेटर मिलने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि CTC (Cost to Company) और इन-हैंड सैलरी में आखिर कितना अंतर होता है। 12 लाख रुपये CTC सुनने में आकर्षक लगता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि पूरा पैसा कर्मचारी के हाथ में नहीं आता। CTC में कंपनी द्वारा कर्मचारी पर किया गया कुल खर्च शामिल होता है। इसमें बेसिक सैलरी, हाउस रेंट अलाउंस (HRA), अन्य भत्ते, प्रोविडेंट फंड (PF), ग्रेच्युटी और कई बार बोनस भी शामिल होते हैं। इसलिए इन-हैंड सैलरी हमेशा CTC से कम होती है।
सुधारों के अनुसार, अब सैलरी में बेसिक सैलरी, महंगाई भत्ता (DA) और रिटेनिंग भत्ता (retaining allowance) शामिल है। ये तीनों घटक किसी कर्मचारी के कुल पारिश्रमिक का कम से कम 50% होने चाहिए। वहीं, बोनस, HRA और विशेष भत्ते जैसे अन्य घटकों को 'अपवाद' (exclusions) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। ये चार नए लेबर कोड्स (वेजेस, सोशल सिक्योरिटी, इंडस्ट्रियल रिलेशंस और ओएसएच कोड) का हिस्सा हैं।
अगर किसी कर्मचारी का सालाना CTC 12 लाख रुपये है, तो उसका मासिक CTC करीब 1 लाख रुपये होता है। आमतौर पर कंपनियां बेसिक सैलरी को कुल सैलरी का 40 से 50 प्रतिशत रखती हैं। इस हिसाब से मान लें कि कर्मचारी की बेसिक सैलरी 50,000 रुपये प्रति माह है, जबकि बाकी राशि HRA और अन्य अलाउंस के रूप में दी जाती है। यही संरचना आगे PF और टैक्स की गणना को प्रभावित करती है।
प्रोविडेंट फंड (PF) सैलरी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, जो रिटायरमेंट बचत के लिए अनिवार्य रूप से काटा जाता है। कर्मचारी के बेसिक वेतन का 12 प्रतिशत PF के रूप में कटता है। यदि बेसिक सैलरी 50,000 रुपये है, तो हर महीने लगभग 6,000 रुपये PF के रूप में कटेंगे। साल भर में यह राशि 72,000 रुपये तक पहुंच जाती है। यह पैसा सीधे कर्मचारी के हाथ में नहीं आता, लेकिन भविष्य के लिए बचत के रूप में जमा होता है।
अब अगर मासिक सैलरी 1 लाख रुपये मानी जाए, तो उसमें से PF और टैक्स की कटौती के बाद वास्तविक इन-हैंड सैलरी निकलती है। हर महीने लगभग 6,000 रुपये PF और करीब 7,150 रुपये TDS कटने के बाद कर्मचारी के हाथ में करीब 86,000 से 87,000 रुपये के बीच सैलरी आती है। यानी 12 लाख CTC पर औसतन इन-हैंड सैलरी 85,000 से 90,000 रुपये के बीच रहती है, जो कंपनी के सैलरी स्ट्रक्चर पर थोड़ा-बहुत निर्भर कर सकती है।
हर साल अप्रैल में नई वित्तीय वर्ष की शुरुआत होती है। इस समय कई कर्मचारियों को सैलरी अपेक्षाकृत कम मिलती है, जिससे भ्रम की स्थिति बनती है। दरअसल, कंपनियां अप्रैल से ही पूरे साल के अनुमानित टैक्स के आधार पर TDS काटना शुरू कर देती हैं। चूंकि इस समय तक कर्मचारी अपनी टैक्स सेविंग निवेश (जैसे ELSS, LIC, या अन्य छूट) की जानकारी नहीं देते, इसलिए शुरुआती महीनों में ज्यादा टैक्स कटता है। इसके अलावा, कुछ कंपनियां साल की शुरुआत में सैलरी स्ट्रक्चर को अपडेट करती हैं, जिससे PF या अन्य कटौतियों में हल्का बदलाव आ सकता है। इन कारणों से अप्रैल की सैलरी अपेक्षाकृत कम नजर आती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ये बदलाव लॉन्ग टर्म में फायदेमंद है। बढ़ा PF रिटायरमेंट पर मिलेगा, ग्रेच्युटी बेसिक पर ज्यादा कैलकुलेट होगी और पेंशन सिक्योर होगी। नियोक्ता को भी CTC बढ़ाना पड़ सकता है, क्योंकि टैलेंट रिटेन करने के लिए कंपनियां सैलरी रिव्यू कर रही हैं। HR कंसल्टेंट्स बता रहे हैं कि कुछ फर्म्स ने अप्रैल सैलरी में ही एडजस्टमेंट किया है, जबकि बाकी मई तक इंतजार करवा रही हैं।
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