Unclaimed Wealth: देश में 80,000 करोड़ रुपये पड़े है लावारिश, कोई नहीं है दावेदार

Unclaimed Wealth: भारत में परिवार अपनी ही विरासत का हिसाब-किताब नहीं मिल रहा है। 80,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि लावारिश पड़ी हुई है। वित्तीय सलाहकारों ने चेतावनी देते हुआ कहा कि यह समस्या संपत्ति सृजन की नहीं, बल्कि स्पष्ट रिकॉर्ड, नामांकन और घर में खुली चर्चा नहीं होती है। 

Jitendra Singh
अपडेटेड12 Nov 2025, 07:56 AM IST
Unclaimed Wealth: करोड़ों रुपये का कोई दावेदार नहीं है।
Unclaimed Wealth: करोड़ों रुपये का कोई दावेदार नहीं है। (Livemint)

Unclaimed Wealth: देश में करोड़ों रुपये लावारिश पड़े हुए हैं। इन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। भारत में, हजारों परिवार अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से हाथ धो बैठते हैं। बहुत से लोगों को पता ही नहीं है कि उनके पैसे कहां- कहां पड़े हुए हैं। कुछ लोगो को लगता है कि वो अपने पैसे आखिर कहां ढूंढ़े। इन पैसों के वास्तविक हकदारों के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है। कई ऐसे परिवार हैं जिनके सदस्यों के पैसे बैंक खातों, बीमा फंडों या म्युचुअल फंड्स में जमा हैं, लेकिन परिवार के लोगों को इसकी खबर तक नहीं है।

ऐसे में ये पैसे करोड़ों रुपये लावारिश की तरह पड़े हुए हैं। इस रकम को पूछने वाला कोई नहीं है। आज इन पैसों के कोई दावेदार नहीं मिल रहे हैं। सेबी रजिस्टर्ड इन्वेस्टमेंट एडवाइजर और सहज मनी के फाउंडर अभिषेक कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस बात की जानकारी दी है। उन्होंने एक पोस्ट में कहा है कि करीब 80,000 करोड़ रुपये ऐसे पड़े हैं जिनका कोई दावेदार नहीं है। अभिषेक ने ये भी कहा कि यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके बारे में बहुत कम लोग चर्चा करते हैं।

आखिर लावारिश क्यों रह जाती है रकम?

इंडिया टुडे में छपी खबर के मुताबिक, अभिषेक कुमार का कहना है कि यह स्थिति इसलिए नहीं है कि लोगों के पास पैसे की कमी है, बल्कि इसकी असली वजह कम्युनिकेशन की कमी है। पेपरवर्क की जटिलता और परिवारों में जागरूकता का अभाव की वजह से कई बार रकम जमा पड़ी रह जाती है। उन्होंने लोगों से सवाल पूछा कि क्या उनके परिवार को उनके पैसों की जानकारी है? कई बार ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके निवेशों के बारे में परिवार को कोई जानकारी नहीं होती, जिससे वह पैसा सालों तक बिना दावे के पड़े रह जाते हैं।

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परिजनों को पैसों के बारे में बहुत देर से पता चलता है

कुमार ने एक वास्तविक उदाहरण देते हुए बताया कि पिछले साल, मैंने एक क्लाइंट को उसके पूरे पोर्टफोलियो का डॉक्यूमेंटेशन करने में मदद की थी। उसकी पत्नी को पता ही नहीं था कि उसके म्यूचुअल फंड में 15 लाख रुपये हैं। एक और उदाहरण में बताया कि एक परिवार को बैंक खाता अनलॉक कराने में लगभग दो साल लग गए, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उसमें नॉमिनी का नाम नहीं जोड़ा गया था।

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सिर्फ वसीयतनामा पर्याप्त नहीं है

अभिषेक ने चेतावनी देते हुए कहा कि ज्यादातर लोग सोचते हैं कि सिर्फ वसीयतनामा (Will) बना लेना पर्याप्त है, लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वसीयतनामा तभी प्रभावी होती है जब वह उचित साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से तैयार की गई हो। देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जिनकी मेहनत की कमाई कई वित्तीय संस्थानों में फंसी हुई है। अभिषेक ने कहा कि उचित दस्तावेज़ों के बिना वसीयत, बिना नींव के घर की तरह है। उसी दिन मेडिकल सर्टिफिकेट हासिल करें। हस्ताक्षर की वीडियो रिकॉर्डिंग करवाएं। इसे रजिस्टर्ड कराएं। ये कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि ज़रूरी कदम हैं।

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वहीं जानकारों का कहना है कि लोगों को अपने निवेशों की जानकारी परिवार को जरूर देनी चाहिए। सभी खातों में नॉमिनी अवश्य जोड़ना चाहिए। इसके साथ ही जरूरी दस्तावेजों को सुव्यवस्थित रखना चाहिए ताकि भविष्य में उनकी संपत्ति लावारिस न रह जाए।

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