
केंद्र सरकार ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनने और सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री पद की कमान संभालने के ठीक एक महीने बाद पश्चिम बंगाल के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS) का खजाना खोल दिया है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पश्चिम बंगाल के लिए जून 2026 के लिए 153 लाख कार्यदिवस (person-days) के लेबर बजट को मंजूरी दे दी है। इसके अलावा, 1 जुलाई, 2026 से राज्य में नया ग्रामीण रोजगार ढांचा 'VB-G RAM G' भी लागू होने जा रहा है।
यह खबर अगर सिर्फ एक सरकारी घोषणा होती, तो शायद बड़ी न लगती। लेकिन इसके पीछे चार साल का एक कड़वा राजनीतिक संघर्ष है। अदालतों की लड़ाई है, धरने हैं, और लाखों ग्रामीण मजदूरों की जिंदगी का सवाल है।
केंद्र सरकार ने मार्च 2022 में MGNREGA अधिनियम की धारा 27 का हवाला देते हुए पश्चिम बंगाल को MGNREGS फंड देना बंद कर दिया। सरकार का आरोप था कि बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है, फर्जी जॉब कार्ड्स बनाए गए हैं, और योजना के दिशानिर्देशों की अनदेखी हो रही है।
दिसंबर 2021 में ही धारा 27 पहली बार लागू की गई थी। इसके बाद जो संख्या सामने आई, वह चौंकाने वाली थी। राज्य सरकार का दावा था कि केंद्र पर उसके 7,500 करोड़ रुपये बकाया हैं, जिनमें सिर्फ मजदूरी के 2,744 करोड़ रुपये शामिल हैं। दूसरी ओर, तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गिरिराज सिंह ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने केंद्र का पैसा हड़प लिया और सीबीआई जांच की बात भी उठाई।
फंड फ्रीज के बाद ममता बनर्जी ने इसे राजनीतिक उत्पीड़न बताया। उन्होंने केंद्र पर 'जानबूझकर दुष्प्रचार अभियान' चलाने का आरोप लगाया और कहा कि बंगाल को उसका हक मिलना चाहिए। टीएमसी ने दिल्ली तक बसें भरकर प्रदर्शन किए, संसद में सवाल उठाए और अदालतों में याचिकाएं लगाईं।
जून 2025 में कलकत्ता हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने केंद्र को आदेश दिया कि वह 1 अगस्त से बंगाल में मनरेगा काम फिर शुरू करे। जब केंद्र ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, तो अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी यानी हाई कोर्ट का आदेश अंतिम हो गया।
लेकिन उसके बावजूद जमीन पर कुछ नहीं बदला। कोर्ट का आदेश आने के बाद भी फंड जारी नहीं हुआ। मंत्रालय ने राज्य से एक और 'एक्शन टेकन रिपोर्ट' मांगी, यह दावा करते हुए कि पिछली रिपोर्टों में कमी थी। राज्य का कहना था कि दो दर्जन से अधिक एटीआर पहले ही दाखिल की जा चुकी हैं और यह ताजा मांग महज टालमटोल की चाल है।
मनरेगा फंड बंद होने के बाद ममता सरकार ने खुद अपने खजाने से मजदूरों को काम देने की कोशिश की। राज्य सरकार ने 'कर्मश्री' नाम से एक योजना शुरू की, जिसके तहत जॉब कार्ड धारकों को सालाना 50 से 70 दिन का काम मिलता था जो मनरेगा की 100 दिन की गारंटी से काफी कम था। जब केंद्र ने दिसंबर 2025 में MGNREGA को बदलकर VB-G RAM G बिल लाया, तो ममता बनर्जी ने उसे एक और मोर्चे पर चुनौती दी। उन्होंने अपनी 'कर्मश्री' योजना का नाम बदलकर 'महात्मा-श्री' कर दिया और कहा कि महात्मा गांधी के सम्मान से कोई समझौता नहीं होगा।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने VB-G RAM G बिल 2025 को मंजूरी दी थी। यह कानून MGNREGA 2005 की जगह लेगा। नई योजना में कई अहम बदलाव हैं। MGNREGA के 100 दिनों की जगह अब हर ग्रामीण परिवार को साल में 125 दिन का रोजगार मिलेगा। लेकिन फंडिंग का ढांचा भी बदल गया है। पहले केंद्र की पूरी जिम्मेदारी थी, अब 60:40 के अनुपात में केंद्र और राज्य मिलकर खर्च उठाएंगे। यानी राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा।
एक और बड़ा बदलाव यह है कि खेती के व्यस्त मौसम में काम बंद रहेगा। साल में 60 दिन की ऐसी अनिवार्य 'रोक' की अवधि होगी। इसके अलावा एआई आधारित धोखाधड़ी पहचान, GPS मॉनिटरिंग और रियल-टाइम MIS डैशबोर्ड जैसी तकनीकी पारदर्शिता की व्यवस्था भी होगी। विपक्ष ने संसद में तीखा विरोध किया। टीएमसी और सीपीएम सांसदों ने मांग की कि योजना का नाम वापस 'महात्मा गांधी' पर रखा जाए, केंद्र 100% खर्च उठाए और काम की गारंटी 150 या 200 दिन तक बढ़ाई जाए।
9 मई, 2026 को रबींद्रनाथ टैगोर की जयंती के दिन सुवेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री बने। बीजेपी ने 294 में से 208 सीटें जीती हैं। इसके बाद जो हुआ, वह बंगाल की राजनीति का सबसे तीखा व्यंग्य है। जो काम चार साल की अदालती लड़ाई और असंख्य धरनों से नहीं हुआ, वह बीजेपी की सरकार बनते ही हफ्तों में हो गया। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सीएम सुवेंदु अधिकारी को पत्र लिखकर जून 2026 के लिए 153 लाख कार्यदिवस का श्रम बजट मंजूर करने की जानकारी दी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि VB-G RAM G 1 जुलाई, 2026 से पश्चिम बंगाल में लागू होगी।
सीएम सुवेंदु अधिकारी ने पहले ही राज्य प्रशासन को नई योजना शुरू करने के निर्देश दे दिए थे। हालांकि प्रारंभ में दक्षिण 24 परगना और मुर्शिदाबाद जिलों में पुराने टीएमसी शासनकाल में भारी अनियमितताओं के आरोपों के चलते योजना रोककर रखी गई थी।
यह पूरा प्रसंग एक बड़े सवाल को जन्म देता है कि क्या केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध नीति-आधारित हैं या राजनीति-आधारित? एक पक्ष कहता है कि बंगाल में जो हुआ वह सब भ्रष्टाचार की सजी थी। फर्जी जॉब कार्ड्स, हड़पे गए पैसे और बार-बार एटीआर देने के बावजूद पारदर्शिता का अभाव, ये सारी वजहें थीं।
बीजेपी का आरोप था कि आधार सीडिंग शुरू होते ही 1.30 करोड़ जॉब कार्ड्स रद्द हो गए। दूसरी तरफ, टीएमसी का तर्क था कि बीजेपी शासित राज्यों के साथ ऐसा नहीं हुआ, यह एक गैर-बीजेपी राज्य को जानबूझकर दंडित करने की नीति थी। सुप्रीम कोर्ट ने जब केंद्र की अपील खारिज की, तब भी फंड नहीं आया। यह तथ्य इस बहस को और गहरा बनाता है।
नई सरकार ने साफ किया है कि रोजगार गारंटी योजना के तहत काम मिलने में आधार और वोटर कार्ड अनिवार्य होंगे। दक्षिण 24 परगना और मुर्शिदाबाद जिलों में शुरुआत में योजना स्थगित रहेगी। यानी राज्य के सबसे घनी आबादी वाले और संवेदनशील जिलों के मजदूरों को अभी और इंतजार करना होगा। VB-G RAM G में 60:40 की फंडिंग व्यवस्था बंगाल जैसे वित्तीय दबाव में फंसे राज्य के लिए नई चुनौती लेकर आएगी। यह भी देखना होगा कि नई सरकार इसे कैसे संभालती है।
पश्चिम बंगाल की MGNREGS कहानी असल में यह दिखाती है कि केंद्र-राज्य के बीच राजनीतिक मतभेद का सबसे ज्यादा नुकसान कौन उठाता है। वह है- ग्रामीण मजदूर। चार साल के संघर्ष, अदालती लड़ाई और करोड़ों रुपये के बकाये के बाद जो बदलाव एक चुनाव ने कर दिया, वह भारत के संघीय ढांचे के बारे में कई असुविधाजनक सवाल छोड़ता है। अब 1 जुलाई से VB-G RAM G लागू होगी, तब देखना होगा कि यह बंगाल के ग्रामीण मजदूर के लिए नया अध्याय बनती है, या पुरानी समस्याएं नए नाम से लौटती हैं।
Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.
MoreOops! Looks like you have exceeded the limit to bookmark the image. Remove some to bookmark this image.