What is FOIR: कई बार हम सोचते हैं कि क्रेडिट स्कोर तो अच्छा है, फिर लोन क्यों नहीं मिला? दरअसल, बैंक सिर्फ आपका CIBIL नहीं देखते, वो एक और अहम चीज जांचते हैं फिक्स्ड ऑब्लिगेशन टू इनकम रेश्यो (FOIR)। यही वो नंबर है जो बताता है कि आपकी सैलरी का कितना हिस्सा पहले से ही कर्ज चुकाने में जा रहा है।
FOIR क्या होता है? (What is FOIR)
साधारण शब्दों में समझिए कि अगर आपकी सैलरी का बड़ा हिस्सा EMI, क्रेडिट कार्ड बिल या किसी और लोन की किस्त में जा रहा है, तो आपका FOIR ज्यादा माना जाएगा। अगर आपकी सैलरी का बड़ा हिस्सा पहले से इन खर्चों में जा रहा है, तो बैंक समझ जाता है कि आपकी रीपेमेंट कैपेसिटी यानी चुकाने की क्षमता कम है, और फिर आपका नया लोन रिजेक्ट भी हो सकता है।
कैसे निकालें अपना FOIR? (How to calculate FOIR)
अपनी सारी मंथली फिक्स्ड पेमेंट्स जैसे होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन की EMI, किराया आदि को जोड़िए। फिर इसे अपनी नेट मंथली सैलरी से डिवाइड कीजिए और 100 से गुणा करें। मान लीजिए आपकी हर महीने की कुल आमदनी ₹1,00,000 है और हर महीने तय खर्चे यानी लोन की किस्तें वगैरह ₹25,000 हैं, तो इस स्थिति में FOIR 25% होगा। इसका मतलब ये है कि आपकी महीने की आमदनी का 25% हिस्सा पहले से चल रहे कर्ज चुकाने में जा रहा है। बैंक आमतौर पर चाहते हैं कि यह रेश्यो 50% से नीचे रहे, यानी आपकी आधी सैलरी से ज्यादा EMI में न जाए।
क्यों अहम है FOIR?
बैंक के लिए FOIR एक तरह से फाइनेंशियल हेल्थ रिपोर्ट होती है। अगर आपका FOIR कम है, तो इसका मतलब है कि आपके पास EMI के बाद भी खर्च चलाने को पर्याप्त पैसा बचता है यानी आप भरोसेमंद ग्राहक हैं। पर अगर FOIR बहुत ज्यादा है, तो बैंक सोचता है कि आप पहले से ही बहुत लोन में दबे हुए हैं। ऐसे में या तो आपका लोन रिजेक्ट हो जाएगा या फिर ब्याज दर बढ़ा दी जाएगी।
FOIR कम करने के तरीके
अगर आप चाहते हैं कि बैंक आपके लोन को तुरंत पास करे, तो पहले FOIR सुधारना जरूरी है। पुराने लोन या क्रेडिट कार्ड बिल जल्दी क्लियर करें, एक साथ कई लोन लेने से बचें, और जहां हो सके अपनी आमदनी बढ़ाने की कोशिश करें जैसे कोई साइड जॉब या बोनस। एक और तरीका है “लोन कंसोलिडेशन”, यानी पुराने कई हाई-इंटरेस्ट लोन को मिलाकर एक सिंगल लोन बना लेना। इससे EMI घटेगी और FOIR अपने आप बेहतर हो जाएगा।