
Loan Settlement: आजकल घर, गाड़ी या पढ़ाई के लिए लोन लेना तो आम बात है। मुश्किल तब आती है जब अचानक हालात बिगड़ जाएं और EMI भरनी भारी पड़ने लगे जैसे नौकरी चली जाए या कोई मेडिकल इमरजेंसी आ जाए। ऐसे में अगर ईएमआई की तीन किस्तें लगातार मिस हो जाएं, तो बैंक सीधे ग्राहक को डिफॉल्टर मानकर लोन को नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) में डाल देता है।
ऐसे हालात में बैंक वसूली के लिए कई तरीके अपनाता है और कभी-कभी वन टाइम सेटलमेंट (OTS) का ऑफर भी देता है। कई लोग इसे राहत की तरह देखते हैं क्योंकि इसमें एकमुश्त रकम देकर बीच का रास्ता निकल आता है। लेकिन क्या ये वाकई फायदेमंद है, चलिए समझते हैं।
लोन सेटलमेंट एक तरह का समझौता है जिसमें उधारकर्ता और बैंक कम राशि पर फाइनल बात कर लेते हैं। ज्यादातर मामलों में ग्राहक को प्रिंसिपल अमाउंट पूरा देना होता है, लेकिन बैंक इंटरेस्ट, लेट फीस और कई चार्जेज माफ कर देता है। कभी-कभी प्रिंसिपल में भी थोड़ी राहत मिल जाती है।
कई लोग सोचते हैं कि सेटलमेंट के बाद लोन पूरी तरह बंद हो गया। लेकिन ऐसा नहीं है। सेटलमेंट से रिकवरी एजेंसियों से राहत मिलती है, पर इसे लोन क्लोजर नहीं माना जाता। क्लोजर तभी होता है जब आप पूरा लोन और ब्याज चुका दें।
इसलिए मजबूरी न हो तो सेटलमेंट से बचना ही बेहतर है।
सेटलमेंट कभी-कभी जरूरी हो सकता है, लेकिन ये कोई फाइनल समाधान नहीं है। कोशिश करें EMI मिस ही ना हो, और अगर हालात बिगड़ जाएं तो बैंक से बात कर के रिस्ट्रक्चरिंग जैसे और विकल्प पहले देखें।
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