
Orange Economy Explained: भारत की अर्थव्यवस्था अब सिर्फ फैक्ट्रियों, सड़कें और मशीनों तक सीमित नहीं रह गई है। बदलते दौर में आइडिया, क्रिएटिविटी और टैलेंट भी उतनी ही बड़ी आर्थिक ताकत बन चुके हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2026-27 में भारत की क्रिएटिव इंडस्ट्री को देश की सर्विस-लेड ग्रोथ स्ट्रैटेजी के केंद्र में रखा। यह पहली बार है जब सरकार ने इतनी साफ तौर पर ऑरेंज इकोनॉमी यानी क्रिएटिव इकोनॉमी को मुख्यधारा में लाने का संकेत दिया है। चलिए जानते हैं क्या है ये ऑरेंज इकॉनमी और बजट में इस पर इतना जोर क्यों दिया गया है?
सरल शब्दों में कहें तो ऑरेंज इकॉनमी का मतलब है क्रिएटिव इकोनॉमी है जहां असली प्रोडक्ट कोई भौतिक चीज नहीं बल्कि एक आइडिया होता है। इसमें संस्कृति, क्रिएटिविटी, टेक्नोलॉजी और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी मिलकर आर्थिक और सामाजिक वैल्यू बनाते हैं। फिल्में, म्यूजिक, गेमिंग, फैशन, डिजाइन, एनिमेशन, डिजिटल कंटेंट, विज्ञापन, पब्लिशिंग और ऐसे प्लेटफॉर्म जो क्रिएटर्स को काम करने का मौका देते हैं, ये सब इसी इकोनॉमी का हिस्सा हैं। यह मैन्युफैक्चरिंग जैसी पारंपरिक अर्थव्यवस्था से अलग है।
यह शब्द सबसे पहले कोलंबिया के पूर्व राष्ट्रपति इवान ड्यूक मार्केज और संस्कृति मंत्री फेलिपे बुइत्रागो ने दिया था। उन्होंने 2013 में अपनी किताब The Orange Economy: An Infinite Opportunity में इस कॉन्सेप्ट को विस्तार से समझाया। बात करें संतरे रंग यानी ऑरेंज रंग चुनने की तो ये रंग दुनियाभर में रचनात्मकता, संस्कृति और बदलाव का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि इस इकोनॉमी के लिए यह रंग चुना गया, एक ऐसा सेक्टर जो कल्पना और इनोवेशन से चलता है, न कि मशीनों से।
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 के मुताबिक, क्रिएटिव सेक्टर भारत में रोजगार, शहरी सेवाओं और टूरिज्म का बड़ा इंजन बन सकता है। वैश्विक स्तर पर यूनाइटेड नेशंस कांफ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट (UNCTAD) के अनुमान बताते हैं कि कई देशों में क्रिएटिव इंडस्ट्री GDP का 0.5% से लेकर 7% से ज्यादा योगदान देती है। भारत के पास युवा आबादी, डिजिटल प्लेटफॉर्म, बढ़ती इनकम और बड़ा ऑडियंस पहले से मौजूद है। असली कमी रही है स्किलिंग और औपचारिक रास्ते, जिससे क्रिएटिव टैलेंट को स्थिर नौकरियों और बिजनेस में बदला जा सके।
बजट भाषण में वित्त मंत्री सीतारमण ने कहा कि भारत का AVGC सेक्टर (Animation, Visual Effects, Gaming, Comics) तेजी से बढ़ रहा है और 2030 तक 20 लाख प्रोफेशनल्स की जरूरत होगी। इसी लक्ष्य के तहत मुंबई के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजीज के सहयोग से 15,000 स्कूलों और 500 कॉलेजों में AVGC कंटेंट क्रिएटर लैब्स बनाने का प्रस्ताव रखा गया। यह दिखाता है कि सरकार क्रिएटिव काम को अब मुख्य आर्थिक इंफ्रास्ट्रक्चर मान रही है।
AVGC वह क्षेत्र है जहां टेक्नोलॉजी और क्रिएटिविटी सीधे तौर पर एक-दूसरे से जुड़ती हैं। फिल्मों और OTT से लेकर गेमिंग, एडवरटाइजिंग और एजुकेशन तक, हर जगह इसकी मांग है। भारत में टैलेंट की कोई कमी नहीं है, लेकिन ट्रेन्ड प्रोफेशनल्स की जरूरत हमेशा महसूस की गई है। कंटेंट क्रिएटर लैब्स इस कमी को दूर करेंगे और छात्रों को इंडस्ट्री-रेडी बनाएंगे।
स्कूल और कॉलेज स्तर पर लैब्स बनने से क्रिएटिव टूल्स सिर्फ बड़े शहरों या महंगे इंस्टीट्यूट्स तक सीमित नहीं रहेंगे। छात्रों को शुरुआती दौर में ही इंडस्ट्री-रेडी स्किल्स मिलेंगी और क्रिएटिव करियर को एक फॉर्मल पहचान मिलेगी।
बजट 2026 में ऑरेंज इकोनॉमी पर फोकस यह दिखाता है कि भारत अब सिर्फ फैक्ट्रियों और मैन्युफैक्चरिंग से नहीं, बल्कि आइडिया और क्रिएटिविटी से भी ग्रोथ करने की तैयारी में है। अगर स्किलिंग और ट्रेनिंग सही तरीके से लागू हुई, तो आने वाले सालों में भारत की क्रिएटिव इंडस्ट्री वैश्विक स्तर पर नई पहचान बना सकती है। साफ है, ऑरेंज इकॉनमी अब शौक नहीं, भारत की नई जॉब मशीन बनने की दिशा में बढ़ती दिख रही है।
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