
नई दिल्ली: केंद्र सरकार अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) प्रणाली में बड़ा बदलाव करने पर विचार कर रही है ताकि उपभोक्ताओं को वस्तुओं की कीमतों को लेकर अधिक पारदर्शिता और समझ मिले। उपभोक्ता मामलों का विभाग 16 मई को उद्योग संगठनों, उपभोक्ता समूहों और कर अधिकारियों के साथ बैठक करके सुझाव मांगे।
फिलहाल खुदरा दुकानों को पैक पर छपे अधिकतम मूल्य तक की कोई भी कीमत वसूलने की आजादी है, और कंपनियों को यह नहीं बताना होता कि उन्होंने उस कीमत की गणना कैसे की। सरकार अब सोच रही है कि MRP को उत्पाद के निर्माण और मार्केटिंग लागत से जोड़ने के लिए कोई दिशा-निर्देश तय किए जाएं, खास तौर पर रोज़मर्रा के इस्तेमाल वाले सामान और जरूरी वस्तुओं के लिए। हालांकि ये योजना अभी शुरुआती चरण में है, और अगली बैठक की तारीख तय नहीं हुई है।
कानूनी मापविज्ञान अधिनियम, 2009 के तहत, उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय पैकेज्ड सामानों पर वजन, माप और लेबल की जांच करता है ताकि पारदर्शिता और उपभोक्ता हितों की रक्षा हो। लेकिन ये अधिनियम कीमत तय करने का कोई तरीका नहीं बताता। एक सूत्र ने कहा कि सभी पक्षों से बातचीत के बाद लागत का मानक तय किया जाएगा। उद्योग और उपभोक्ता समूहों से सुझाव मांगे गए हैं ताकि MRP को भ्रामक न बनाया जाए। यह नियम ज्यादातर उपभोक्ता सामानों पर लागू होगा।
16 मई को हुई एक बैठक में उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने अनुचित कीमतों पर चर्चा की। उद्योग और उपभोक्ता समूहों से कीमतों को उपभोक्ता-अनुकूल और मौजूदा कर प्रणाली के हिसाब से बनाने के सुझाव देने को कहा गया। वहीं कुछ उद्योग प्रतिनिधियों ने चिंता भी जताई है कि अगर कीमत लागत से जोड़ दी गई, तो कुछ उत्पाद बाजार से हट सकते हैं जिससे उपभोक्ताओं को नुकसान होगा। वहीं उपभोक्ता संगठन चाहते हैं कि बिना सीधे कीमत पर नियंत्रण लगाए, सरकार भ्रामक छूट और अनुचित मुनाफे जैसी प्रथाओं पर लगाम लगाए।
ज्यादातर विकसित देशों में MRP जैसी कोई व्यवस्था नहीं है, और बाजार की ताकतें कीमत तय करती हैं। भारत में MRP बताना जरूरी है, लेकिन कीमत निर्माता तय करते हैं। जरूरी सामानों को छोड़कर, सरकार आमतौर पर कीमतों को नियंत्रित नहीं करती। उदाहरण के लिए,अगर किसी सामान का MRP ₹5,000 है,लेकिन वह 50% छूट के बाद ₹2,500 में बिकता है, तो सवाल उठता है कि इतना ज्यादा MRP क्यों छापा गया? अगर दुकानदार ₹2,500 में मुनाफा कमा रहा है,तो क्या MRP बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया था? क्या ये छूट सिर्फ ग्राहकों को लुभाने की चाल थी?
ये प्रस्ताव कीमतों को नियंत्रित करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से लाया जा रहा है। उद्देश्य है कि MRP एक उचित लागत और सीमित मुनाफे के आधार पर तय की जाए। अगर यह बदलाव लागू होता है,तो ये भारत के खुदरा मूल्य निर्धारण की प्रणाली को काफी हद तक बदल सकता है।
MRP नियमों में बदलाव के लिए वित्त मंत्रालय के साथ तालमेल जरूरी होगा, क्योंकि GST लेनदेन मूल्य पर लगता है, जो हमेशा MRP नहीं होता। कंज्यूमर वॉयस के सीईओ अशिम सान्याल ने कहा कि GST लागू होने के बाद कंपनियों को MRP समझाने की जरूरत नहीं पड़ती, जब तक कि केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण हस्तक्षेप न करे। पहले, MRP पर ही कर लगता था, जिससे कंपनियां कीमतें बढ़ाने में सावधानी बरतती थीं। अब निर्माताओं को ज्यादा आजादी है, जिससे उपभोक्ता मनमाने MRP के अधीन हैं। हालांकि, GST को MRP से जोड़ना जटिल हो सकता है। बेक्सले एडवाइजर्स के उत्कर्ष सिन्हा ने कहा कि इससे मूल्य निर्धारण की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और कंपनियों पर अनुपालन का बोझ बढ़ सकता है।
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