
Investment for Child Education: आजकल बच्चों को बड़े शहरों में पढ़ाना घर के सबसे बड़े खर्चों में से एक हो गया है। स्कूल की ट्यूशन फीस तो सिर्फ एक हिस्सा है, इसके अलावा कोचिंग, बस का किराया, यूनिफॉर्म और स्कूल की अन्य एक्टिविटीज का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है।
पढ़ाई की लागत सामान्य महंगाई के मुकाबले बहुत तेजी से ऊपर जा रही है। ऐसे में अब पैरेंट्स को शिक्षा को एक लंबी अवधि की जिम्मेदारी मानकर चलना होगा। भविष्य में होने वाली फीस बढ़ोतरी से बचने के लिए अभी से एक मजबूत वित्तीय योजना बनाना बेहद जरूरी है।
शहरों के प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा की महंगाई दर अक्सर 8% से 12% के बीच रहती है, जो सामान्य महंगाई से कहीं ज्यादा है। पिछले 10 सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो निजी स्कूलों की फीस में करीब 150% से 170% तक का इजाफा हुआ है।
इसका मतलब है कि हर 6-7 साल में पढ़ाई का खर्च दोगुना हो रहा है। ट्यूशन फीस के अलावा ट्रांसपोर्ट, किताबें और डिजिटल गैजेट्स जैसे खर्च भी हर साल 5% से 10% तक बढ़ जाते हैं, जिससे माता-पिता की जेब पर भारी बोझ पड़ता है।
पैरेंट्स को स्कूल चुनते समय अपनी असल वित्तीय क्षमता को पहचानना चाहिए। एक बुनियादी नियम के तौर पर बच्चे की स्कूलिंग और उससे जुड़े सभी खर्च आपकी कुल घरेलू आय के 10% से 15% से ज्यादा नहीं होने चाहिए। अगर यह खर्च इससे ज्यादा होता है, तो आपकी रिटायरमेंट सेविंग्स और इमरजेंसी फंड पर बुरा असर पड़ सकता है।
महंगा स्कूल चुनने के बजाय ऐसा स्कूल चुनें जहां बच्चे की जरूरतें पूरी हों और आपको अलग से ट्यूशन पर पैसा न खर्च करना पड़े। साथ ही, स्कूल के पास रहने से आप बस के किराए और बच्चे के समय, दोनों की बचत कर सकते हैं।
स्कूल की फीस को मैनेज करने के लिए आप तीन चरणों वाली योजना अपना सकते हैं...
पहला चरण (जन्म से 6 साल): इस दौरान प्री-स्कूल का खर्च आमतौर पर नियमित आय से ही निकल जाता है, इसके लिए अलग फंड की जरूरत नहीं होती।
दूसरा चरण (6 से 16 साल): इस दौरान कम से कम 3 साल की फीस का एक 'बफर फंड' तैयार रखें। उदाहरण के लिए, अगर सालाना फीस 3 लाख रुपये है, तो 9 लाख रुपये का फंड बनाएं। इस पैसे को एग्रेसिव हाइब्रिड फंड्स में निवेश करें। हर साल की शुरुआत में एक साल की फीस निकालें और बाकी बचे पैसे को निवेशित रहने दें। इस फंड को हर महीने एसआईपी या बोनस के जरिए दोबारा भरते रहें।
तीसरा चरण (16 से 18 साल): जब बच्चा 16 साल का हो जाए, तो इस फंड में नया निवेश बंद कर दें और धीरे-धीरे पूरे पैसे का इस्तेमाल स्कूलिंग खत्म होने तक कर लें।
सिस्टमैटिक विदड्रॉल प्लान (SWP) के जरिए आप एकमुश्त निवेश या एसआईपी से बना हुआ फंड धीरे-धीरे निकाल सकते हैं। आप आज के खर्च को आधार मानकर अगले 10-15 सालों के लिए 8% से 10% की महंगाई दर जोड़कर एक टारगेट पोर्टफोलियो बनाएं।
SWP की मदद से आप हर साल फीस के लिए एक तय रकम निकाल पाएंगे, जबकि आपका बाकी पैसा मार्केट में बढ़ता रहेगा। इससे आप सिर्फ मुनाफे वाले हिस्से का इस्तेमाल कर पाएंगे और आपकी असल पूंजी सुरक्षित रहेगी।
शिक्षा के लिए सही फंड बनाने के लिए हमें '15-10-8-12' का एक सरल फॉर्मूला अपनाना चाहिए। यह फॉर्मूला महंगाई और कंपाउंडिंग (ब्याज पर ब्याज) को ध्यान में रखकर बनाया गया है। मान लें कि आपके बच्चे की उम्र अभी 5 वर्ष है और आप 15 साल की उम्र यानी 10 साल बाद तक एक बड़ा कॉर्पस बनाना चाहते हैं, तो गणना कुछ इस तरह होगी।
ऊपर दी गई गणना केवल एक साल की फीस की है। अगर आप चाहते हैं कि बच्चे की पूरी स्कूलिंग और कॉलेज लाइफ सिक्यॉर्ड रहे, तो आपको नीचे दी गई रणनीति अपनानी चाहिए।
कुल लक्ष्य तय करें: अगर आज 10 लाख रुपये में जो पढ़ाई हो रही है, वह 10 साल बाद 10% महंगाई के साथ करीब 26 लाख रुपये की हो जाएगी।
मासिक निवेश: 26 लाख रुपये का फंड 10 साल में तैयार करने के लिए आपको करीब 11,500 रुपये की मासिक SIP करनी होगी। यह आकलन निवेश पर 12% सालाना रिटर्न मिलने के अनुमान पर आधारित है।
स्टेप-अप SIP: अगर आप 11,500 रुपये से शुरू नहीं कर सकते, तो हर साल अपनी एसआईपी की रकम को 10% बढ़ाएं। इससे आप छोटी रकम से शुरू करके भी बड़े लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं।
हाइब्रिड फंड्स: अगर आप कम रिस्क लेना चाहते हैं, तो इनमें 65-80% पैसा इक्विटी में होता है, जो स्कूल फीस जैसे लक्ष्यों के लिए स्थिर रिटर्न देते हैं।
इंडेक्स फंड्स: 10 साल से ज्यादा की अवधि के लिए निफ्टी 50 इंडेक्स फंड एक सुरक्षित और बेहतर विकल्प हो सकता है।
शिक्षा के लिए निवेश करते समय अनुशासन बहुत जरूरी है। स्मॉल कैप्स जैसे ज्यादा रिस्क वाले फंड्स में बहुत ज्यादा पैसा न लगाएं। जैसे-जैसे बच्चे की पढ़ाई का लक्ष्य करीब आए, पैसे को धीरे-धीरे सुरक्षित डेट फंड्स में ट्रांसफर कर देना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घर के कमाने वाले सदस्य के नाम पर एक 'टर्म इंश्योरेंस प्लान' जरूर लें। यह सुनिश्चित करता है कि अगर अभिभावक के साथ कोई अनहोनी हो जाए, तब भी बच्चे की पढ़ाई का फंड सुरक्षित रहे और उसकी शिक्षा न रुके।
Disclaimer: यह लेख केवल जानकारी के लिए है। निवेश करने से पहले किसी प्रमाणित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। मिंट हिंदी आपके किसी भी निर्णय और उसके परिणाम के लिए तनिक भी उत्तरदायी नहीं है।
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