जीरो फॉरेक्स कार्ड खरीदने पर भी भारतीयों की कट रही है जेब, जानिए क्यों

भारतीय यात्री 'ज़ीरो फॉरेक्स' कार्ड पर कुछ ज्यादा ही भरोसा करते हैं। ऐसे में विदेश जाने पर ज्यादा पैसे खर्च हो जाते हैं। असली लागत दिखने वाली फीस में नहीं होती, बल्कि बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए एक्सचेंज रेट और कन्वर्ज़न जैसे कई चार्ज छिपे होते हैं। इन चीजों पर यात्रियों का ध्यान बहुत कम जाता है।

एडिटेड बाय Jitendra Singh
अपडेटेड6 Feb 2026, 09:41 PM IST
बाजार में जीरो फॉरेक्स कार्ड का चलन तेजी से बढ़ा है।
बाजार में जीरो फॉरेक्स कार्ड का चलन तेजी से बढ़ा है।(Livemint)

इस साल की शुरुआत में मैं दुबई में था। मैं एक दोस्त के साथ ट्रैवल कर रहा था जिसने अपने दुबई ट्रिप से ठीक पहले एक "ज़ीरो फॉरेक्स" ट्रैवल कार्ड लिया था। उसका मानना था कि कम से कम विदेश में उसके साथ धोखा नहीं होगा।

एक दोपहर,उसने जल्दी से लंच के लिए AED 120 (दुबई में चलने वाली करेंसी का भुगतान किया। उसे तुरंत 2,910 कटने का SMS आया । वह थोड़ा परेशान हुआ। उस दिन मिड-मार्केट रेट के हिसाब से यह भुगातान 2,815 के करीब होना चाहिए था। कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन उसे थोड़ा ठगा हुआ महसूस करने के लिए काफी था।

मजे की बात यह है कि उसने सब कुछ सही किया था। उसने एयरपोर्ट के मनी चेंजर से पैसे नहीं बदलवाए,बिना किसी फॉरेन ट्रांजैक्शन फीस वाला कार्ड चुना,उसे पहले से लोड किया और तो और चार्ज की लिस्ट भी क्रॉस-चेक की। फिर भी उसे चुपचाप बिना दिखे और ऐसे तरीकों से नुकसान हुआ जिनके बारे में ज़्यादातर भारतीयों को पता भी नहीं चलता।

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ताजे आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय लोग खूब ट्रैवल कर रहे हैं और बिना ध्यान दिए विदेश में छोटी-छोटी रकम खर्च कर रहे हैं। RBI के डेटा से पता चलता है कि विदेश यात्रा पर खर्च 17 अरब डॉलर तक पहुंच गया है और हर साल बढ़ रहा है। अब भारत से तमाम परिवार बार-बार दुबई, बैंकॉक, लंदन और सिंगापुर जाते हैं। लेकिन जहां भारतीयों की ट्रैवल की आदतें बदल गई हैं,वहीं क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट की कीमत तय करने का तरीका उसके साथ तालमेल नहीं बिठा पाया है।

ज़्यादातर यात्री मानते हैं कि विलेन दिखने वाली चीज "फीस" है। लेकिन ऐसा नहीं है। सही बात ये है कि फ्री लंच जैसी कोई चीज नहीं हैं। सच बहुत आसान है। ध्यान रखें कि ज़ीरो-कॉस्ट कार्ड जैसी कोई चीज़ नहीं होती। हर इंटरनेशनल ट्रांज़ैक्शन के दो हिस्से होते हैं।

पहला है अपफ्रंट फीस। यह वह हिस्सा है जिसे प्रोवाइडर्स चाहते हैं कि आप नोटिस करें। दूसरा हिस्सा है एक्सचेंज रेट। यह वह हिस्सा है जिसके बारे में वे उम्मीद करते हैं कि आप इसे चेक नहीं करेंगे।

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जब आप किसी करेंसी पेयर को गूगल करते हैं तो आपको मिड-मार्केट एक्सचेंज रेट दिखता है। जो ग्लोबल बाजार में खरीदने और बेचने की कीमतों के बीच का मिडपॉइंट होता है। यह सबसे सही बेंचमार्क है। लेकिन ज़्यादातर “ज़ीरो फॉरेक्स” कार्ड इस रेट का इस्तेमाल नहीं करते। इसके बजाय, वे एक्सचेंज-रेट में थोड़ी हेराफेरी करके रेवेन्यू कमाते हैं। यहीं आपके साथ खेल हो जाता है।

इसको ऐसे समझें अगर मिड-मार्केट AED–INR रेट 23.50 है और आपका प्रोवाइडर आपको 23.85 देता है तो वह 35 पैसे का गैप ही असली फीस है। यह कहीं लिखा नहीं होता,पहले से बताया नहीं जाता और इसका विज्ञापन भी नहीं किया जाता।

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आपको सिर्फ़ फाइनल रुपये का डिडक्शन दिखता है। यह वास्तविक रेट के काफी करीब लगता है। ऐसे में ज़्यादातर ट्रैवलर्स साइड-बाय-साइड तुलना नहीं करते। इसी तरह लोग सबसे सस्ता ऑप्शन चुनने का भरोसा करके ज़्यादा पैसे दे देते हैं।

डायनामिक करेंसी कन्वर्ज़न (DCC) में होता है सबसे बड़ा नुकसान

अगर पर्सनल फाइनेंस का कोई एक नियम है जो विदेश में किसी भी बजटिंग हैक से ज़्यादा पैसे बचाता है तो वह यह है कि जब कोई मशीन पूछे कि क्या आप INR में पेमेंट करना चाहेंगे? तो आपका जवाब हमेशा 'नहीं' होना चाहिए। ध्यान रखें कि INR में पेमेंट करने से DCC ट्रिगर होता है। इससे मर्चेंट (आपका बैंक या कार्ड जारी करने वाला नहीं) एक्सचेंज रेट तय करता है। ऐसे में मर्चेंट DCC लागू कर देता है। DCC मार्जिन आमतौर पर 4% से 10% तक होता है।

यहां तक ​​कि फाइनेंस की समझ रखने वाले ट्रैवलर्स भी इसके झांसे में आ जाते हैं क्योंकि स्क्रीन पर INR पारदर्शी लगता है। लेकिन ऐसा नहीं है। यह एक मनोवैज्ञानिक भरोसे का जाल है। ऐसे में इस मार्जिन से बचने के लिए हमेशा उस देश की लोकल करेंसी में पेमेंट करें जिसमें आप हैं।

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क्या चेक करें ?

वास्तव में कोई भी इंटरनेशनल पेमेंट बिल्कुल फ्री नहीं होता। अगर आप ज़ीरो फॉरेक्स कार्ड इस्तेमाल करते हैं, तो तीन चीज़ें देखें। पहला, एक्सचेंज रेट मिड-मार्केट रेट के कितना करीब है, क्या यह वही रेट है जो आप Google पर देखते हैं? दूसरा, ये देखें कि साफ दिखने वाले और छिपे हुए चार्ज क्या हैं? इनएक्टिविटी फीस, लोडिंग और अनलोडिंग फीस, फॉरेन ट्रांजैक्शन फीस, ATM विड्रॉल फीस ये सब जुड़ जाते हैं। तीसराी, बात ये है कि क्या आप DCC को समझते हैं और जानते हैं कि इससे कैसे बचना है?

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ज़ीरो फॉरेक्स के बजाय ट्रांसपेरेंट फॉरेक्स पर ज्यादा फोकस करें। पारदर्शिता ज्यादा ज़रूरी है। भारत दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते ट्रैवल मार्केट में से एक है। जैसे-जैसे हमारा ग्लोबल फुटप्रिंट बढ़ रहा है, पारदर्शी कीमत कोई लग्ज़री फीचर नहीं होना चाहिए । इसे एक स्टैंडर्ड होना चाहिए।

जब तक इंडस्ट्री उस दिशा में नहीं बढ़ती, तब तक जागरूकता ही यात्री की सबसे बड़ी ताकत है। अपना कार्ड टैप करने से पहले मिड-मार्केट रेट को चेक करना एक हफ़्ते की छुट्टी में आपकी उम्मीद से ज़्यादा पैसे बचा सकता है।

लेखक - तनेजा भरद्वाज, ग्लोबल फिनटेक फर्म Wise की साउथ एशिया एक्सपैंशन लीड

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