किसी एक धर्म को 'एकमात्र सच्चा' कहना गलत… हाई कोर्ट ने कहा- ईसाई पादरी पर चलेगा मुकदमा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और किसी धर्म को 'एकमात्र सच्चा' बताना दूसरे धर्मों का अपमान है। कोर्ट ने पादरी विनीत विंसेंट के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रोकने से इनकार किया।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड27 Mar 2026, 08:33 AM IST
इसाई पादरी विनीत विंसेंट के दावे पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जताई आपत्ति, याचिका खारिज
इसाई पादरी विनीत विंसेंट के दावे पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जताई आपत्ति, याचिका खारिज

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में सभी धर्मों के लोग साथ रहते हैं, इसलिए यह दावा करना गलत है कि केवल एक ही धर्म 'सच्चा' है। यह फैसला अभिव्यक्ति की आजादी और धार्मिक सम्मान की सीमाओं को समझने के लिहाज से बहुत जरूरी है।

क्या है पूरा मामला?

रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा (उर्फ फादर विनीत विंसेंट परेश) ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। उन्होंने मऊ जिले के मुहम्मदाबाद थाने में अपने खिलाफ दर्ज केस, चार्जशीट और कोर्ट के संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती दी थी। विनीत विंसेंट पर IPC की धारा 295-A के तहत धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने का आरोप है।

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा, 'प्राथमिक (FIR) के बयानों से पता चलता है कि आवेदक अपनी प्रार्थना सभाओं में बार-बार कहता है कि केवल ईसाई धर्म ही एकमात्र धर्म है।' कोर्ट ने आगे कहा कि भारत एक ऐसा देश है जहां संविधान के अनुसार सभी आस्थाओं के लोग साथ रहते हैं। जस्टिस श्रीवास्तव के अनुसार, 'किसी भी धर्म के लिए यह दावा करना गलत है कि वही एकमात्र सच्चा धर्म है, क्योंकि इसका मतलब दूसरे धर्मों को नीचा दिखाना होता है।'

FIR में दिए गए बयानों में यह जिक्र है कि याचिकाकर्ता अपनी प्रार्थना सभा में अक्सर कहा करता है कि केवल ईसाई धर्म ही धर्म है। ऐसा करके वह एक खास धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। जबकि भारत एक ऐसा देश है जहां भारत के संविधान में परिभाषित एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के तौर पर सभी धर्मों और मान्यताओं को मानने वाले लोग एक साथ रहते हैं। इसलिए, किसी भी धर्म का यह दावा करना गलत है कि वही एकमात्र सच्चा धर्म है, क्योंकि इसका मतलब अन्य धर्मों का अपमान करना होता है।- इलाहाबाद हाई कोर्ट

पादरी के वकील की दलीलें

पादरी के वकील गौरव त्रिपाठी ने कोर्ट में तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को केवल परेशान करने के लिए झूठा फंसाया गया है। उन्होंने दलील दी कि उनके मुवक्किल पर अवैध धर्म परिवर्तन कराने की बात जांच में सामने नहीं आई। वकील ने यह भी कहा कि सिर्फ दूसरे धर्म की आलोचना करने से धारा 295-A का अपराध नहीं बनता और पुलिस ने बिना दिमाग लगाए चार्जशीट दाखिल कर दी है।

कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?

सरकारी वकील (AGA) ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इस स्तर पर केवल यह देखा जाना चाहिए कि क्या पहली नजर में (prima facie) कोई मामला बनता है या नहीं। हाई कोर्ट ने इस बात से सहमति जताई और कहा कि IPC की धारा 295-A जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से धार्मिक भावनाओं को अपमानित करने की बात करती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल के इस चरण में वह सबूतों की गहराई में जाकर 'मिनी ट्रायल' नहीं कर सकता। इन्ही आधारों पर कोर्ट ने पादरी की याचिका को खारिज कर दिया।

Allahabad HC order in Rev Fr Vineet Vincent Pereira Alias Father Vineet Vinicent Paresh vs State of UP and Another Case

धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की सीमा

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 25 और IPC की धारा 295A के बीच के बारीक अंतर को स्पष्ट करता है ।

1. अनुच्छेद 25: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और उसका प्रचार करने की आजादी देता है ।

प्रचार की सीमा: आप अपने धर्म की खूबियां बता सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप दूसरे धर्मों को नीचा दिखाएं ।

संवैधानिक मर्यादा: संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) देश है जहां सभी आस्थाओं के लोग समान सम्मान के साथ रहते हैं ।

लोक व्यवस्था (Public Order): यह अधिकार असीमित नहीं है; इसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर नियंत्रित किया जा सकता है।

विशेषताअनुच्छेद 25 (संविधान)धारा 295A (IPC/कानून)
उद्देश्यनागरिकों को धार्मिक आजादी देना।धार्मिक भावनाओं के अपमान को रोकना।
प्रकृतियह एक 'सकारात्मक' अधिकार है।यह एक 'दंडात्मक' प्रावधान है।
कोर्ट का नजरिया'एकमात्र सच्चा धर्म' कहना दूसरे धर्म का अपमान माना जा सकता है।ऐसा बयान देना धारा 295A के दायरे में आ सकता है।

2. धारा 295A IPC: धार्मिक अपमान पर रोक

यह धारा उन कार्यों को दंडित करती है जो जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए किए जाते हैं।

अपराध की श्रेणी: यदि कोई व्यक्ति बोलकर, लिखकर या संकेतों के माध्यम से किसी धर्म या धार्मिक विश्वास का अपमान करता है, तो उसे 3 साल तक की जेल या जुर्माना हो सकता है।

बदनीयती (Malicious Intention): इस धारा के तहत सजा के लिए यह साबित होना जरूरी है कि व्यक्ति का इरादा जानबूझकर अपमान करना था।

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