थर्ड पार्टी लोन डिफॉल्ट मामले में कर्मचारी की ग्रेच्युटी नहीं रोक सकते, हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला

एक महिला बैंक कर्मचारी ने किसी और के लोन की गारंटर बनी थी। बाद में उस व्यक्ति ने लोन चुकाने में डिफॉल्ट कर दिया। ऐसे में बैंक ने महिला के रिटायर होने के बाद ग्रेच्युटी रोक दी। बैंक ने महिला को जिम्मेदार ठहराया। इसके बाद महिला हाई कोर्ट पहुंच गई। कोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाया है 

Jitendra Singh
अपडेटेड24 Oct 2025, 09:31 PM IST
कोर्ट ने कहा कि गेच्युटी एक रुकी हुई सैलरी है। इसे जब्त नहीं किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि गेच्युटी एक रुकी हुई सैलरी है। इसे जब्त नहीं किया जा सकता है।

प्राइवेट और गवर्नमेंट दोनों सेक्टर में नौकरी करने वाले लोग ग्रेच्युटी के हकदार होते हैं। एक तरह से यह लंबे समय तक काम करने के एवज में एंप्लॉयर की तरफ से एंप्लॉयी को मिलने वाला रिवॉर्ड है। भारत में Payment of Gratuity Act, 1972 के तहत 10 या ज्यादा कर्मचारी वाली कंपनियों में यह जरूरी है। इस बीच ग्रेच्युटी के मामले में ओडिशा हाई कोर्ट ने एक बड़ा आदेश दिया है। ओडिशा हाईकोर्ट ने कटक सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने एक रिटायर्ड कर्मचारी को ग्रेच्युटी देने के आदेश को बरकरार रखा है। यह फैसला बैंक के उस दावे को भी नकारता है, जिसमें कहा गया था कि कर्मचारी ने किसी तीसरे पक्ष के लोन की गारंटी ली थी और वह डिफॉल्ट कर गया था।

चीफ जस्टिस हरीश टंडन और जस्टिस एम एस रमन की डिविजन बेंच ने 8 नवंबर 2024 को आए सिंगल जज के फैसले को सही ठहराया। यह फैसला ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत जॉइंट लेबर कमिश्नर-कम-अपीलेट अथॉरिटी के 2022 के निर्णय के खिलाफ बैंक की दलील को खारिज कर दिया।

जानिए क्या है पूरा मामला

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरोजिनी देई नाम की एक महिला कर्मचारी बैंक में डिप्टी मैनेजर के पद पर थीं। वह 31 जुलाई 2010 को रिटायर हो गईं। उनका सर्विस रिकॉर्ड बिल्कुल साफ था और उन पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई भी नहीं चल रही थी। इसके बावजूद, बैंक ने उनकी ग्रेच्युटी रोक दी थी। बैंक का कहना था कि सरोजिनी ने किसी तीसरे व्यक्ति को दिए गए लोन की गारंटर बनी थीं। वह व्यक्ति लोन चुकाने में डिफॉल्ट कर गया था। इसलिए, बैंक ने सरोजिनी को इस डिफॉल्ट के लिए जिम्मेदार ठहराया और उनकी ग्रेच्युटी देने से मना कर दिया।

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जॉइंट लेबर कमिश्नर, भुवनेश्वर को बैंक के पास उसका ग्रेच्युटी रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं मिला और उन्होंने बैंक को उसे पेमेंट करने का आदेश दिया। फिर बैंक ने लेबर कमिश्नर के खिलाफ अपील की, जिसे बैंक हार गया और मामला ओडिशा हाई कोर्ट चला गया।

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बैंक ने दिए ये तर्क

बैंक के वकील ने कोर्ट में तर्क दिए कि सरोजनी उस व्यक्ति को दिए गए लोन की गारंटर थीं। इसलिए कोई भी डिफॉल्ट या लायबिलिटी उन पर भी आती है। जब तक पूरा लोन नहीं चुका दिया जाता है, तब तक उनकी ग्रेच्युटी नहीं रिलीज की जा सकती है। फिर ओडिशा हार् कोर्ट ने सरोजनी के पक्ष में फैसला सुनाया।

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जानिए ओडिशा हाई कोर्ट ने ग्रेच्युटी के मामले में क्या कहा

ओडिशा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस हरीश टंडन और जस्टिस मुरहारी श्री रमन ने की बेंच ने साफ कहा कि इस तरह के आधार पर नियोक्ता ग्रेच्युटी देने से इनकार नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रेच्युटी को जब्त करने के नियम ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम की धारा 4(6) में बहुत सख्ती से बताए गए हैं। यह केवल कुछ खास परिस्थितियों में ही लागू होता है। जैसे कि, अगर किसी कर्मचारी को उसकी सेवा के दौरान किसी गलत काम या लापरवाही के कारण नुकसान पहुंचाने के आरोप में नौकरी से निकाला जाता है।

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