नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में बनाए गए नए नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। इस याचिका में कहा गया है कि ये नियम जाति आधारित भेदभाव को सही तरह से परिभाषित नहीं करते और सभी वर्गों को समान सुरक्षा नहीं देते।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यूजीसी के नए नियम, जिनका नाम ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026’ है, खासतौर पर नियम 3(सी) गैर-समावेशी है। इसमें केवल आरक्षित वर्गों के छात्रों और शिक्षकों को ही सुरक्षा दी गई है, जबकि सामान्य या गैर-आरक्षित वर्ग के लोगों को इससे बाहर रखा गया है।
विनीत जिंदल द्वारा दाखिल याचिका में बताया गया है कि इन नियमों में जाति आधारित भेदभाव को सिर्फ अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) तक सीमित कर दिया गया है। इससे यह मान लिया गया है कि केवल इन्हीं वर्गों के लोग भेदभाव का शिकार हो सकते हैं।
याचिका में कहा गया है कि सामान्य वर्ग के लोग भी अपनी जाति के कारण भेदभाव या उत्पीड़न का सामना कर सकते हैं, लेकिन यूजीसी के नियम उन्हें कोई सुरक्षा या शिकायत निवारण का अधिकार नहीं देते।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार और अनुच्छेद 15(1) के तहत भेदभाव के खिलाफ अधिकार का उल्लंघन करती है। इसके साथ ही यह अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार के भी खिलाफ है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि नियम 3(सी) को मौजूदा रूप में लागू करने पर रोक लगाई जाए और जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को निष्पक्ष और संविधान के अनुरूप बदला जाए।
इसमें यह भी कहा गया है कि जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव से प्रभावित हर व्यक्ति को सुरक्षा मिलनी चाहिए, चाहे वह किसी भी वर्ग से जुड़ा हो।
इसके अलावा याचिका में केंद्र सरकार और यूजीसी से यह सुनिश्चित करने के लिए अंतरिम आदेश देने की मांग की गई है कि समान अवसर केंद्र और समानता हेल्पलाइन जैसी सुविधाएं सभी के लिए बिना किसी भेदभाव के उपलब्ध कराई जाएं।