तलाक के बाद पत्नी कोर्ट में भी झूठ बोली और इनकम छिपाया, फिर भी पति को देने पड़ेंगे पैसे

 दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी अपनी आय छिपाती है, तो वह खुद के लिए गुजारा भत्ता की हकदार नहीं होगी। हालांकि, 'राइट टू रेजिडेंस' के तहत पति को पत्नी और बच्चे के रहने के लिए किराया देना ही होगा।

Naveen Kumar Pandey
पब्लिश्ड9 Jan 2026, 07:37 PM IST
 गुजारा भत्ता के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का सख्त फैसला (सांकेतिक तस्वीर)
गुजारा भत्ता के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का सख्त फैसला (सांकेतिक तस्वीर)(pexels)

मध्यवर्गीय परिवारों और हिंदी भाषी क्षेत्रों में अक्सर कानूनी जानकारी के अभाव में लोग आय के दस्तावेज छिपाते हैं। वो भूल जाते हैं कि आज के डिजिटल युग में PAN और ITR के जरिए सच सामने आना तय है। दिल्ली हाई कोर्ट में एक ऐसा ही मामला आया जिसमें कोर्ट ने तलाक के बाद महिला को उसके पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार होने का दावा स्वीकार नहीं किया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी को आवास का किराया और बच्चे के पालन-पोषण का खर्च पति से पाने का अधिकार है।

क्या पत्नी की कमाई छिपाने पर मेंटेनेंस बंद हो सकता है?

जी हां, दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ कर दिया कि यदि पति-पत्नी में कोई पक्ष अपनी वास्तविक आय, बैंक बैलेंस या निवेश की जानकारी कोर्ट से छिपाता है, तो वह अंतरिम गुजारा भत्ते का अधिकार खो देता है। इस मामले में पत्नी ने अपनी एमबीए डिग्री और पिछली नौकरियों की जानकारी छिपाई थी। कोर्ट ने माना कि जो व्यक्ति सच छिपाकर 'असहाय' होने का नाटक करता है, कानून उसकी मदद नहीं करेगा।

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'राइट टू रेजिडेंस' क्या है और यह क्यों जरूरी है?

कोर्ट ने एक बहुत ही मानवीय और तकनीकी अंतर स्पष्ट किया है। भले ही पत्नी ने आय छिपाई और वह अपने खर्च के लिए पैसे पाने की हकदार नहीं रही, लेकिन 'डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट' की धारा 19 के तहत उसे और उसके बच्चे को सिर छिपाने के लिए छत देना पति की कानूनी जिम्मेदारी है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी अपने भाई के घर उसकी उदारता पर रह रही है, जो उसे हमेशा के लिए सहारा देने को बाध्य नहीं है। इसलिए, पति को 10,000 रुपये प्रति माह किराए के तौर पर देने का आदेश दिया गया।

बच्चे के हक पर इस फैसले का क्या असर होगा?

भारत के मध्यवर्गीय समाज में अक्सर माता-पिता की लड़ाई में बच्चों का भविष्य पिस जाता है। कोर्ट ने यहां चाइल्ड मेंटनेंस को पूरी तरह सुरक्षित रखा है। पति को 15,000 रुपये प्रति माह बच्चे के खर्च के लिए और रहने के लिए अलग से किराया देना होगा। कोर्ट का संदेश साफ है- माता-पिता के बीच के विवाद या गलत बयानी का असर बच्चे के बुनियादी अधिकारों पर नहीं पड़ना चाहिए।

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ITR और बैंक स्टेटमेंट से कैसे पकड़ में आती है सच्चाई?

अब वह दौर नहीं रहा जब आप कह दें कि 'मैं बेरोजगार हूं' और कोर्ट मान लेगा। इस केस में पत्नी ने दावा किया था कि वह बेरोजगार है, लेकिन उसके पुराने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) ने 3 लाख रुपये से अधिक की कमाई और रेंटल इनकम का खुलासा कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट किया कि PAN डिटेल्स के जरिए कोई भी वित्तीय रिकॉर्ड निकाला जा सकता है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में बैंक क्रेडिट और निवेश को छिपाना नामुमकिन है।

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आपके लिए इस फैसले के मायने

यदि आप किसी वैवाहिक विवाद से गुजर रहे हैं, तो यह फैसला ईमानदारी की अहमियत समझाता है।

पारदर्शिता रखें: अपनी आय के सभी स्रोतों वेतन, किराये, ब्याज आदि की सही-सही जानकारी दें।

बच्चे की जिम्मेदारी: रहने और खाने का खर्च तकनीकी आधार पर टाला नहीं जा सकता।

कानूनी बचाव: 'निवास का अधिकार' और 'गुजारा भत्ता' दो अलग चीजें हैं; एक खोने का मतलब यह नहीं कि दूसरा भी खत्म हो गया।

यह फैसला उन हजारों पतियों और पत्नियों के लिए नजीर है जो वैवाहिक विवादों में वित्तीय पारदर्शिता नहीं रखते।

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