दिल्ली में आवारा कुत्तों और अन्य पशुओं की समस्या कोई नई नहीं है। आज जिस तरह इस मुद्दे पर बहस हो रही है, वैसी ही दुविधा आज़ादी से पहले ब्रिटिश शासन के दौरान भी थी। उस समय भी अधिकारी यह सोचते थे कि इन जानवरों से निपटने का सबसे “मानवीय तरीका” क्या हो सकता है।
हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताई कि संस्थागत इलाकों में कुत्तों के काटने की घटनाएं बहुत बढ़ गई हैं। अदालत ने निर्देश दिया कि आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण के बाद उन्हें निर्धारित आश्रयों में रखा जाए।
कोर्ट ने यह कदम जनता की सुरक्षा और जानवरों के प्रति करुणा, दोनों को ध्यान में रखते हुए उठाया है। दिल्ली के अभिलेखागार में मौजूद 1946-47 के सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि उस दौर में भी आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने के “मानवीय तरीकों” पर चर्चा होती थी।
11 अप्रैल 1946 को दिल्ली के मुख्य आयुक्त ने एक पत्र में कहा था कि कुत्तों को मारने के लिए स्ट्राइकिनिन ज़हर का इस्तेमाल “अमानवीय” है, क्योंकि इससे जानवरों को मरने से पहले लगभग 20 मिनट तक दर्द झेलना पड़ता है। उन्होंने सुझाव दिया कि क्लोरोफॉर्म या बिजली का झटका देने जैसा तरीका अपनाया जाए, जिससे जानवरों को कम से कम दर्द हो।
29 अप्रैल 1946 को उपायुक्त ने सिविल पशु चिकित्सालय का निरीक्षण किया और रिपोर्ट दी कि बिजली के झटके से जानवरों की तुरंत मौत हो जाती है, इसलिए यह सबसे “प्रभावी और मानवीय तरीका” है। उस समय अस्पताल हाइड्रोसायनिक एसिड का भी इस्तेमाल करता था, जिससे जानवर कुछ ही मिनटों में बहुत कम पीड़ा के साथ मर जाते थे।
मुख्य आयुक्त ने सूअरों को मारने के तरीकों पर भी नाराज़गी जताई थी। उन्होंने लिखा कि सूअरों के दिल या गर्दन में छुरा घोंपा जाता है, जिससे वे “दर्द से चिल्लाते हैं।” उन्होंने आदेश दिया कि उनके लिए भी कोई और अधिक करुणापूर्ण तरीका अपनाया जाए। मई 1946 में दिल्ली के स्वास्थ्य अधिकारी बंबई (अब मुंबई) और मद्रास (अब चेन्नई) गए ताकि यह जान सकें कि वहां आवारा जानवरों से कैसे निपटा जाता है।
उनकी रिपोर्ट में भी कहा गया कि बिजली का झटका देना सबसे मानवीय विकल्प है। मार्च 1947 तक, दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड में बताया गया कि 648 आवारा कुत्तों को मारा गया, जिनमें से अकेले खेड़ा खुर्द गांव में 105 कुत्ते शामिल थे।