
Harish Rana Euthanasia Case: हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने एक बार फिर इच्छामृत्यु (Euthanasia) जैसे संवेदनशील और भावनात्मक विषय को सार्वजनिक चर्चा में ला दिया है। अदालत ने गाज़ियाबाद के रहने वाले हरीश राणा के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दी है, जो गंभीर सिर की चोट के बाद लगभग 13 वर्षों से बेहोशी की हालत में हैं।
अदालत ने कहा कि राणा को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के पेलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती किया जाएगा, जहां उनकी जान को बनाए रखने वाली चिकित्सा को धीरे-धीरे बंद किया जाएगा। न्यायाधीशों ने यह भी जोर दिया कि पूरी प्रक्रिया सम्मान और गरिमा के साथ पूरी की जानी चाहिए। इस मामले के बाद कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर इच्छामृत्यु क्या होती है और निष्क्रिय तथा सक्रिय इच्छामृत्यु में क्या अंतर है।
इच्छामृत्यु का मतलब है किसी व्यक्ति की जान जानबूझकर इस उद्देश्य से समाप्त करना कि उसे गंभीर बीमारी या असाध्य चिकित्सा स्थिति के कारण हो रहे लंबे दर्द और पीड़ा से राहत मिल सके। “Euthanasia” शब्द ग्रीक भाषा के शब्द से आया है जिसका अर्थ है “अच्छी मृत्यु”।
चिकित्सा और कानूनी चर्चाओं में इच्छामृत्यु आमतौर पर उन मरीजों के संदर्भ में इस्तेमाल होती है जो अंतिम अवस्था की बीमारी से जूझ रहे हों, स्थायी रूप से बेहोश हों, या ऐसी असहनीय पीड़ा में हों जहां ठीक होने की कोई संभावना न हो। दुनिया भर में इच्छामृत्यु से जुड़े कानून अलग-अलग हैं। कुछ देशों में सख्त शर्तों के साथ सहायक मृत्यु (assisted dying) की अनुमति है, जबकि कई देशों में इसे पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु का मतलब है कि उस व्यक्ति को वह इलाज नहीं दिया जाता जो उसे जीवित बनाए रख रहा हो। इसमें वेंटिलेटर जैसे जीवनरक्षक उपकरणों को हटाना या ऐसी दवाइयों को बंद करना शामिल हो सकता है जो कृत्रिम रूप से जीवन को लंबा कर रही हों।
इसमें डॉक्टर सीधे जीवन समाप्त नहीं करते, बल्कि बीमारी को अपने प्राकृतिक तरीके से आगे बढ़ने दिया जाता है। भारत में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय किए गए कड़े दिशा-निर्देशों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति है। हरीश राणा के मामले में, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टर जीवन बनाए रखने वाले उपचार को धीरे-धीरे बंद करेंगे और साथ ही मरीज को आराम देने के लिए पेलिएटिव केयर दी जाएगी।
सक्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी व्यक्ति की मृत्यु जानबूझकर सीधे किसी कार्रवाई के जरिए कराना, जैसे घातक इंजेक्शन देना। इसमें मृत्यु बीमारी के प्राकृतिक क्रम से नहीं बल्कि सीधे चिकित्सकीय कार्रवाई से होती है। भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु गैरकानूनी है और इसे आपराधिक अपराध माना जाता है। हालांकि कुछ देशों जैसे नीदरलैंड और बेल्जियम में सख्त चिकित्सा और कानूनी नियंत्रण के तहत सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई है।
गाज़ियाबाद के रहने वाले हरीश राणा को 2013 में गंभीर सिर की चोट लगी थी। वह चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहे थे और हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद गंभीर रूप से घायल हो गए थे। तब से वह स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में हैं, उन्हें 100 प्रतिशत दिव्यांगता और क्वाड्रिप्लेजिया (चारों अंगों का लकवा) है। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार उनकी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है और उनके होश में आने की भी उम्मीद नहीं है।
कई वर्षों तक बिस्तर पर रहने के कारण उन्हें बेडसोर और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी हो गई हैं। उनके माता-पिता, जो पिछले एक दशक से उनकी देखभाल कर रहे हैं, उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी थी। सभी मेडिकल रिपोर्ट देखने और माता-पिता से चर्चा करने के बाद अदालत ने उनकी मांग स्वीकार कर ली और कहा कि यह फैसला लेना आसान नहीं था।
इच्छामृत्यु चिकित्सा विज्ञान में सबसे विवादित नैतिक मुद्दों में से एक है। इसके समर्थकों का मानना है कि असाध्य बीमारी से पीड़ित मरीजों को दर्द में जीवन बिताने के बजाय शांतिपूर्ण मृत्यु का अधिकार होना चाहिए।
वहीं विरोध करने वालों का कहना है कि इस प्रक्रिया के दुरुपयोग की संभावना अधिक हो सकती है और चिकित्सा विज्ञान का मुख्य उद्देश्य हमेशा मानव जीवन को बचाना होना चाहिए। भारत में मौजूदा कानूनी व्यवस्था इन दोनों विचारों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है, जहां गंभीर परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाती है। इच्छामृत्यु को लेकर बहस लगातार बदलती रहती है, लेकिन हरीश राणा के मामले में यह कई मानवीय और नैतिक दुविधाओं को सामने लाता है।
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