Student's Scholarship: हिमाचल प्रदेश में शिक्षा को आधुनिक बनाने के लिए स्मार्ट क्लास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल लर्निंग जैसे बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। लेकिन इन्हीं दावों के बीच जनजातीय इलाकों के छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति एक कड़वी सच्चाई सामने रखती है। हकीकत यह है कि दशकों पुरानी एक योजना आज भी जस की तस चल रही है, जिसमें बच्चों को पूरे साल में सिर्फ 80 रुपये मिलते हैं।
महीने के सिर्फ 6.66 रुपये
लाहौल-स्पीति, किन्नौर और अन्य जनजातीय क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक पढ़ने वाले बच्चों को सालाना 80 रुपये मिलते हैं। यानी महीने के हिसाब से सिर्फ 6.66 रुपये। शिक्षा विभाग इसे "पारंपरिक सहायता योजना" कहकर बचाव करता है, लेकिन इतनी कम राशि से स्टेशनरी तक नहीं खरीदी जा सकती।
600 करोड़ के घोटाले के साए में और गंभीर सवाल
यह मुद्दा तब और गंभीर हो जाता है, जब इसे हिमाचल प्रदेश के करीब 600 करोड़ रुपये के छात्रवृत्ति घोटाले से जोड़कर देखा जाता है। अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अल्पसंख्यक छात्रों के लिए बनी बड़ी छात्रवृत्ति योजनाओं में गड़बड़ियों ने राज्य की निगरानी और जवाबदेही व्यवस्था पर सवाल खड़े किए थे। भारी बजट के बावजूद कई असली लाभार्थियों को या तो पूरा पैसा नहीं मिला या फिर वे योजना से बाहर ही रह गए।
शिक्षा कार्यकर्ताओं की राय
शिक्षा से जुड़े लोग कहते हैं कि एक तरफ छोटी योजनाओं में बच्चों को प्रतीकात्मक रकम दी जाती है, वहीं बड़ी योजनाएं भ्रष्टाचार की चपेट में आ जाती हैं। यह राज्य की प्राथमिकताओं और शासन की कमजोरी को दिखाता है।
ज्ञान विज्ञान समिति के सदस्य जिया नंद शर्मा का कहना है कि 600 करोड़ के घोटाले और 80 रुपये की छात्रवृत्ति के बीच का फर्क सरकार की गलत प्राथमिकताओं को दिखाता है। उनके मुताबिक, “एक तरफ छात्रों का पैसा हड़प लिया जाता है, दूसरी तरफ असली जनजातीय छात्रों को कल्याण के नाम पर बेहद मामूली राशि दी जाती है।”
सरकार ने माना, योजना हो चुकी है पुरानी
स्कूल शिक्षा निदेशक आशीष कोहली ने भी स्वीकार किया है कि यह योजना अब समय के हिसाब से पूरी तरह पुरानी हो चुकी है। उन्होंने बताया कि सरकार को इस योजना को युक्तिसंगत बनाने का प्रस्ताव भेजा गया है, ताकि इसमें बदलाव किया जा सके।
भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी डॉ. अरुण शर्मा ने शिक्षा क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि बुनियादी ढांचे और छात्र-केंद्रित योजनाओं में भी पारदर्शिता की भारी कमी है। राज्य स्तरीय संगठनों के सर्वे भी बताते हैं कि कई बार लाभ सही छात्रों तक पहुंच ही नहीं पाता।
सुधार की मांग
इस बहस ने छात्रवृत्ति प्रणाली में बड़े सुधार की मांग को फिर से सामने ला दिया है। शिक्षा कार्यकर्ता चाहते हैं कि सिर्फ डिजिटलीकरण और एआई पर ध्यान न देकर, सबसे कमजोर छात्रों के लिए पारदर्शी और पर्याप्त व्यवस्था बनाई जाए।