धर्म-प्रचार की स्वतंत्रता में धर्मांतरण करवाने की स्वतंत्रता नहीं... हिंदू संगठन ने किया सुप्रीम कोर्ट का रुख

Supreme Court News: कुछ राज्यों ने जबरन या प्रलोभन देकर धर्मांतरण करवाने के खिलाफ कानून बनाए तो उन प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में याचिकाएं दायर कर विरोध किया गया। अब वो याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट आ गई हैं। अब एक हिंदू संगठन ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह भी इस पक्ष में अपना मत रखना चाहता है।

Naveen Kumar Pandey( विद इनपुट्स फ्रॉम भाषा)
अपडेटेड6 Nov 2025, 10:02 PM IST
सुप्रीम कोर्ट।
सुप्रीम कोर्ट।

Anti-Conversion Law: गैरकानूनी और जबरन धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए कई राज्यों में बनाए गए कानूनों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं के मामले में एक नया मोड़ आ गया है। हिंदू संगठन अखिल भारतीय संत समिति ने गुरुवार को उच्चतम न्यायालय का रुख कर मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है। अधिवक्ता अतुलेश कुमार के माध्यम से दायर याचिका में उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2018, उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021, हिमाचल प्रदेश धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम 2019 और मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2021 सहित कई राज्यों में बनाए गए कानूनों के खिलाफ दायर याचिकाओं को चुनौती दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्टों से मंगवा लीं याचिकाएं

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर महीने में विभिन्न हाई कोर्टों में लंबित याचिकाओं को अपने पास ट्रांसफर कर लिया था, जिनमें अंतर-धार्मिक विवाहों पर धर्म परिवर्तन की पड़ताल करने वाले कानूनों को चुनौती दी गई थी। इनमें जमानत और लंबी सजा के लिए तय किए गए कड़े प्रावधान भी शामिल हैं। अखिल भारतीय संत समिति की याचिका में याचिकाकर्ता को मामले में एक पक्षकार के रूप में शामिल करने और अदालत में लिखित रूप से अपनी बात रखने की अनुमति देने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

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'धर्म-प्रचार की स्वतंत्रता में धर्मांतरण करवाने की स्वतंत्रता नहीं'

संगठन ने दलील दी है कि किसी धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति को धर्मांतरण कराने का अधिकार नहीं देती है और कानून, स्वतंत्र आधार पर स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन पर रोक नहीं लगाते हैं। याचिका में कहा गया है कि ये कानून धर्मांतरण के केवल उन कृत्यों को नियंत्रित करते हैं जो जबरन, धोखाधड़ी, प्रलोभन, अनुचित प्रभाव या दिखावटी विवाह की आड़ में किए जाते हैं। याचिका में कहा गया है कि ये अधिनियम सद्भावनापूर्ण धर्मांतरण पर कोई पूर्व प्रतिबंध नहीं लगाते हैं।

विभिन्न हाई कोर्टों में दायर हुए धर्मांतरण विरोधी कानूनों के खिलाफ याचिकाएं

उच्चतम न्यायालय ने 2023 में राज्यों के धर्मांतरण विरोधी कानूनों को चुनौती देने वाले पक्षों से कहा था कि वे उच्च न्यायालयों से मामलों को शीर्ष अदालत में स्थानांतरित करने के लिए एक साझा याचिका दायर करें। इसने उल्लेख किया था कि ‘इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कम से कम पांच, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में सात, गुजरात और झारखंड उच्च न्यायालयों में दो-दो, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में तीन तथा कर्नाटक और उत्तराखंड उच्च न्यायालयों में एक-एक ऐसी याचिकाएं हैं।’

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जमीयत ने किया धर्मांतरण विरोधी कानूनों का विरोध

गुजरात और मध्यप्रदेश राज्यों की ओर से भी दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें धर्मांतरण पर उनके कानूनों के कुछ प्रावधानों पर रोक लगाने वाले संबंधित उच्च न्यायालयों के अंतरिम आदेशों को चुनौती दी गई थी। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के धर्मांतरण विरोधी कानूनों के खिलाफ भी उच्चतम न्यायालय का रुख किया था और दलील दी थी कि ये अंतर-धार्मिक जोड़ों को परेशान करने और उन्हें आपराधिक मामलों में फंसाने के लिए बनाए गए हैं।

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