
AI Ghost Workers: आज की दुनिया में हम सब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दीवाने हैं। चैटजीपीटी (ChatGPT) से कविता लिखवानी हो या किसी इमेज जेनरेटर से अपनी फोटो को पेंटिंग में बदलना हो, हमें लगता है कि ये सब जादू है। हाल ही में भारत में हुए AI समिट में भी यही दिखाया गया कि कैसे AI दुनिया को बदल देगा, स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करेगा और गरीबी मिटाने में मदद करेगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये AI इतना 'समझदार' और 'सभ्य' कैसे बना? इसे कैसे पता चला कि कौन सी बात गाली है और कौन सा वीडियो हिंसा से भरा है?
इस चमक-धमक वाली तकनीक के पीछे भारत के छोटे शहरों और गांवों के कमरों में बैठे उन हजारों 'घोस्ट वर्कर्स' की कहानी है, जो दिन-रात कंप्यूटर स्क्रीन पर दुनिया भर की गंदगी, हिंसा और गालियां सिर्फ इसलिए देख रहे हैं ताकि आपका और हमारा AI सेफ रह सके। द गार्जियन ने एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है।
इन वर्कर्स का मुख्य काम डेटा एनोटेशन (Data Annotation) और कंटेंट मॉडरेशन (Content Moderation) है। आसान भाषा में कहें तो, AI को सही और गलत का फर्क समझाने के लिए एक इंसान को बीच में बैठना पड़ता है। झारखंड की 26 साल की मोसुमी मुर्मू जैसी वर्कर्स को कई बार एक दिन में लगभग 800 वीडियो और फोटो देखने पड़ते हैं। इनमें से कई वीडियो रोंगटे खड़े कर देने वाले होते हैं, जैसे किसी का एक्सीडेंट, यौन हिंसा या बच्चों के साथ दुर्व्यवहार। उन्हें इन पर 'लेबल' लगाना होता है ताकि AI का एल्गोरिदम पहचान सके कि यह 'गलत' है।
इस काम की सैलरी बहुत ज्यादा नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड में घर से काम करने वाली मोसुमी को महीने के करीब £260 (लगभग 31,000-32,000 रुपये) मिलते हैं। वहीं बरेली की रैना सिंह को एक थर्ड-पार्टी कंपनी के जरिए £330 (करीब 40,000 रुपये) प्रतिमाह मिलते थे। भारत के हिसाब से यह सैलरी एक ग्रेजुएट के लिए ठीक लग सकती है, लेकिन जिस मानसिक प्रताड़ना से वे गुजरते हैं, उसके आगे यह रकम बहुत छोटी है।
कई बार काम की प्रकृति जॉइन करते समय साफ नहीं बताई जाती। बाद में अचानक उन्हें ऐसे प्रोजेक्ट पर लगा दिया जाता है जिसमें बाल यौन शोषण या अश्लील सामग्री को देखना पड़ता है।
इस काम के लिए कंपनियां जानबूझकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों का रुख करती हैं क्योंकि वहां लेबर सस्ती है। इस वर्कफोर्स का 50% या उससे ज्यादा हिस्सा महिलाएं हैं। कंपनियों को लगता है कि महिलाएं बारीकियों पर ध्यान देती हैं और घर से काम करने की वजह से कम शिकायत करती हैं। इनमें भी बड़ी संख्या दलित और आदिवासी समुदायों की है, जिनके लिए खेती या खदानों में काम करने के मुकाबले यह 'डिजिटल काम' एक सम्मानजनक विकल्प लगता है। लेकिन वे नहीं जानते कि यह काम उन्हें मानसिक रूप से सुन्न कर देगा।
मिंट को दिए बयान में AI एथिसिस्ट और टेक-डेटा एथिक्स रिसर्चर सुंदर नारायणन ने साफ कहा है कि “सेफ AI” बनाना पूरी तरह इंसानों की मेहनत पर टिका है। कंटेंट मॉडरेशन, डेटा लेबलिंग और RLHF जैसी प्रक्रियाओं में लोगों को हिंसा या अश्लील सामग्री पहचानकर AI को सिखाना पड़ता है कि क्या सही है और क्या गलत।
उनका कहना है कि अगर मॉडरेटर्स को सही ट्रेनिंग और मानसिक सहारा न मिले, तो डेटा में गलती या पक्षपात आ सकता है। ट्रॉमा और बर्नआउट सटीकता कम कर देते हैं। वे यह भी चेतावनी देते हैं कि कंपनियों को पूरी सप्लाई चेन में काम करने वालों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता और पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए, वरना AI के भविष्य की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।
Nasscom के आंकड़ों के अनुसार, 2021 तक भारत में डेटा एनोटेशन का बाजार लगभग $250 मिलियन का हो चुका था। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस कमाई का 60% हिस्सा अमेरिका से आता है, जबकि भारत का योगदान सिर्फ 10% है। यानी हम विदेशी कंपनियों के AI को सुधारने के लिए अपने युवाओं की मानसिक सेहत दांव पर लगा रहे हैं।
एक अनुमान के मुताबिक, भारत में 70,000 से ज्यादा लोग सीधे तौर पर डेटा एनोटेशन और मॉडरेशन के काम में लगे हुए हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है क्योंकि इंटरनेट अब गांवों तक पहुंच चुका है। ये लोग अक्सर सख्त नॉन-डिस्क्लोसूरे एग्रीमेंट (NDA) के तहत काम करते हैं, जिसकी वजह से वे अपने परिवार को भी नहीं बता सकते कि वे स्क्रीन पर क्या देख रहे हैं।
शुरुआती महीनों में मौसुमि को नींद नहीं आती थी। आंख बंद करतीं तो वही दृश्य सामने आ जाते। कुछ समय बाद वे कहती हैं, “आखिर में आप परेशान नहीं होते, आपका दिमाग एकदम खाली हो जाता है।” रिसर्च बताती है कि कंटेंट मॉडरेशन खतरनाक काम की श्रेणी में आता है। सोशियोलॉजिस्ट मिलाग्रोस मिचेली कहती हैं कि यह किसी भी जोखिम भरे उद्योग जितना मानसिक रूप से खतरनाक हो सकता है।
स्टडीज में पाया गया है कि इस काम से ट्रॉमा, एंग्जायटी, नींद की समस्या और भावनात्मक सुन्नता जैसी दिक्कतें होती हैं। फिर भी भारत की लेबर लॉ में मानसिक नुकसान को लेकर स्पष्ट सुरक्षा नहीं है।
जहां भारत के गांवों में लोग इस काम से डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं, वहीं ग्लोबल लेवल पर AI के दिग्गजों के बीच भी सुरक्षा को लेकर ठन गई है। ओपन-एआई के सैम ऑल्टमैन (Sam Altman) और एंथ्रोपिक के डारियो अमोदेई (Dario Amodei) के बीच 'AI सेफ्टी' को लेकर बड़ा मतभेद रहा है। अमोदेई सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं और इसी वजह से उन्होंने ओपन-एआई छोड़कर अपनी अलग कंपनी बनाई थी। यह दिखाता है कि AI को सुरक्षित बनाना कितना पेचीदा और खतरनाक काम है।
सबसे दुखद बात यह है कि ये बड़ी टेक कंपनियां सीधे तौर पर इन वर्कर्स को नौकरी पर नहीं रखतीं। ये काम 'सप्लाई चेन' के जरिए छोटे-छोटे ठेकेदारों को दे दिया जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि मुख्य कंपनी अपनी जिम्मेदारी से बच जाती है।
AI का भविष्य चमकदार हो सकता है, लेकिन उसकी नींव रखने वाले इन 'घोस्ट वर्कर्स' की कहानी भी उतनी ही जरूरी है। सवाल सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं, इंसानियत का भी है।
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