
Israel Iran War: शनिवार, 28 फरवरी की भोर ईरान की राजधानी तेहरान में धमाकों की गूंज सुनाई दी। ईरान ने भी कुछ घंटों बाद ही अमेरिका-इजरायल के इस संयुक्त सैन्य अभियान का जवाब देना शुरू किया। हालांकि, ईरान ने इस युद्ध में अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई के साथ-साथ कई प्रमुख शख्सियतों को खो दिया है। लेकिन वह अपने मिसाइलों और ड्रोनों से खाड़ी में अमेरिका के मित्र देशों को अच्छा-खासा नुकसान पहुंचा रहा है।
अमेरिका-ईरान के बीच जारी युद्ध ने ड्रोन वॉर का एक बड़ा और जटिल उदाहरण दुनिया के सामने रखा। ईरान खाड़ी देशों में हजारों ड्रोन भेज चुका है। अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने अपने वीडियो बयान में पुष्टि की कि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में 500 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें और 2,000 से अधिक ड्रोन दागे। इन हमलों में बहरीन, इराक, इजराइल, जॉर्डन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और यूएई में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया।
ईरान के ये ड्रोन मुख्य रूप से शाहेद-136 और शाहेद-191 श्रेणी के हैं। अमेरिकी संस्था सामरिक एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र (CSIS) के अनुसार, एक बैलिस्टिक मिसाइल जहां लाखों डॉलर की होती है, वहीं एक शाहेद-136 ड्रोन की कीमत मात्र 20,000 से 50,000 डॉलर होती है। यही सस्तापन इन्हें 'आसमान का AK-47' बनाता है।
कैनेडियन ड्रोन कंपनी ड्रैगनफ्लाई के सीईओ कैमरन शेल ने अमेरिकी न्यूज चैनल फॉक्स न्यूज को बताया, 'किसी भी विकेंद्रित यूनिट के हाथ में सौ ड्रोन भी हों तो वो किसी पड़ोसी देश में कल्पना से परे दहशत फैला सकते हैं। ईरान इन ड्रोनों से युद्ध नहीं जीत सकता, लेकिन जैसे वियतनाम युद्ध में वियत कांग की असंतुलित क्षमता ने युद्ध लंबा खींचा और राजनीतिक दबाव बनाया, यहां भी वही रणनीति है।'
इस युद्ध की सबसे रोचक बात यह रही कि अमेरिका ने पहली बार ईरानी शाहेद-136 को रिवर्स-इंजीनियर करके बनाए गए अपने LUCAS ड्रोन युद्ध में उतारे। सेंटकॉम ने आधिकारिक बयान में कहा, 'टास्क फोर्स स्कॉर्पियन स्ट्राइक ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में पहली बार इतिहास में वन वे अटैक ड्रोन्स को युद्ध में इस्तेमाल किया। ये सस्ते ड्रोन ईरान के शाहेद ड्रोनों पर आधारित हैं और अब अमेरिका-निर्मित जवाब दे रहे हैं।'
कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनैशनल पीस (CEIP) की सीनियर फेलो दारा मासीकोट ने फॉक्स न्यूज डिजिटल से बात करते हुए कहा, 'अभी ईरान बैलिस्टिक मिसाइलों और अटैक ड्रोन दोनों का मिला-जुला इस्तेमाल कर रहा है। ये तरीके असरदार हैं, लेकिन इस तरह ड्रोनों को रोकने में बड़े संसाधन झोंकने होते हैं जो महंगे हैं। ड्रोनों को रोकने में कुछ खास तरह के इंटरसेप्टर मिसाइलें तेजी से घटने लगेंगी।' उन्होंने आगे कहा, 'ग्राउंड बेस्ड एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलें असीमित नहीं हैं, और अमेरिका तथा उसके साझेदारों को इस क्षेत्र में वर्षों से भंडार संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।'
सीएसआईएस के अनुसार, पैट्रियट जैसी इंटरसेप्टर मिसाइलें बैलिस्टिक मिसाइल खतरों के लिए बचाकर रखनी पड़ती हैं। 35,000 डॉलर के ल्युकस या 20,000 डॉलर के शाहेद ड्रोनों को रोकने के लिए लाखों डॉलर के इंटरसेप्टर जलाना युद्ध की अर्थव्यवस्था को लंबे समय में कमजोर कर देता है। कार्नेगी के एक और सीनियर फेलो स्टीव फेल्डस्टाइन ने कहा, 'एक महत्वपूर्ण बात यह है कि दुनिया ड्रोन युद्ध के एक नए युग में प्रवेश कर रही है, क्योंकि मानव रहित विमान बड़े और छोटे, दोनों संघर्षों में युद्ध के मैदान में तेजी से फैल रहे हैं।'
युद्ध में एक चिंताजनक घटना 1 मार्च की रात सामने आई। सेंटकॉम ने 2 मार्च को आधिकारिक प्रेस रिलीज में पुष्टि की कि कुवैती एयर डिफेंस सिस्टम ने तीन अमेरिकी F-15E स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान गलती से मार गिराए। हालांकि, सभी छह पायलट और वेपन्स सिस्टम ऑफिसर सुरक्षित रूप से इजेक्ट हो गए। लेकिन, यह घटना बताती है कि जब मिसाइलें, ड्रोन और लड़ाकू विमान एक ही आसमान में हों, तो दोस्त और दुश्मन में फर्क करना कितना मुश्किल हो जाता है।
मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (MP-IDSA) के सीनियर फेलो और भारतीय वायु सेना के पूर्व हेलीकॉप्टर पायलट ग्रुप कैप्टन डॉ. राजीव कुमार नारंग इस संघर्ष से भारत के लिए महत्वपूर्ण सबक निकालते हैं। डॉ. नारंग के अनुसार, ईरान की असली ताकत उसके मानव रहित सिस्टम (ड्रोन), मिसाइल प्रणाली और रॉकेट में है। ईरान ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद चीन और ब्लैक मार्केट के जरिए पश्चिमी घटक हासिल किए हैं। ईरान के शाहेद ड्रोनों में अमेरिका, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, जर्मनी, कनाडा, जापान और पोलैंड की कंपनियों के व्यावसायिक पुर्जे पाए गए हैं।
'इंडियाज क्वेस्ट फॉर यूएवीज एंड चैलेंजेज' पुस्तक के लेखक डॉ. नारंग कहते हैं कि ईरान के ड्रोन हमलों की सीमाएं भी हैं। उनके शाहेद-129 जैसे MALE (मीडियम अल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस) क्लास ड्रोन, अमेरिकी MQ-9 रीपर से थोड़े कम क्षमता के हैं। इजराइल के रक्षा मंत्रालय ने 1 मार्च को बताया कि इजराइली जेट और अटैक हेलीकॉप्टरों ने 50 से अधिक यूएवी को निष्क्रिय किया। यह दर्शाता है कि एक सुनियोजित एयर डिफेंस नेटवर्क ड्रोन हमलों को रोक सकता है।
रक्षा मंत्रालय ने 15 अक्तूबर, 2024 को अमेरिकी कंपनी जनरल एटोमिक्स के साथ 31 MQ-9B ड्रोन खरीदने का सौदा किया। इनमें नौसेना के लिए सी गार्जियन जबकि थलसेना एवं वायुसेना के लिए स्काई गार्जियन वेरिएंट शामिल हैं। ये हाई अल्टिट्यूट लॉन्ग एंड्यूरेंस (HALE) श्रेणी के ड्रोन 40,000 फीट की ऊंचाई पर 40 घंटे से अधिक उड़ सकते हैं। लेकिन डॉ. नारंग की चेतावनी है कि ये ड्रोन स्टेल्थ तकनीक से लैस नहीं हैं। पाकिस्तान या चीन की उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों वाली सीमाओं पर इनका सीमा-पार उपयोग बेहद जोखिम भरा हो सकता है।
पिछले वर्ष 7 से 10 मई तक चले ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के नौ आतंकी ठिकानों पर मिसाइल हमले किए थे। उन हमलों ने स्पष्ट कर दिया कि मजबूत यूएवी समर्थन कितना अहम है। कार्नेगी के विश्लेषण के अनुसार, यह ऑपरेशन 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद पाकिस्तानी ठिकानों पर भारत की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कार्रवाई थी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) का TAPAS-BH-201 अभी पूरी तरह से सेना की जरूरतें पूरी नहीं कर पाया। भारतीय थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के विश्लेषण में कहा गया है कि इसकी इंजन क्षमता एक बुनियादी कमजोरी है जिसने सेना को MQ-9B की ओर मुड़ने पर मजबूर किया।
डॉ. नारंग कहते हैं कि डीआरडीओ के घातक अनमैन्ड कॉम्बैट एरियल वीइकल (UCAV) कार्यक्रम को मंजूरी और फंडिंग में देरी नहीं होनी चाहिए। घातक एक स्वायत्त, जेट-चालित, स्टेल्थ यूसीएवी है। एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट इस्टेब्लिशमेंट (ADE) इसे भारतीय वायु सेना के लिए विकसित कर रहा है। ऑपरेशन एपिक फ्यूरी ने साबित किया कि भविष्य के युद्धों में स्टेल्थ यूसीएवी की भूमिका अपरिहार्य है।
इजराइल ने जिस तरह अपने एफ-35 और अटैक हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल 50 से अधिक यूएवी रोकने में किया, उससे भारत को सीखना चाहिए। भारत को अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान एलसीए तेजस और एलसीएच में काउंटर-ड्रोन प्रणालियां एकीकृत करनी चाहिए।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने 300-400 तुर्किये निर्मित YIHA-III कामिकाजे और असिसगार्ड सोंगर ड्रोन भारतीय सैन्य ठिकानों पर दागे। भारत की इंटिग्रेटेड काउंटर ड्रोन ग्रीड और आकाश मिसाइल सिस्टम ने इन्हें सफलतापूर्वक रोका। डॉ. नारंग का कहना है कि शांतिकाल और युद्धकाल दोनों में ड्रोन खतरा बना रहेगा। भारत को आईटीबीपी और बीएसएफ की काउंटर ड्रोन क्षमताओं को राष्ट्रीय वायु रक्षा नेटवर्क से जोड़ना होगा। साथ ही डिजिटल स्काई और मिलिट्री-सिविल अनमैन्ड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (UTM) को जल्द से जल्द विकसित और युद्ध में आजमाना होगा।
जो बात इस युद्ध ने एकदम साफ कर दी है, वह यह है कि ड्रोन युद्ध अब किसी एक देश की विशेषता नहीं रहा। इंस्टिट्यूट फॉर साइंस एंड इंटरनैशनल सिक्यॉरिटी (ISIS) ऑनलाइन के व्यापक वार्षिक विश्लेषण के अनुसार, यूक्रेन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2025 में रूस ने यूक्रेन पर 54,538 शाहेद टाइप के यूएवी दागे, जिसमें लगभग 32,200 स्ट्राइक यूएवी और शेष डिकॉय थे। यह संख्या दर्शाती है कि सस्ते ड्रोनों की 'संख्या की रणनीति' आधुनिक युद्ध की एक स्थायी वास्तविकता बन गई है। पाकिस्तान के पास तुर्किये के बेरक्तर टीबी2 और एकिंसी ड्रोन, चीनी विंग लूंग-II और सीएच-4बी ड्रोन, बुराक और शाहपर यूएवी सहित एक व्यापक ड्रोन बेड़ा है।
ग्रुप कैप्टन डॉ. राजीव कुमार नारंग का संदेश स्पष्ट है- ऑपरेशन एपिक फ्यूरी सिर्फ मध्य-पूर्व की घटना नहीं है। यह 21वीं सदी के युद्ध की नई इबारत है, जिसमें सस्ते ड्रोनों के झुंड, स्टेल्थ यूसीएवी और एकीकृत वायु रक्षा प्रणालियां मिलकर युद्ध का रुख तय करती हैं। भारत के पास पाकिस्तान और चीन दोनों सीमाओं पर ड्रोन खतरा बढ़ रहा है। स्वदेशी ड्रोन विकास, काउंटर-ड्रोन नेटवर्क और एकीकृत वायु रक्षा- तीनों मोर्चों पर एक साथ काम करना भारत की सुरक्षा की मांग है। जैसा कि डॉ. नारंग कहते हैं- देरी की कीमत बहुत बड़ी हो सकती है।
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