फटाफट मोटी रकम ट्रांसफर हुई और पूछा तक नहीं! बैंक भी साइबर फ्रॉड के लिए जिम्मेदार? उपभोक्ता आयोग करेगा फैसला

साइबर फ्रॉड के एक टूल डिजिटल अरेस्ट के तीन पीड़ितों ने 24 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी को लेकर बैंकों के खिलाफ देश की शीर्ष उपभोक्ता अदालत में केस दर्ज किया है। यह मामला तय करेगा कि जब कोई ग्राहक धमकी या ब्लैकमेल में पैसे ट्रांसफर करता है, तो क्या बैंक भी जिम्मेदार होंगे?

Naveen Kumar Pandey( विद इनपुट्स फ्रॉम लाइवमिंट.कॉम)
पब्लिश्ड15 Jul 2025, 02:50 PM IST
साइबर फ्रॉड में पैसा गंवाने वाले का बैंक भी जिम्मेदार?
साइबर फ्रॉड में पैसा गंवाने वाले का बैंक भी जिम्मेदार?(Image:mPixabay)

सोचिए कि अचानक आपके फोन पर एक कॉल आए। दूसरी तरफ कोई सख्त आवाज में कहे कि वो किसी केंद्रीय एजेंसी का वरिष्ठ अधिकारी है। फिर वो आपके नाम पर कानूनी कार्रवाई की धमकी देने लगे। गिरफ्तारी, कोर्ट केस, सजा की कल्पना से ही आप कांप उठें, फिर डर और घबराहट में आप अपने बैंक खाते से लाखों-करोड़ों रुपये ट्रांसफर कर दें। बाद में समझ आए कि सब एक धोखा था। डिजिटल अरेस्ट का ऐसा ही खेल हर दिन देश के कोने-कोने में खेला जा रहा है।

करोड़ों गंवाने वाले तीन लोग पहुंचे उपभोक्ता आयोग

लाइव मिंट की एक रिपोर्ट के अनुसार, इसी खेल के शिकार हुए तीन लोग अब नैशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रेड्रेसल कमीशन (NCDRC) में बैंकों पर लापरवाही का आरोप लगाया है। पीड़ितों का कहना है कि बैंक सिस्टम ने भी मोटी रकम के फटाफट ट्रांजैक्शन में भी कोई संदेह महसूस नहीं किया और सारे ट्रांजैक्शन अप्रूव कर दिए। पीड़ितों ने बैंक सिस्टम में इस कथित खामी के लिए 24 करोड़ रुपये की रिकवरी की मांग की है।

क्या बैंक भी जिम्मेदार हैं जब ग्राहक डर में पैसे ट्रांसफर करे?

बैंक अब तक यही तर्क देते रहे हैं कि जब ग्राहक खुद से पैसा ट्रांसफर करता है, तो वो जिम्मेदार नहीं होते। लेकिन इस मामले में वकील महेंद्र लिमये का तर्क है कि ये कोई सामान्य ऑनलाइन फ्रॉड नहीं था, यह तो ब्लैकमेल और धमकी के जरिए जबरदस्ती पैसे निकलवाने की साजिश थी। लिमये के मुताबिक, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की 2017 की गाइडलाइंस कहती हैं कि ग्राहक की सीमित जिम्मेदारी होती है, खासकर तब, जब लेनदेन धमकी या मानसिक दबाव में हुआ हो। ऐसे में बैंक भी आंशिक रूप से दोषी माने जा सकते हैं।

चार निजी बैंकों पर उठे सवाल, 14 नवंबर तक मांगा जवाब

इस केस में देश के चार प्रमुख निजी बैंक शामिल हैं, जिनमें दो अग्रणी बैंक एचडीएफसी (HDFC) और आईसीआईसीआई (ICICI) भी हैं। एचडीएफसी ने अपने जवाब में कहा कि ग्राहक ने पूरी जानकारी और मर्जी से 4 करोड़ रुपये का ट्रांजैक्शन किया था, इसलिए बैंक पर जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। वहीं, आईसीआईसीआई बैंक ने तर्क दिया कि जब पैसे उनके खाते से नहीं गए, तो उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, भले ही उनके खातों का इस्तेमाल मनी म्यूल की तरह हुआ हो।

मनी म्यूल क्या होता है?

किसी बैंक के मनी म्यूल की तरह इस्तेमाल होने का मतलब है कि कोई व्यक्ति या उसका बैंक खाता अनजाने में या जानबूझकर अवैध पैसे को इधर-उधर करने के लिए उपयोग किया जाता है। आसान भाषा में, मनी म्यूल वह व्यक्ति होता है जो अपने बैंक खाते के जरिए गैरकानूनी तरीके से कमाए गए पैसे को एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर करता है, ताकि उस पैसे का स्रोत छिपाया जा सके।

मान लीजिए, कोई साइबर ठग फ्रॉड से कमाया हुआ पैसा किसी और के खाते में भेजता है। फिर वह उस व्यक्ति (मनी म्यूल) से कहता है कि इस पैसे को किसी और खाते में ट्रांसफर कर दे या नकद निकालकर कहीं और दे दे। इस तरह, अपराधी की कमाई क्लीन दिखने लगती है, और असली अपराधी का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।

डिजिटल अरेस्ट: एक नया साइबर हथियार

बीते दो सालों में डिजिटल अरेस्ट स्कैम का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। इसमें ठग खुद को सरकारी अधिकारी बताकर डर पैदा करते हैं और पीड़ित से पैसे वसूल लेते हैं। ये स्कैम अकसर विदेशी ठगों से संचालित होते हैं। पुलिस तो ऐसे मामलों को आमतौर पर आपराधिक कानूनों के तहत देखती है, लेकिन एनसीडीआरसी इसको उपभोक्ता अधिकार के नजरिये से देख रही है।

बैंकों की जवाबदेही पर नई बहस की शुरुआत

वरिष्ठ अधिवक्ता एनएस नप्पिनाई के अनुसार, आरबीआई को अब सिर्फ जागरूकता फैलाने से आगे जाकर यह तय करना होगा कि जब किसी खाते को मनी म्यूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो उस बैंक को भी उत्तरदायी ठहराया जाए। अगर बैंक हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शन में भी कोई ऐहतियात न बरतें, तो यह भी 'सेवा में कमी' के दायरे में आ सकता है।

बैंक ने दोबारा पूछा तक नहीं! लापरवाही या सिस्टम की कमी?

वरिष्ठ वकील सुमंत नायक ने कहा कि जिस ग्राहक ने करोड़ों की सेविंग्स निकाली, उससे बैंक ने दोबारा पुष्टि तक नहीं की। ऐसे मामलों में बैंक स्टाफ का यह दायित्व बनता है कि वे लेनदेन के पीछे की मंशा समझें, खासकर जब ग्राहक भावनात्मक दबाव में हो। यदि बैंक ऐसा न करे, तो उनकी भूमिका पर सवाल उठाना जायज है।

सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी: ग्राहक और बैंक, दोनों सतर्क रहें

हाल ही में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम पल्लभ भौमिक केस (SBI Vs Pallabh Bhowmick Case) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनधिकृत लेनदेन से बचना बैंक की जिम्मेदारी है, लेकिन ग्राहक को भी अपनी गोपनीय जानकारी जैसे वन टाइम पासवर्ड (OTP) साझा करने में सतर्कता बरतनी चाहिए।

पुलिस की जांच जारी, लेकिन अदालत का फैसला बनेगा मिसाल

हरियाणा पुलिस के अधिकारी सुरेंद्र ने बताया कि उनकी स्पेशल टीम कुछ रकम रिकवर कर चुकी है, लेकिन अदालत की प्रक्रिया भी स्वतंत्र रूप से चल रही है। वहीं, बैंकों के अधिकारी मानते हैं कि अगर ग्राहक खुद पैसे ट्रांसफर कर रहा है, तो उसे रोकना मुश्किल है। लेकिन यही बात अब कटघरे में है। अगर अदालत यह तय कर दे कि डर में किए गए ट्रांजैक्शन की जिम्मेदारी केवल ग्राहक की नहीं, तो यह फैसला आने वाले वर्षों के लिए एक नई मिसाल बन सकता है।

समय के साथ फाइनैंशल सिस्टम को भी होना होगा अपडेट

डिजिटल दुनिया में जैसे-जैसे धोखाधड़ी के तरीके बदल रहे हैं, वैसे-वैसे हमारी कानूनी और वित्तीय प्रणाली को भी खुद को अपडेट करना होगा। यह केस महज तीन लोगों की नहीं बल्कि लाखों बैंक ग्राहकों के अधिकारों और सुरक्षा की लड़ाई है। अगर यह केस पीड़ितों के पक्ष में जाता है, तो यह साबित करेगा कि सिस्टम न सिर्फ ठगों के खिलाफ, बल्कि पीड़ितों के साथ भी खड़ा हो सकता है।

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