
महिला वनडे क्रिकेट विश्व कप विजेता टीम की खिलाड़ी जेमिमा रोड्रिग्स ने हाल ही में अपने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी पर खुलकर बात की। उनके बयान के बाद देश में एक बार फिर मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा शुरू हो गई है।
जेमिमा ने बताया कि वह बेचैनी और आत्म-संदेह की भावना से जूझ रही हैं और ऑनलाइन आलोचनाओं ने उनके भावनात्मक तनाव को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला हमें याद दिलाता है कि मानसिक स्वास्थ्य कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि एक सामूहिक और नीतिगत मुद्दा है, जिस पर समाज को मिलकर काम करना चाहिए।
विश्व कप के सेमीफाइनल मैच में जेमिमा ने शतक लगाया, जिससे भारत को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जीत मिली और टीम फाइनल में पहुंची। लेकिन मैच के बाद 30 अक्टूबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, “इस दौरे के दौरान मैं लगभग हर दिन रोई। मानसिक रूप से ठीक नहीं हूं, बेचैनी की समस्या से जूझ रही हूं।” उनके इस बयान ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि खेल, सफलता या प्रसिद्धि होने के बावजूद भी कोई व्यक्ति अंदर से टूट सकता है।
मनोवैज्ञानिक और संस्था ‘इमोनीड्स’ की संस्थापक डॉ. नीरजा अग्रवाल ने कहा, “जेमिमा का साहस यह दिखाता है कि मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां किसी को भी प्रभावित कर सकती हैं चाहे वह कितना भी सफल क्यों न हो।” उन्होंने कहा कि खिलाड़ी हों या आम लोग सभी को लगातार अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव, असफलता का डर और दूसरों की उम्मीदों का बोझ झेलना पड़ता है।
डॉ. अग्रवाल ने बताया कि सोशल मीडिया एक ओर जहां लोगों को अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है, वहीं कठोर टिप्पणियां, बुलिंग और तनाव जैसी समस्याएं भी बढ़ाता है। उन्होंने कहा, “जब हम मानसिक स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बात करते हैं, एक-दूसरे का साथ देते हैं और ऑनलाइन उत्पीड़न जैसे मुद्दों पर खुली बातचीत करते हैं, तभी असली इलाज शुरू होता है।”
भारत में अब भी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी है। ‘इमोनीड्स’ के सह-संस्थापक तनमय गोयल के अनुसार, “भारत में करीब 20 करोड़ लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, लेकिन हर एक लाख लोगों पर सिर्फ एक विशेषज्ञ उपलब्ध है।”
उन्होंने बताया कि उनकी संस्था एआई आधारित उपकरण तैयार कर रही है, जो 24 घंटे मदद प्रदान कर सकेंगे और डॉक्टरों को बेहतर इलाज में सहायता करेंगे। उनका उद्देश्य है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ, सस्ती और बिना झिझक हर व्यक्ति तक पहुंच सकें।
एम्स दिल्ली की डॉ. दीपिका दहिमा का कहना है कि जेमिमा का बयान इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे यह समझ आता है कि मानसिक स्वास्थ्य की समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और नीतिगत जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि भावनात्मक परेशानियों के पीछे प्रदर्शन का दबाव, सामाजिक अपेक्षाएं, लिंग-आधारित भेदभाव और सहायता की कमी जैसे कारण होते हैं।
सीताराम भरतिया अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. जितेंद्र जाखड़ ने कहा, “मानसिक बीमारी हमेशा बाहरी रूप से दिखाई नहीं देती। कई लोग जो सामान्य दिखते हैं, काम में सफल हैं, हंसते-खेलते हैं वे भी अंदर से गहरी चिंता और अवसाद से गुजर रहे होते हैं।” उन्होंने कहा कि ऐसे लोग खामोशी से खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश करते हैं, जैसे जेमिमा ने किया। वे दूसरों को प्रोत्साहित करते हैं, खेलते हैं, लेकिन भीतर से खुद संघर्ष कर रहे होते हैं।
जेमिमा रोड्रिग्स की ईमानदारी ने यह साबित किया है कि मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करना कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत है। समाज, संस्थान और नीतिनिर्माताओं को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य सहायता आसानी से मिल सके और इस विषय पर चुप्पी तोड़ी जाए।
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