अधूरे सपने से लेकर वर्ल्ड कप जीत तक का सफर, जानिए भारतीय महिला क्रिकेट टीम के कोच अमोल मजूमदार की कहानी

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीतकर इतिहास रचा। कोच अमोल मजूमदार की मेहनत और खिलाड़ियों के विश्वास ने टीम को मजबूती दी। हरमनप्रीत कौर ने फाइनल के बाद भावुक होकर कोच को गले लगाया। यह जीत उनके लिए एक सपने की तरह है।

Manali Rastogi( विद इनपुट्स फ्रॉम भाषा)
पब्लिश्ड3 Nov 2025, 05:12 PM IST
अमोल मजूमदार
अमोल मजूमदार

लगभग 50 साल के लंबे इंतजार के बाद जब भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार विश्व कप की ट्रॉफी उठाई, तो पूरा देश खुशी से झूम उठा। मैदान पर खिलाड़ी एक-दूसरे को गले लगा रहे थे, जश्न मना रहे थे।

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लेकिन उसी मैदान पर खड़े एक शख्स की आंखों में आंसू और चेहरे पर मुस्कान थी और वह थे भारतीय महिला टीम के कोच अमोल मजूमदार। यह जीत उनके लिए सिर्फ एक टूर्नामेंट की जीत नहीं, बल्कि कई पुराने घावों पर मरहम जैसी थी।

खिलाड़ी नहीं, कोच बनकर पूरा हुआ सपना

अमोल मजूमदार ने घरेलू क्रिकेट में 20 साल तक खेला और 11,000 से ज्यादा प्रथम श्रेणी रन बनाए। फिर भी उन्हें कभी भारत की जर्सी पहनने का मौका नहीं मिला। बतौर खिलाड़ी, कई बार दिल टूटा और सपने अधूरे रह गए, लेकिन जब उनकी टीम ने वर्ल्ड कप जीता, तो वह जीत उनके लिए सब कुछ बन गई।

कप्तान हरमनप्रीत कौर ने फाइनल के बाद भावुक होकर कोच मजूमदार के पैर छुए और उन्हें गले लगाकर रो पड़ीं। यह पल देखकर टीवी पर मौजूद हर क्रिकेटप्रेमी की आंखें भी नम हो गईं।

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मजूमदार की कहानी शाहरुख खान की फिल्म 'चक दे इंडिया' के कोच कबीर खान की याद दिलाती है। जैसे कबीर खान ने आलोचनाओं के बावजूद टीम को विश्व कप जिताया था, वैसे ही मजूमदार ने भी हर शक और चुनौती को पीछे छोड़ते हुए भारतीय महिला टीम को वर्ल्ड कप दिलाया। जीत के बाद वह जश्न के बीच भी अपने जज्बातों को संभालते नजर आए, लेकिन उनके चेहरे पर सुकून और गर्व साफ दिख रहा था।

फाइनल के बाद मजूमदार ने कहा, “मैं खिलाड़ियों से हमेशा कहता था कि हम हार नहीं रहे हैं, बस उस बाधा को पार करने से चूक जा रहे हैं। हमने लीग में दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के खिलाफ बहुत अच्छा खेल दिखाया, बस किस्मत थोड़ी साथ नहीं थी।” उनके इन शब्दों में उनकी टीम पर अटूट भरोसा झलकता था।

कठिन समय में संभाली टीम

जब अमोल मजूमदार ने दो साल पहले कोच का पद संभाला, तब भारतीय महिला क्रिकेट टीम मुश्किल दौर से गुजर रही थी। खिलाड़ियों में प्रतिभा तो थी, लेकिन नतीजे नहीं आ रहे थे। टीम के भीतर गुटबाजी, अनुशासनहीनता और भरोसे की कमी जैसी बातें सामने आ रही थीं।

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इससे पहले रमेश पोवार, डब्ल्यू. वी. रमन और फिर से पोवार ने कोच की भूमिका निभाई थी। रमन के कार्यकाल में भारत 2020 टी20 विश्व कप फाइनल तक पहुंचा था, लेकिन उसके बाद टीम लगातार निराशाजनक प्रदर्शन कर रही थी।

मजूमदार ने सबसे पहले खिलाड़ियों का भरोसा जीतने पर ध्यान दिया। उन्होंने सभी से खुलकर बातचीत की, उनके अच्छे प्रदर्शन पर प्रोत्साहन दिया और मुश्किल वक्त में साथ खड़े रहे। आलोचना होने पर उन्होंने अपनी टीम की ढाल बनकर रक्षा की।

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धीरे-धीरे टीम में एकजुटता और आत्मविश्वास लौटा। खिलाड़ी एक-दूसरे की सफलता का जश्न मनाने लगे और मुश्किल पलों में एक-दूसरे का सहारा बने। यही वह बदलाव था जिसने इस टीम को चैंपियन बनाया।

‘नए तेंदुलकर’ से कोच तक का सफर

नब्बे के दशक में मजूमदार को उनके शानदार प्रदर्शन के कारण ‘नया तेंदुलकर’ कहा जाता था। वे इंग्लैंड दौरे पर भारतीय अंडर-19 टीम के उपकप्तान रहे और राहुल द्रविड़ व सौरव गांगुली के साथ खेले। उन्होंने 1993-94 रणजी ट्रॉफी में हरियाणा के खिलाफ 260 रन बनाए थे, जो प्रथम श्रेणी पदार्पण पर विश्व रिकॉर्ड था। यह रिकॉर्ड 2018 में अजय रोहेरा ने तोड़ा।

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खिलाड़ी जीवन के बाद मजूमदार ने मुंबई, असम और आंध्र की टीमों के लिए खेला। कोचिंग करियर में उन्होंने राजस्थान रॉयल्स, भारत की अंडर-19 और अंडर-23 टीमों, नीदरलैंड टीम, और दक्षिण अफ्रीका टीम (भारत दौरे पर) के साथ बल्लेबाजी कोच के रूप में काम किया।

विश्व कप फाइनल से पहले मजूमदार ने खिलाड़ियों से सिर्फ इतना कहा, “इतिहास रचने के लिए बस एक रन ज्यादा बनाना है।” उन्होंने खिलाड़ियों पर पूरा भरोसा जताया। लगातार तीन हार के बाद भी उन्होंने किसी खिलाड़ी को दोष नहीं दिया और कहा कि टूर्नामेंट लंबा है, टीम वापसी करेगी। आखिरकार उनकी टीम ने वही किया जो हर उम्मीद पर खरी उतरी और अपने कोच को दी सबसे बड़ी ‘गुरूदक्षिणा’ और वो है वर्ल्ड कप ट्रॉफी।

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