
Lok Sabha Debates in Hindi: लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने प्रस्ताव के समर्थन में अनेक बातें कहीं तो सत्ता पक्ष ने तमाम तर्कों के साथ इसका विरोध किया। आइए जानते हैं कि विपक्ष ने स्पीकर ओम बिरला पर अविश्वास के क्या-क्या कारण गिनाए और सत्ता पक्ष ने विपक्ष के आरोपों का किन तर्कों के साथ खंडन किया।
बोलने से रोकना: विपक्षी सदस्यों ने आरोप लगाया कि अध्यक्ष ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को सदन में बोलने के उनके विधायी अधिकारों से वंचित किया है। के.सी. वेणुगोपाल और टी.आर. बालू ने कहा कि जब भी नेता प्रतिपक्ष बोलने के लिए खड़े होते हैं, उनका माइक अक्सर बंद कर दिया जाता है।
अत्यधिक हस्तक्षेप: गौरव गोगोई ने उल्लेख किया कि फरवरी 2026 में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष को लगभग 20 बार बीच में टोका गया।
नियमों का चयनात्मक उपयोग: सदस्यों का आरोप है कि अध्यक्ष ने विपक्ष को रोकने के लिए नियम 349 और 353 का चयनात्मक उपयोग किया, जबकि सत्ता पक्ष को बिना किसी रोक-टोक के बोलने दिया गया।
भाषणों को रिकॉर्ड से हटाना (Expunging): विपक्षी नेताओं के तार्किक बयानों को रिकॉर्ड से हटाया गया, जबकि सत्ता पक्ष द्वारा पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणियों को रहने दिया गया।
सुरक्षा संबंधी झूठे आरोप: अध्यक्ष पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने प्रधानमंत्री को सदन में न आने की सलाह यह कहकर दी कि विपक्षी महिला सांसदों से उन्हें शारीरिक खतरे की संभावना है।
गरिमा को ठेस: विपक्षी सदस्यों, विशेषकर एस. जोतिमणि और महुआ मोइत्रा ने इसे 'काल्पनिक' और ‘बेबुनियाद’ बताते हुए महिला सांसदों के चरित्र पर हमला करार दिया।
अभूतपूर्व निलंबन: महुआ मोइत्रा ने बताया कि दिसंबर 2023 में एक साथ 141 सांसदों को निलंबित किया गया, जो संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा सामूहिक निलंबन था।
दमनकारी हथियार: विपक्ष का कहना है कि नियम 373 और 374 का उपयोग व्यवस्था बनाए रखने के बजाय विपक्ष को कुचलने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है।
उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) का पद खाली रखना: कई सदस्यों (मनीष तिवारी, अभय कुमार सिन्हा, आनंद भदौरिया) ने सवाल उठाया कि पिछले 6-7 वर्षों से उपाध्यक्ष का चुनाव क्यों नहीं कराया गया, जो एक संवैधानिक अनिवार्यता है।
पक्षपातपूर्ण आचरण: आरोप लगाया गया कि अध्यक्ष अब निष्पक्ष न्यायधीश के बजाय सत्ता पक्ष के ‘कठपुतली’ या ‘व्हीप’ की तरह काम कर रहे हैं।
सचिवालय की स्वतंत्रता: असदुद्दीन ओवैसी और चंद्रशेखर ने सचिवालय में सेवानिवृत्त अधिकारियों की नियुक्ति पर आपत्ति जताई, जिससे सदन की स्वायत्तता प्रभावित हो रही है।
महत्वपूर्ण चर्चाओं को रोकना: मणिपुर हिंसा, भारत-चीन सीमा विवाद, और हिंडनबर्ग जैसे राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर कार्यस्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) और अन्य चर्चाओं की अनुमति नहीं दी गई।
संसदीय बैठकों में कमी: सायनी घोष ने बताया कि सदन की वार्षिक बैठकों की संख्या में भारी गिरावट आई है, जिससे यह 1952 के बाद की सबसे छोटी अवधि वाली लोकसभा बन गई है।
बिना चर्चा के बिल पास करना: विपक्ष की अनुपस्थिति या निलंबन के दौरान महत्वपूर्ण विधेयकों और बजट को बिना किसी ठोस चर्चा के पारित कर दिया गया।
संसद टीवी का उपयोग: आरोप लगाया गया कि संसद टीवी का नियंत्रण अध्यक्ष के हाथ से निकल गया है और यह विपक्ष की आवाज़ को ब्लैक आउट करने का माध्यम बन गया है।
सुरक्षा व्यवस्था: अरविंद सावंत ने आपत्ति जताई कि संसद की सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव (CISF की तैनाती) अध्यक्ष की कस्टोडियन भूमिका को दरकिनार कर किया गया।
सत्ता पक्ष (NDA) के सदस्यों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव का विरोध करते हुए तर्क दिया कि अध्यक्ष ने सदैव विपक्ष को उनकी संख्या के अनुपात से अधिक समय और अवसर दिया है। सत्ता पक्ष ने बिरला द्वारा किए गए निम्नलिखित प्रमुख कार्यों और उससे संबंधित आंकड़े गिनाए।
सभी को समान अवसर: सत्ता पक्ष के सदस्यों, विशेषकर अमित शाह और अनुराग ठाकुर ने तर्क दिया कि अध्यक्ष ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम किया है। 17वीं लोकसभा में विपक्ष को 43.2% समय दिया गया और 18वीं लोकसभा में भी उन्हें उनकी संख्या के अनुपात में अधिक बोलने का मौका मिला।
प्रथम बार के सांसदों को प्रोत्साहन: भर्तृहरि महताब और कृष्ण प्रसाद टेनेटी ने कहा कि अध्यक्ष ने पहली बार चुनकर आए सांसदों और महिला सांसदों को शून्य काल और अन्य चर्चाओं में बोलने के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित किया।
उच्च नैतिक आधार: अमित शाह और जगदंबिका पाल ने रेखांकित किया कि जैसे ही प्रस्ताव का नोटिस मिला, ओम बिरला ने नैतिकता के आधार पर स्वयं को सदन की अध्यक्षता से दूर कर लिया, जबकि अतीत में कांग्रेस के समय के अध्यक्ष पद पर बने रहते थे।
दोषपूर्ण नोटिस को सुधारने का मौका: चिराग पासवान और रविशंकर प्रसाद ने कहा कि विपक्ष का नोटिस तकनीकी रूप से गलत था (गलत तारीख और फोटोकॉपी हस्ताक्षर), फिर भी अध्यक्ष ने उदारता दिखाते हुए उन्हें इसे सुधारने और चर्चा करने का मौका दिया।
समय का आवंटन: 17वीं लोकसभा (2019-2024) में सदन कुल 10,347 घंटे चला, जिसमें से विपक्ष को 43.2% समय अपनी बात रखने के लिए दिया गया। अमित शाह के अनुसार, 17वीं लोकसभा में विपक्ष को मिला समय उनके संख्या बल के आधार पर मिलने वाले आनुपातिक समय से 2.5% अधिक था।
कांग्रेस को विशेष प्राथमिकता: 17वीं लोकसभा में कांग्रेस के 52 सदस्यों को 157 घंटे 55 मिनट का समय मिला, जबकि 303 सदस्यों वाली भाजपा को 349 घंटे 8 मिनट मिले। प्रति सदस्य औसत देखा जाए तो बिरला ने कांग्रेस को भाजपा की तुलना में 6 गुना अधिक समय दिया।
18वीं लोकसभा में स्थिति: वर्तमान 18वीं लोकसभा में भी विपक्ष को अब तक 45% समय आवंटित किया गया है।
शून्य काल: बिरला ने शून्य काल की अवधि को बढ़ाकर सदस्यों को रात 12:00 बजे और कभी-कभी सुबह 4:00 बजे तक अपने क्षेत्र के मुद्दे उठाने का मौका दिया।
17वीं लोकसभा के दौरान रिकॉर्ड 5,568 सदस्यों को शून्य काल में मामले उठाने की अनुमति दी गई।
18वीं लोकसभा में अब तक 1,835 मुद्दे उठाए गए हैं, जिनमें विपक्ष की भागीदारी 56% रही है, जबकि सत्ता पक्ष की मात्र 44%।
पूरक प्रश्न: 18वीं लोकसभा में अध्यक्ष ने सत्ता पक्ष के सांसदों को 321 सप्लीमेंट्री सवाल पूछने का मौका दिया, जबकि संख्या बल कम होने के बावजूद विपक्षी सांसदों को 364 मौके दिए।
नियम 377 और विशेष उल्लेख: इतिहास में सबसे अधिक बार नियम 377 और जनहित के आवश्यक मामलों को उठाने का अवसर ओम बिरला के कार्यकाल में मिला है।
अहंकार की संतुष्टि: रविशंकर प्रसाद और तेजस्वी सूर्या ने तर्क दिया कि यह प्रस्ताव किसी संवैधानिक चिंता के कारण नहीं, बल्कि विपक्ष और विशेष रूप से गांधी परिवार के 'अहंकार' को संतुष्ट करने के लिए लाया गया है क्योंकि वे नियमों के तहत समान व्यवहार स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
प्रचार का जरिया: लावू श्री कृष्णा देवरायलु ने इसे केवल 'सुर्खियां बटोरने का एक तमाशा' (spectacle) करार दिया, क्योंकि विपक्ष जानता है कि उनके पास इसे पारित करने के लिए बहुमत नहीं है।
संस्थाओं पर हमला: अमित शाह और निशिकांत दुबे ने आरोप लगाया कि चुनाव हारने के बाद विपक्ष अब सुनियोजित तरीके से न्यायपालिका, चुनाव आयोग और अब अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पदों की विश्वसनीयता को चोट पहुंचा रहा है।
ऐतिहासिक रिकॉर्ड: सत्ता पक्ष ने बताया कि ओम बिरला के कार्यकाल में 17वीं लोकसभा की उत्पादकता 97% रही, जो हाल के इतिहास में सबसे अधिक है।
18वीं लोकसभा के पहले सत्र में औसत उत्पादकता 103.17% दर्ज की गई, जिसमें सदन निर्धारित समय से अधिक देर तक चला।
17वीं लोकसभा के दौरान बिरला ने सदन को निर्धारित समय से 346 घंटे अतिरिक्त चलाया ताकि अधिक से अधिक जनहित के मुद्दों पर चर्चा हो सके।
डिजिटल संसद और सुधार: भर्तृहरि महताब ने अध्यक्ष द्वारा शुरू किए गए 'डिजिटल संसद' और पेपरलेस सिस्टम जैसे दूरदर्शी सुधारों की सराहना की।
स्पीकर को धमकाने का प्रयास: गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस घटना का जिक्र करते हुए कहा कि चेंबर में विपक्षी सांसदों के व्यवहार के कारण अध्यक्ष की सुरक्षा को लेकर चिंता होने जैसा माहौल खड़ा कर दिया गया था, जो कि 'शर्मनाक' था। किरेन रिजिजू ने के.सी. वेणुगोपाल के भाषण के दौरान हस्तक्षेप करते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं देखा कि लगभग 25-30 कांग्रेस सांसद अध्यक्ष के चेंबर में घुस गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी सांसदों ने अध्यक्ष को 'धमकाने' का प्रयास किया, जो पूरे संसदीय इतिहास में अभूतपूर्व था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि एक सांसद ने चेंबर के अंदर का एक अवैध वीडियो भी जारी किया था। वहीं, अनुराग ठाकुर ने भी आरोप लगाया कि स्पीकर के ऑफिस में जाकर उनके साथ 'बदतमीजी और अभद्र व्यवहार' किया गया।
नियमों की अनदेखी: अमित शाह ने स्पष्ट किया कि माइक तब बंद होता है जब सदस्य नियमों (जैसे नियम 349) का उल्लंघन करते हैं या अप्रासंगिक विषयों पर बोलते हैं। उन्होंने कहा कि 'सदन कोई मेला नहीं है,' इसे नियमों से ही चलना होगा।
नेता प्रतिपक्ष की अनुपस्थिति: श्रीकांत शिंदे और अमित शाह ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी उपस्थिति राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है और वे महत्वपूर्ण बजट सत्रों के दौरान अक्सर 'विदेश यात्राओं' पर रहते हैं।
अमर्यादित व्यवहार: कृष्ण प्रसाद टेनेटी और अमित शाह ने विपक्ष द्वारा सदन में कागज फाड़ने, सीटी बजाने, वेल में आने और प्रधानमंत्री के लिए 'अमर्यादित शब्दों' का प्रयोग करने की निंदा की।
आपातकाल की याद: निशिकांत दुबे और रविशंकर प्रसाद ने याद दिलाया कि कांग्रेस ने आपातकाल के दौरान संविधान की 'हत्या' की थी और सांसदों के अधिकार छीने थे, इसलिए उन्हें लोकतंत्र पर भाषण देने का हक नहीं है।
2014 का 'काला दिन': लावू श्री कृष्णा देवरायलु ने 2014 में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक पारित करने के दौरान कांग्रेस सरकार द्वारा दरवाजे बंद करने और लाइव टेलीकास्ट रोकने की घटना को याद दिलाते हुए उनके 'लोकतांत्रिक मूल्यों' पर सवाल उठाए।
नेहरू और राजीव गांधी का हवाला: अमित शाह और रविशंकर प्रसाद ने पंडित नेहरू और राजीव गांधी के पुराने भाषणों को उद्धृत किया, जिनमें उन्होंने अध्यक्ष के विरुद्ध ऐसे अविश्वास प्रस्तावों को 'कौशल एवं क्षमता का अपमान' (abuse of intelligence) कहा था।
सेना का अपमान: अनुराग ठाकुर और श्रीकांत शिंदे ने आरोप लगाया कि विपक्ष चीन और सेना के मुद्दों पर गलत जानकारी फैलाकर सेना के मनोबल को गिरा रहा है और विदेशों में जाकर भारत की छवि खराब कर रहा है।
अंत में, सत्ता पक्ष का सामूहिक तर्क यह था कि यह प्रस्ताव 'अनुशासनहीनता और अराजकता' का समर्थन है और सदन को इसे भारी बहुमत से खारिज कर देना चाहिए ताकि अध्यक्ष के पद की गरिमा बनी रहे।
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