
आज का इतिहास: आज वह दिन है जब 461 वर्ष पूर्व दक्षिण भारत के अंतिम महान हिंदू साम्राज्य विजयनगर का पतन हो गया था। तब दो मुस्लिम भाइयों ने अपने हिंदू राजा से युद्धभूमि में तब दगाबाजी की जब युद्ध निर्णायक मोड़ पर था। कई ऐतिहासिक ग्रंथों और क्षेत्रीय वृतांतों में माना गया है कि 25 जनवरी, 1565 ही वो तिथि थी जिस दिन तालिकोटा के युद्ध में विजयनगर के राजा राम राय की सुल्तान हुसैन निजाम शाह ने हत्या कर दी थी जो अहमदनगर के सुल्तान था।
दरअसल, विजयनगर साम्राज्य अपनी समृद्धि, कला और सैन्य शक्ति के चरम पर था। तत्कालीन वास्तविक शासक राम राय अत्यंत महत्वाकांक्षी थे। उन्होंने दक्कन की सल्तनतों बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर और बीदर के आपसी झगड़ों में हस्तक्षेप कर उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाने की नीति अपनाई। हालांकि, राम राय की इस बढ़ती शक्ति ने इन शत्रु सुल्तानों को एक मंच पर ला खड़ा कर दिया। बरार को छोड़कर, बाकी चार सल्तनतों ने एक 'महासंघ' बना लिया।
विजयनगर और सुल्तानों के महासंघों के बीच छिटपुट सैन्य झड़प दिसंबर, 1964 में ही शुरू हो गई थी, लेकिन मुख्य सेनाओं का आमना-सामना जनवरी, 1565 में हुआ। 23 जनवरी, 1565 को शुरू हुए युद्ध में विजयनगर की सेना संख्या बल में विशाल थी, लेकिन उनकी तकनीक पुरानी थी। उनके पास पैदल सेना और हाथियों की भरमार थी। इसके विपरीत, सुल्तानों के पास कुशल घुड़सवार और सबसे महत्वपूर्ण बेहतर तोपखाना था। युद्ध के दौरान, विजयनगर की सेना के दो मुस्लिम सेनापतियों मल्लू गिलानी और मुहम्मद गिलानी (गिलानी भाइयों) ने ऐन वक्त पर पाला बदल लिया।
ये दोनों भाई मूल रूप से विजयनगर की सेना के उच्च पदस्थ अधिकारी थे। राम राय ने उन पर अत्यधिक भरोसा किया था और उन्हें सेना की महत्वपूर्ण टुकड़ियों (विशेषकर घुड़सवार और पैदल सेना) का नेतृत्व सौंपा था। युद्ध के दौरान जब विजयनगर की सेना जीत के करीब दिख रही थी, ये दोनों भाई अनुमानतः 70,000 से 1,00,000 सैनिकों वाली अपनी विशाल टुकड़ियों के साथ अचानक पाला बदलकर दक्कन की सल्तनतों की ओर चले गए। इन दोनों भाइयों ने अचानक तोपों का मुंह राजा राम राय की सेना की तरफ कर दिए।
इस अचानक हुए विश्वासघात ने विजयनगर की सेना के बीच भारी भ्रम और अराजकता पैदा कर दी। इसी अफरा-तफरी का फायदा उठाकर सुल्तानों की सेना ने राम राय को बंदी बना लिया। 80 वर्षीय राम राय पकड़े गए और अहमदनगर के सुल्तान हुसैन निजाम शाह ने उनकी बेरहमी से हत्या कर दी। इतालवी यात्री सीजर फ्रेडरिक (Caesar Frederick) ने युद्ध के कुछ समय बाद इस क्षेत्र का दौरा किया और युद्ध की बर्बादी देखी। उन्होंने अपने संस्मरणों में उल्लेख किया है कि इन दो मुस्लिम सेनापतियों के धोखे ने ही विजयनगर की हार सुनिश्चित की थी।
इस हार के बाद विजयनगर शहर (हम्पी) को छह महीने तक बेरहमी से लूटा और जलाया गया। कला और स्थापत्य के अद्भुत नमूने मलबे में तब्दील हो गए। इस युद्ध ने न केवल एक साम्राज्य का अंत किया, बल्कि दक्षिण भारत में इस्लामी प्रभाव के विस्तार का मार्ग प्रशस्त कर दिया। इस युद्ध ने पुर्तगाली व्यापारिक हितों को भी प्रभावित किया, जो अपनी घोड़ों की आपूर्ति के लिए विजयनगर पर निर्भर थे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि तालिकोटा का युद्ध भारतीय इतिहास के सबसे निर्णायक युद्धों में से एक है। 23 जनवरी, 1565 को लड़े गए इस युद्ध ने दक्षिण भारत के अंतिम महान हिंदू साम्राज्य विजयनगर के भाग्य का फैसला कर दिया। इस युद्ध में गिलानी भाइयों की धोखे ने एक महान हिंदू साम्राज्य का विनाश कर दिया। तालिकोटा के युद्ध को 'राक्षस-तंगड़ी का युद्ध' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह युद्ध कृष्णा नदी के किनारे बसे राक्षणसी और तंगड़ी गांवों के पास हुआ था।
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