
बदलते वैश्विक हालात को देखते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भविष्य की लड़ाइयों में ड्रोन और काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी की भूमिका बेहद अहम होने वाली है। उन्होंने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव से यह साफ हो गया है कि युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब ड्रोन टेक्नोलॉजी एक प्रमुख हथियार बनती जा रही है। रक्षा मंत्री नई दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में आयोजित राष्ट्रीय रक्षा उद्योग सम्मेलन में शिरकत की। इस कार्यक्रम में एमएसएमई, स्टार्ट-अप, रक्षा कंपनियां, वैज्ञानिक, नीति निर्माता और सेना से जुड़े अधिकारी शामिल हुए।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आज 100 से अधिक चुनौतियों के साथ 'डिफेंस इंडिया स्टार्ट-अप चैलेंज' (डीआईएससी) का 14वां संस्करण भी शुरू किया गया है। डीआईएससी की अब तक की सफलता को देखते हुए, हमारे रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (DPSUs) द्वारा पहली बार 100 से अधिक चुनौतियां प्रस्तुत की जा रही हैं। मैं डीआईएससी के नए संस्करण के लिए सभी नवप्रवर्तकों को शुभकामनाएं देता हूं।'
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पूरी दुनिया रूस-यूक्रेन और ईरान-इजराइल के बीच चल रहे संघर्ष को देख रही है। इससे साफ है कि भविष्य की लड़ाइयों में ड्रोन और उन्हें रोकने वाली टेक्नोलॉजी कितनी अहम होगी। उन्होंने आगे कहा कि आज जरूरत है कि भारत ऐसा ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करे, जिसमें देश पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सके।
उन्होंने कहा कि आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स और अन्य नई टेक्नोलॉजी की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। ये टेक्नोलॉजी न सिर्फ रक्षा क्षेत्र में, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्री के तरीके भी बदल रही हैं। यानी अब उत्पादन के पुराने तरीके बदलकर ज्यादा स्मार्ट और तेज हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऑटोमेशन, AI और रोबोटिक्स जैसी टेक्नोलॉजी की वजह से दुनिया भर में उत्पादन का तरीका पूरी तरह बदल रहा है। इसके साथ ही सिमुलेशन टेक्नोलॉजी भी नई संभावनाएं पैदा कर रही है। उन्होंने कहा, सरकार का लक्ष्य है कि साल 2030 तक भारत स्वदेशी ड्रोन निर्माण का दुनिया में सबसे बड़ा केंद्र (ग्लोबल हब) बन जाए। उन्होंने भरोसा दिलाया कि इस मिशन में सरकार हर संभव मदद और सहयोग देगी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मनिर्भरता सिर्फ अंतिम उत्पाद तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हमें ड्रोन के हर पुर्जे को भारत में ही बनाना होगा। ड्रोन का ढांचा (मोल्ड), सॉफ्टवेयर, इंजन और बैटरी सब कुछ स्वदेशी होना चाहिए। रक्षा मंत्री ने स्वीकार किया कि यह काम आसान नहीं है। आज दुनिया के कई देश ड्रोन बनाने के लिए जरूरी पुर्जे चीन से मंगवाते हैं। लेकिन भारत की सुरक्षा और रणनीतिक मजबूती के लिए हमें ड्रोन निर्माण में पूरी तरह आत्मनिर्भर होना ही पड़ेगा।
रक्षा मंत्री ने बताया कि आईडेक्स प्रोग्राम के जरिए अब तक सैकड़ों स्टार्ट-अप और इनोवेटर्स डिफेंस सेक्टर से जुड़े हैं। फरवरी 2026 तक करीब 676 स्टार्ट-अप और एमएसएमई इस इकोसिस्टम का हिस्सा बन चुके हैं। 548 कॉन्ट्रैक्ट साइन हुए हैं और 566 चैलेंज लॉन्च किए गए हैं। इनमें से कई प्रोटोटाइप को सेना के लिए खरीद की मंजूरी भी मिल चुकी है और हजारों करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट साइन किए जा चुके हैं। इससे यह साफ होता है कि इनोवेशन अब धीरे-धीरे वास्तविक उत्पाद और तकनीक में बदल रहा है।
रक्षा मंत्री ने बताया कि देश में MSME की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2012-13 में जहां इनकी संख्या करीब 4.67 करोड़ थी, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 8 करोड़ हो गई है। उन्होंने कहा कि स्टार्ट-अप नए विचारों के साथ समाज में बदलाव ला रहे हैं और कई कंपनियां कम समय में यूनिकॉर्न बन रही हैं।
(न्यूज एजेंसी भाषा के साथ)
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