Noida Property Row: बिक्री एग्रीमेंट होने से संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं, हाईकोर्ट ने दिया आदेश

Noida Property Row: हाल ही के एक मामले में, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट (Transfer of Property Act) की धारा 54 के अनुसार एग्रीमेंट टू सेल (बिक्री का समझौता) संपत्ति में कोई हक़, स्वामित्व या हित पैदा नहीं करता। 

Jitendra Singh
पब्लिश्ड25 Nov 2025, 04:04 PM IST
Noida Property Row: बिक्री समझौता सिर्फ कानूनी पंजीकृत दस्तावेज है।
Noida Property Row: बिक्री समझौता सिर्फ कानूनी पंजीकृत दस्तावेज है।

Noida Property Row: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल समझौता बिक्री (एग्रीमेंट टू सेल) करने वाला व्यक्ति संपत्ति के बंटवारे के लिए दायर मुकदमे में आवश्यक या उचित पक्षकार नहीं हो सकता। बिक्री समझौता एक कानूनी पंजीकृत दस्तावेज है। इससे संपत्ति में कोई हक या दावा पैदा नहीं होता है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने गौतमबुद्ध नगर निवासी दीपेंद्र चौहान की पुनरीक्षण अर्जी पर ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

बता दें कि 13 नवंबर, 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 के सेक्शन 54 के अनुसार, बेचने का एग्रीमेंट उस प्रॉपर्टी में कोई इंटरेस्ट साबित नहीं करता जिसे बेचा जाना है। यह फैसला नोएडा के एक प्रॉपर्टी विवाद के मामले में सुनाया गया, जिसमें पिता की मौत के बाद, माँ ने कथित तौर पर अपने बेटे या परिवार के दूसरे सदस्यों से पूछे बिना अन्य लोगों के साथ बेचने का एग्रीमेंट कर लिया। इसके बाद बेटे ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

जानिए क्या है पूरा मामला

गौतम बुद्ध नगर निवासी दीपेंद्र चौहान ने अपनी मां फूल कुमारी और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ सेक्टर-39 स्थित एक संपत्ति में अपने हिस्से के बंटवारे और उसे बेचने से रोकने का मुकदमा दायर किया था। मुकदमे के दौरान मां फूल कुमारी ने दो लोगों के पक्ष में संपत्ति का बिक्री समझौता कर दिया। दोनों ने स्वयं को मुकदमे में शामिल करने की अर्जी दी, जिसे सिविल जज ने स्वीकार कर लिया। इस आदेश के खिलाफ दीपेंद्र चौहान ने उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण अर्जी दाखिल की थी।

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इस पूरे मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 54 के मुताबिक किसी अचल संपत्ति के बिक्री के समझौते से उस संपत्ति में खरीदार का कोई हक या दावा पैदा नहीं होता। यह सिर्फ ऐसा अनुबंध है, जिसके आधार पर खरीदार बिक्री विलेख कराने के लिए मुकदमा कर सकता है। समझौता बिक्री करने वालों का संपत्ति पर कोई कानूनी हक नहीं बनता इसलिए वे बंटवारे के मुकदमे के आवश्यक या उचित पक्षकार नहीं हो सकते।

किसकी है प्रॉपर्टी?

इकोनॉमिक टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक, यह प्रॉपर्टी असल में मिस्टर बी.एस. चौहान की थी, जो मिस्टर दीपेंद्र के पिता थे। श्रीमती फूल कुमारी (उनकी माँ) की थीं। मिस्टर बी.एस. चौहान की मौत के बाद, उनके कानूनी वारिसों की सहमति से, श्रीमती फूल कुमारी चौहान (दीपेंद्र की माँ) के नाम नोएडा अथॉरिटी के रिकॉर्ड में म्यूटेशन (अपडेट) कर दिया गया। जिस प्रॉपर्टी की बात हो रही है, वह एक जॉइंट प्रॉपर्टी थी, जिसमें दीपेंद्र का भी हिस्सा था, क्योंकि वे स्वर्गीय बी.एस. चौहान (पिता) के कानूनी वारिस थे। लेकिन, एक पारिवारिक झगड़ा हुआ, जिसके कारण यह कोर्ट केस शुरू हो गया।

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दीपेंद्र पहुंचे कोर्ट

जब कोर्ट में केस चल रहा था, तब प्रॉपर्टी खरीदने वालों ने C.P.C. के ऑर्डर I रूल 10(2) और सेक्शन 151 C.P.C. के तहत एक एप्लीकेशन दी, जिसमें केस में शामिल होने का दावा किया गया। उन्होंने तर्क दिया कि दीपेंद्र की मां ने 12 जुलाई, 2023 को उनके पक्ष में बेचने का एग्रीमेंट किया था। इस एप्लीकेशन के जवाब में दीपेंद्र ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि उनकी मां प्रॉपर्टी की अकेली मालिक नहीं हैं; बल्कि वह उनके और केस में शामिल दूसरे लोगों के साथ को-ओनर हैं। उन्हें पूरी विवादित प्रॉपर्टी बेचने का एग्रीमेंट करने का कोई अधिकार नहीं है।

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