
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने हाल ही में बैंकों के कैश क्रेडिट, चालू और ओवरड्राफ्ट खातों को खोलने और बनाए रखने के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। इन बदलावों से अब उधार लेने वाले बिजनेस और ग्राहकों को काफी ऑपरेशनल फ्लैक्सिबिलिटी मिल सकेगी।
पहले बैंक और उद्योग जगत इन नियमों को लेकर चिंता जाहिर कर रहे थे, खासकर वर्किंग कैपिटल पर पड़ने वाले असर को लेकर गंभीर चर्चा हो रही थी। हालांकि, आरबीआई ने कुछ प्रमुख चिंताओं को मानते हुए नियमों में ढील दी है, लेकिन कलेक्शन अकाउंट और मॉनिटरिंग से जुड़े नियमों में कोई छूट नहीं दी गई है।
आरबीआई ने कैश क्रेडिट (CC) खातों पर लगाए गए प्रतिबंधों को पूरी तरह से हटा दिया है। बैंकों ने तर्क दिया था कि सीसी अकाउंट्स को सीमित करने से बिजनेस को वर्किंग कैपिटल का प्रवाह बनाए रखने में बाधा आ सकती है। आरबीआई ने इस बात को स्वीकार किया है। केंद्रीय बैंक का कहना है कि सीसी सुविधाएं करेंट और ओवरड्राफ्ट अकाउंट्स से अलग तरीके से काम करती हैं, इसलिए इन पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं था। यह बदलाव बिजनेस के लिए एक बड़ी राहत है।
नए संशोधित नियमों में अब उधारकर्ताओं को अधिक बैंकों में ट्रांजैक्शन अकाउंट बनाए रखने की अनुमति मिल गई है। पहले के नियम में केवल दो बैंकों को ही उन उधारकर्ताओं के लिए लेनदेन खाते रखने की अनुमति थी, जिनका बैंकिंग सिस्टम में 10 करोड़ रुपये या उससे अधिक का एक्सपोजर था। संशोधित नियमों के तहत, अब 10% से अधिक एक्सपोजर वाले किसी भी ऋणदाता बैंक को उधारकर्ता के लिए चालू या ओवरड्राफ्ट खाता खोलने की अनुमति होगी।
अगर कोई भी बैंक इस सीमा को पूरा नहीं करता है या केवल एक बैंक ही इस सीमा को पूरा करता है, तो सबसे अधिक एक्सपोजर वाले दो ऋणदाता ऐसे खातों का संचालन कर सकेंगे। इस बदलाव से उधारकर्ताओं को अपने रोजमर्रा के बैंकिंग कामों में ज्यादा परिचालन लचीलापन मिलेगा।
हालांकि, उद्योग जगत ने संग्रह खातों से संबंधित नियमों में बदलाव की मांग की थी। उनका अनुरोध था कि प्रेषण विंडो को बढ़ाया जाए, लेकिन आरबीआई ने इस मांग को नहीं माना। कलेक्शन अकाउंट से निर्दिष्ट ट्रांजैक्शन अकाउंट में दो वर्क डेज के भीतर पैसे ट्रांसफर करने की अनिवार्यता पहले की तरह ही रहेगी। आरबीआई का मानना है कि लोन डिसिप्लीन बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि ऋणदाता बैंकों को समय पर धन का प्रवाह होता रहे।
बैंकों ने खाता बंद करने या खातों को बदलने की समय-सीमा से छूट देने का अनुरोध किया था। विशेष रूप से, कानून प्रवर्तन निर्देशों से जुड़े मामलों में वे छूट चाहते थे। आरबीआई ने उनके इस अनुरोध को भी स्वीकार नहीं किया। आरबीआई ने स्पष्ट किया कि नियामक निर्देश न्यायिक आदेशों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना लागू होते हैं। इसलिए, किसी अतिरिक्त प्रावधान की जरूरत नहीं है।
बैंकों ने लेनदेन खातों की निगरानी के परिचालन बोझ पर चिंता व्यक्त की थी। खासकर, तीसरे पक्ष के भुगतानों और अनधिकृत भुगतान चैनलों के रूप में दुरुपयोग को रोकने के संबंध में उन्होंने अपने दायित्वों को कम करने की मांग की थी। हालांकि, आरबीआई ने इन दायित्वों को कम करने से इनकार कर दिया है।
ये नए दिशानिर्देश 1 अप्रैल से प्रभावी होंगे। हालांकि, बैंक चाहें तो इन्हें पहले भी लागू कर सकते हैं। इन बदलावों से बैंकों को लोन अनुशासन और धन के उपयोग की निगरानी को मजबूत करने में मदद मिलेगी, साथ ही वे अपने उधारकर्ताओं को अधिक लचीलापन भी प्रदान कर पाएंगे।
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